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प्यारी लड़कियों,

ये ख़त मेरी ही तरह कई दुनिया में फँसी लड़कियों के नाम है। यों तो हमारे अस्तित्व और हमारी हस्तियाँ जुदा हैं पर औरतें एक-दूसरों के सच से कितना दूर हो सकती हैं। हमारी अपनी एक साँझी पहचान है जिससे हम जुड़ी रहती हैं। मैं उसी हवाले से तुम्हें ख़त लिख रही हूँ। तस्लीमा नसरीन अपने एक संस्मरण में कहती हैं कि किसी भी औरत के मानवीय अस्तित्त्व को नकारने की हद ये है कि किसी भी शब्दकोष में मनुष्य के अर्थ में औरत नहीं लिखा होता, आदमी लिखा होता है| लेकिन शायद समाज का पितृसत्तात्मक पक्ष ही है कि औरत को जन्म से ही किसी रिश्ते, किसी संस्कार से बाँध दिया जाए। वो लाड़ली लक्ष्मी है क्योंकि उसके आने से घर में कुछ न हो तो कम-से-कम धन तो आये ही। समाज अक्सर महिला सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरता है क्योंकि उनके लिए महिलाएं केवल किसी की बेटी, बहन, बीवी या माँ है| पर जब बात यह हो कि वो सिर्फ एक औरत है तो उसे बस माँस का गट्ठर ही मान लिया जाता है। ऐसा लगता है कि रिश्ते बनते ही उस मांस के गठ्ठर में जान आ जाती है।

रिश्तों को महत्त्व न देने वाली औरतें अक्सर घर तोड़ने वाली और कुसंस्कृत मानी जाती हैं। और समाज बस सुंदर और सुशील औरतें चाहता है। ये एक फ़लसफ़ा है बस, बाकी रस्म-ओ-रिवाज़ इसी पर अपनी दीवारें बनाते हैं।

हमारा चरित्र भी दिलचस्प है| इंसान के चरित्र में कई रंगों की छाया होती है पर औरतों का चरित्र पितृसत्तात्मक समाजीकरण के तहत सिर्फ दो छोरों में बंधा होता है, अच्छा या बुरा। ये श्रेणियाँ भी इतनी सुपरिभाषित हैं कि इसमें कहीं भी धुन्धलाहट की कोई गुंजाइश नहीं है। साड़ियाँ और दुपट्टे पहनने वाली लड़कियाँ शालीन होती हैं और वेस्टर्न कपड़े पहनने वाली फूहड़। और एक समानांतर संसार में प्रथम श्रेणी वाली लड़कियाँ आधुनिक होती हैं और दूसरी श्रेणी वाली गँवार। न पैमानों पर खरे उतरने के लिए ये लड़कियाँ अपनी-अपनी दुनिया में जो वो हैं नहीं, वो बनने की लगातार कोशिश करती रहती हैं। ये अच्छा बनने की प्रतिस्पर्धा लड़की की अच्छाई का एक टुकड़ा है। समाज की कठपुतली बनी लड़कियाँ अपना पूरा जीवन उस अच्छाई को पाने लिए बँधुआ मजदूर की तरह काट देती है, जिसकी न तो कोई इच्छा न कोई महत्वाकांक्षा होती है। महत्वाकांक्षी लड़कियों को भी समाज अच्छा नहीं मानता|

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हम लड़कियाँ, इस पितृसत्ता में यों तो उपेक्षित प्रजाति है पर समाज के बिगड़ने-बनने का मानक भी हम हैं। जहाँ लड़कियाँ पढ़ी-लिखी होती हैं, वो समाज ऐसा होता है; जहाँ लड़कियों की चलती है, उन घरों का ऐसा हाल होता है वगैरह-वगैरह। मार्क्स से लेकर गाँधी तक, पश्चिम से पूरब तक, हर सभ्यता में समाज के विकास को लड़कियों की स्थिति से मापा जाता रहा है। कोई हाजी कहते हैं इनको पढ़ाओ नहीं तो समाज डूब जाएगा। सुनो न तुम इसलिए पढ़ना कि अपना किनारा ढूँढ सको। और तुम ये क़ानून-वानून मत पढ़ना, पढ़ लोगी तो जला दोगी। या तो किताब को या समाज को। बहुत पढ़ लिया इसलिए कि घर संभालना है, अबकी पढ़ो इसलिए कि व्यवस्था को बिगाड़ना है।

औरतों का चरित्र पितृसत्तात्मक समाजीकरण के तहत सिर्फ दो छोरों में बंधा होता है, अच्छा या बुरा।

तुम कुछ दिखना क्यों चाहती हो? ये दिखने-दिखाने की स्पर्धा पैदा करके ही तो इनकी असुरक्षा और अस्थिरता का कारखाना चलता है। किसी के दिमाग का खालीपन अपना चेहरा सँवारकर नहीं भरा जा सकता। कोई भी ब्यूटी ट्रीटमेंट करवा लो, तुम्हारे चेहरे का सौन्दर्य समाज में संवेदना नहीं जगा सकता है। इस बार जब नुमाइश के लिए तस्वीर भेजी जाए, तो फोटोशॉप मत होने देना। लाल लिपस्टिक लगाने से शून्य में रंग नहीं भरता। ऊँची हील्स पहन सको तो पहन लो, पर कद अपना जितना हो उतना ही भला। मेहँदी का रंग गहराए कि नहीं, खुद से अपना प्रेम कम न करना। जवानी ढलते-ढलते ढल जाती है। तुम हाथ-पैरों में माहवर लगाती तो हर तीज-त्यौहार रंग जाता है। पर क्या नहीं जानतीं कि माहवारी के रंग से तुम अशुद्धता का पुतला हो जाती हो। यों नहीं कि कोई खुदा किसी दीवार से सीमित है, पर उस सीमा को फिर भी लाँघ दो।

हर बार समय की किसी न किसी तारीख पर कोई उपवास रखकर तो तुम खुद को तड़पाओगी, मानोगी नहीं सौभाग्य के किसी मिराज का पीछा जो कर रही हो। तुम अजीब प्राणी हो। आंकलन तो सबका होता है। पर बिंदी के आकार पर भी तुम्हारा चरित्र तय हो जाता है। अभी ये कविता लिखेंगे और तुम्हारे हुस्न को बेवफ़ा करार देंगे। इनके हवाले से तो तुम इस पृथ्वी की ही नहीं, अब ज़ोहराजबीं कहलाने पर शरमाना नहीं|मत पहनो कुछ कि आधुनिक दिखना चाहती हो, मत पहनो कुछ कि संस्कृति का सम्मान करती हो। जिस्म तक सिमट जाना आधुनिकता है वो कहेंगे। वो तो ये भी कहेंगे कि अग्निपरीक्षा संस्कृति है।

ये पुरुषों की दुनिया विचित्र है, जब चाहे तब देवी बना देती है और फिर कभी ताड़ना की अधिकारिणी करार देती है। वैसे भी तुम अपने बलात्कार और छेड़खानी के अलावा किसी के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो। फेंक दो खुद पर से पितृसत्ता के वो पुराने कपड़े, तुम्हारा जिस्म फूहड़ नहीं है।

अब न सबकुछ बदल रहा है। कभी-कभी अपने नामपर कुछ आज़ादी दे दी जाती है पर आज़ादी तो जन्मजात होती है न? तुम तो अच्छी हो। पर और लोग अच्छे नहीं हैं। कई लोग-लोग नहीं हैं, गीदड़ है। क्या काम करती हो? कुछ भी करो, दिन में करो। अँधेरे में आदमी भक्षक हो जाते हैं। जो भी हो तुम्हें रात नहीं देखने देंगे। तुम्हारी बात ही निराली है। तुम्हारे सामाजिक प्रतिबंध देखकर मुझे काफ्का का वो कथन याद आता है कि देखो कैसे पिंजरा परिंदे की खोज में निकला है। तुम न पार्टियों में नारीवाद की बात किया करो, अखबारों में लिखने को वही गीत काम आ जाएँगे। फेमिनिस्म को कांफ्रेंस और राजनैतिक नारों से निकालकर घर की दहलीज़ तक लाओ। समानतावाद का आखर उन दस्तावेज़ों में धूल खा रहा है जिसकी एक परत तुम्हारी आँखों पर भी चढ़ी हुई है।

रस्म-ओ-रिवाज़ मानती हो तो भला है, पर अगर ज़िन्दगी ही रस्म बन गई हो तो उसे तोड़ दो। घर को एक डोर से बाँधती हो तो अच्छीबात है, घर से बंधी हो तो खुल जाओ। कम खाती हो, कम बोलती हो, कम हँसती हो, घूँघट करती हो, हिजाब पहनती हो या किसी की बेहिजाबी पहनती हो, खाना बनाना जानती हो, घर सँभालती हो, शालीन हो, सभ्य हो, संस्कारी हो, मत रहो न। अल्हड़ बनो, फूहड़ बनो क्योंकि उनके मापदण्ड पर तुम्हारा कोई भी व्यवहार खरा न उतरेगा। हँस दो जोर-ज़ोर से उस परमेश्वर के सामने, जिसके साथ पार्वती बनकर तुमने अग्नि के समक्ष बेतुकी कसमें खाईं थीं। ज़िन्दगी से बड़ी कोई कसम होती है क्या भला। वो दिखा देते है आसमान का खुलापन और माँग लेते हैं धरती का वो टुकड़ा जिस पर पाँव जमे हैं। खुद जिस्म पर मचलते हैं और तुम्हें मोक्ष का रोड़ा बताते हैं। उनकी कायरता तुम्हारा ऐब नहीं है। अपनी संभावनाओं को किसी की छाती पर चूड़ी तोड़ने और हाथ में पिघलने तक सीमित मत करो। बन जाओ काली, कुलटा, चुड़ैल, नाशिन क्योंकि देवियों का क्षेत्र बस गृहस्थी तक बधा होता है। किसको चाहिए गले में हार और पैर में ज़ंजीर। बहुत हुई आँसुओं की अंजलि, इस बार धो लो मुँह उन्हीं आँसुओं से और फिर कभी मत रोना।

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Shraddha is a researcher, lawyer and Young India Fellow. She loves talking, writing and reading. Her interests include history, literature, politics, culture and poetry. She writes, speaks and thinks bilingually.

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