समाजख़बर दलित महिलाओं पर हिंसा, व्यवस्था की विफलता और न्याय के लिए कठिन संघर्ष

दलित महिलाओं पर हिंसा, व्यवस्था की विफलता और न्याय के लिए कठिन संघर्ष

बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में, अपहरणकर्ताओं से अपनी बेटी को बचाने की कोशिश में एक 50 वर्षीय दलित महिला के सिर पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिसके बाद इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई।

पुरुष वर्चस्व से बनी इस सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं को कई तरह के भेदभाव ,अन्याय और अपमान का सामना करना पड़ता है। एक महिला होने के कारण हर एक महिला के साथ अलग तरह का भेदभाव होता है, और जब वही महिला कथित तौर पर दलित समुदाय से होती है, तो उसे दोहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता है। गौरतलब है कि भारत में लैंगिक अपराध के आंकड़े सबसे ऊपर हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश में महिला अपराध के आंकड़े काफी चिंताजनक हैं। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस में छपी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी ) की साल 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल भारत में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,48,211 अपराध दर्ज किए गए, जो साल 2022 में दर्ज 4,45,256  मामलों और साल 2021 में दर्ज 4,28,278 मामलों से ज़्यादा थे। 

गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश में लगभग 66,381 मामले दर्ज किए गए, जो देश में सबसे ज्यादा हैं। बीते कुछ सालों में उत्तर प्रदेश महिलाओं के लिए भयानक अपराध का गढ़ बन गया है। इन महिला अपराधों में दलित महिला अपराधों का डेटा सबसे ज्यादा है। द न्यूज़ मिनट में छपी एनसीआरबी की साल 2022 की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट से पता चलता है कि, उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की संख्या साल 2021 में 13146 से बढ़कर साल 2022 में 15368 हो गई, जिसमें 16 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। ये आंकड़े केवल संख्याएं नहीं हैं, बल्कि उस रुढ़िवादी संरचनात्मक हिंसा की ओर इशारा करते हैं, जहां जाति और जेंडर एक-दूसरे के साथ मिलकर दलित महिलाओं को सबसे अधिक असुरक्षित बनाते हैं। 

द न्यूज़ मिनट में छपी एनसीआरबी की साल 2022 की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट से पता चलता है कि, उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों की संख्या साल 2021 में 13146 से बढ़कर साल 2022 में 15368 हो गई, जिसमें 16 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई।

 बेटी को बचाने की कोशिश में दलित महिला की हत्या

टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्ट के मुताबिक,  बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में, अपहरणकर्ताओं से अपनी बेटी को बचाने की कोशिश में एक 50 वर्षीय दलित महिला के सिर पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिसके बाद इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि, महिला अपनी 20 वर्षीय बेटी के साथ खेतों की ओर जा रही थी, तभी गांव के निवासी पारस राजपूत ने अन्य साथियों के साथ मिलकर उन्हें रोक लिया और जातिसूचक गालियां देते हुए, उसकी बेटी को जबरन अपने साथ ले जाने लगे। जब महिला ने विरोध किया और उन्हें रोकने की कोशिश की, तो हमलावरों ने कथित तौर पर उसके साथ दुर्व्यवहार किया और धारदार हथियार से उसके सिर पर वार किया। वह गंभीर रूप से घायल होकर गिर पड़ी, जबकि आरोपी उसकी बेटी को अगवा करके ले गए। शोर सुनकर स्थानीय निवासी मौके पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी। सरवाईवर को पास के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

 उसकी मौत के बाद ग्रामीणों में रोष भर गया। उन्होंने पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन किया और शव का पोस्टमार्टम करने का विरोध किया और मृतका के अंतिम संस्कार को लेकर अपराधियों की गिरफ्तारी की शर्तें रखीं। ग्रामीणों ने मांग की कि जब तक पारस राजपूत और उसके साथियों की गिरफ्तारी नहीं होती, और उसकी बेटी सही सलामत घर नहीं आती तब तक महिला का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। लोगों का विरोध और गुस्सा देखते हुए, पुलिस ने भारी फोर्स तैनात की। इंडिया टुडे की एक एपोर्ट के मुताबिक, अपराध के लगभग 60 घंटे बाद, रुड़की से युवती और आरोपी को बरामद किया जा सका। मुख्य आरोपी, जिसकी पहचान पारस सोम के रूप में हुई, उसको मेरठ स्थित विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया और 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। यह अपराध केवल व्यक्तिगत हिंसा नहीं है, बल्कि जाति आधारित और लैंगिक हिंसा का उदाहरण है। भारतीय समाज में दलित महिलाओं पर होने वाली हिंसा अक्सर सत्ता बनाए रखने का राजनीतिक औज़ार बन जाती है। 

टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्ट के मुताबिक,  बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में, अपहरणकर्ताओं से अपनी बेटी को बचाने की कोशिश में एक 50 वर्षीय दलित महिला के सिर पर धारदार हथियार से हमला किया गया, जिसके बाद इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई।

व्यवस्था की विफलता और देरी से कार्रवाई

इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन की भूमिका गंभीर सवाल खड़े करती है। घटना के 2-3 दिन बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार किया और युवती को बरामद किया, जबकि पूरे समय गांव में भारी पुलिस फोर्स तैनात थी। लेकिन फिर भी कार्रवाई में देरी साफ तौर पर नजर आई। यह देरी कोई पहली बार नहीं है, यह देरी साल 2020 के हाथरस गैंग रेप और मर्डर जैसी घटनाओं की याद दिलाती है, जिसमें दलित सरवाईवर के मामलों में जांच में लापरवाही और देरी आम रही है। गौरतलब है कि आरोपी पक्ष ने इस घटना के बाद प्रेम-प्रसंग की भी बात की है। हालांकि पीड़ित परिवार ने ग्रामीणों के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस मामले को जानबूझ कर दूसरी दिशा में मोड़ा जा रहा है। महिला अपराध के तमाम मामलों में अगर आरोपी के खिलाफ पूरे साक्ष्य मौजूद हैं, तो उसे प्रेम प्रसंग का मामला बनाकर अपराध की गंभीरता को कम करने की कोशिश की जाती है। खबरों में ये भी बताया जा रहा है कि परिजनों का कहना है कि आरोपी पारस राजपूत नाबालिग है। जबकि लड़की बालिग है। 

उक्त घटना में प्रेम-प्रसंग बताने वाले परिजन इतने भी संवेदनशील नहीं है कि ये बात समझें कि प्रेम-प्रसंग होने पर हत्या और अपहरण जैसी घटनाएं नहीं होतीं। मेरठ की इस आपराधिक घटना के बाद एक ग्रामीण महिला वीडियो सोशल मीडिया पर दिखा संभावित है कि, उक्त वीडियो उसी गाँव की महिला का वीडियो होगा, जिसमें वो बहुत आक्रोश से भरी हुई है और लगभग चीखते हुए महिला कह रही है कि, क्या ठाकुरों की बिटिया रही होती तो ऐसा होता, महिला का साफ कहना है कि ये घटनाएं कहीं न कहीं जाति से जुड़ी होती हैं। हाशिए की जाति की महिलाओं के साथ यौनिक अपराध करना इस देश में सहज होता है। लेकिन यही अपराध अगर किसी सवर्ण महिला के साथ होता तो उसके परिणाम दूसरे होते।

मेरठ की इस आपराधिक घटना के बाद एक ग्रामीण महिला वीडियो सोशल मीडिया पर दिखा संभावित है कि, उक्त वीडियो उसी गाँव की महिला का वीडियो होगा, जिसमें वो बहुत आक्रोश से भरी हुई है और लगभग चीखते हुए महिला कह रही है कि, क्या ठाकुरों की बिटिया रही होती तो ऐसा होता।

विरोध प्रदर्शन के बिना क्यों नहीं बदलती व्यवस्था

घटना के बाद हुए विरोध-प्रदर्शन इस बात की याद दिलाते हैं, कि हाशिये के समुदायों के पास न्याय मांगने के लिए सड़क पर उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। खबरों के अनुसार समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने सत्ता पर आरोप लगाए हैं, कि सत्ता के लोग इस अपराध में शामिल हैं, उन्होंने सवाल करते हुए इस घटना को बहुत गंभीर मामला बताया। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस कृत्य को बेहद शर्मनाक घटना बताया। जबकि दलित नेता चंद्रशेखर रावण भी घटनास्थल पर पहुंचे। लेकिन बताया जा रहा है कि प्रशासन विपक्ष के नेताओं को गाँव में जाने से रोक रहा था। विपक्ष ने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार अपराधियों को संरक्षण देने में इतनी आगे बढ़ गई है, कि अब वो वापिस लौटी तो उनके सारे राज खुल जाएंगे। सच तो ये है कि अब सरकार से न्याय की कोई उम्मीद ही नहीं बची है। उन्होंने गिरफ्तारी की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया, जिसके कारण पुलिस के साथ मामूली झड़प हुई। यह दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन ही न्याय की आखिरी उम्मीद बन जाता है, लेकिन इसे कानून-व्यवस्था की समस्या कहकर दबाया जाता है।

हाशिए पर रह रहे समुदाय के किसी व्यक्ति के साथ अपराध होने पर राजनीतिक दल शोर तो मचाते हैं।लेकिन ठोस कार्रवाई कम ही दिखती है। तमाम राजनीतिक दलों के बयान इन घटनाओं पर आते हैं। लेकिन उनके आक्रोश से कोई जनांदोलन नहीं उठता। क्योंकि बिना बड़े जनांदोलन के व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं होता। निर्भया कांड के बाद देश में उसके खिलाफ एक व्यापक जनांदोलन उठा था, तो महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई सारे कड़े कानून बने। हालांकि महिला कानूनों और सामाजिक स्थिति में इतने ज्यादा विरोधाभास हैं, कि कानून बन तो जाते हैं। लेकिन उनका क्रियान्वयन ठीक तरह से नहीं हो पाता। आज के दौर में भारत में महिलाओं से जुड़े अपराध का जो स्तर है वो रोज भयानक होता जा रहा है । आज शिक्षा व्यवस्था में नहीं पूरी सामाजिक व्यवस्था में ही जेंडर सेंसिटाइजेशन बहुत ज़रूरी है ।

 मेरठ की यह घटना दिखाती है कि दलित महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि जाति और पुरुष वर्चस्व से बनी उस व्यवस्था का हिस्सा है, जहां उन्हें सबसे ज़्यादा असुरक्षित माना जाता है। जब ऐसे मामलों में पुलिस देर से कार्रवाई करती है और अपराध को प्रेम-प्रसंग बताकर हल्का करने की कोशिश होती है, तो यह साफ़ हो जाता है कि व्यवस्था सरवाईवर  के साथ खड़ी नहीं है। कानून मौजूद हैं, लेकिन जब तक संवेदनशीलता से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक दलित महिलाओं को न्याय नहीं मिल पाएगा। इसलिए न्याय के लिए सड़कों पर उतरना और सत्ता से जवाबदेही मांगन आज भी ज़रूरी है, तब ही हर एक इंसान के लिए सुरक्षित और समावेशी समाज का निर्माण किया जा सकता है।

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