समाज में महिलाओं के हित की बात करने और उनपर काम करने के लिए कई सारी महिला कार्यकर्ती हुई है, राष्ट्रीय स्तर पर भी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी| पर पुरुषों के हित के लिए कोई पुरुष कार्यकर्ता हुए है या नहीं इसकी जानकारी मुझे तो नहीं है पर ये ज़रूर कहूँगा कि पितृसत्ता में मर्द कैसे बने..! ये शिक्षा बचपन में पिताजी से लेकर कॉलेज के प्रोफेसर साहब जैसे ‘मर्द निर्माणकर्ता’ बहुत हुए है और आज है भी| इस शिक्षा ने पुरुषों को कोई ख़ास सुविधा नहीं दिलवायी पर हाँ इसके आधार पर कई पारिवारिक या यों कहूँ सामाजिक समस्याओं को बढ़ावा ज़रूर दिया है| अब तक के अपने जीवन में पितृसत्तात्मक समाज में ‘मर्द’ की परिभाषा, उससे जुड़ी शिक्षा और व्यवहार ने किस तरह स्त्री-पुरुष से जुड़ी तमाम समस्याओं को पनपाया और उन्हें बढ़ावा दिया है इस बात को समाज में पुरुषों को लेकर प्रचलित तानों या बातों से अच्छी तरह समझा जा सकता है –

‘भाई बहन को ससुराल पहुंचाता शोभा देता है कॉलेज पहुंचाता नहीं’

बिहार के जिस छोटे गाँव से मैं और मेरा अस्तित्व ताल्लुक रखता है वहां आधुनिकता के नामपर हर दूसरे इंसान के हाथ में मोबाइल फोन और विकास के नामपर सिर्फ सरकारी नौकरी ही नज़र आती है और सबसे ज़रूरी शान-शौकत-संपदा-रौब इन सभी चीज़ों का निर्धारण होता है – दहेज की मोटी रकम और साजो-सामान से| हमारे यहाँ लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई को ख़ास महत्व नहीं दिया जाता है, अगर लड़की खुद से इंटर या बीए तक पढ़ ली तो इसके बाद उसकी किताबें बंद करवाने पर पूरा जोर दिया जाता है| क्योंकि ज्यादा पढ़ लेगी तो उससे शादी करने के लिए लड़का न मिलना एक बड़ी समस्या हो जाता है| अपने एक रिश्तेदार के घर में मैंने इस चीज़ को बेहद करीब से देखा जहाँ उनकी बिटिया अच्छे कॉलेज में पढ़ना चाहती थी पर उसका प्राइवेट फार्म भरवाकर उसे घर से पढने पर मजबूर किया गया और बीए पास होने के बाद शादी पर जोर लगाया जाने लगा|

और पढ़ें : पितृसत्ता क्या है? – आइये जाने 

अपनी बड़ी बहन के साथ हुए हाल को देखकर छोटी बहन ने पढ़ाई की आश ही छोड़ दी और घर की चारहदिवारी में खुद को ऐसा समेटा कि हाईस्कूल भी पास न कर पायी| बच्ची से घरवाले खूब खुश रहे, ज़ल्दी से शादी हुई बिटिया अपने ससुराल| छह महीने अंदर पता चला कि दोनों बिटियों के पति ने दारू पीकर मार-पीट शुरू कर दी| इस पूरे वाकये में एकलौते भाई ने पहले बड़ी बहन की शिक्षा के लिए आवाज़ उठाई इसपर घर के बाप-ताऊ ने यह कहकर उसकी आवाज़ बंद कर दी कि ‘लड़की का भाई बहन को कॉलेज नहीं ससुराल पहुंचाता हुआ शोभा देता है’ और छोटी बहन का क्या उसने तो पहले ही पढ़ाई से दूरी बना ली थी| भाई ने खूब पढ़ाई करके अच्छी नौकरी हासिल की और पहले अपनी तनख्वाह का आधा से ज्यादा हिस्सा बहनों की शादी में झोंका और उसके बाद चोरी-चोरी बहन के घर चलाने के लिए, क्योंकि आज भी गाँव में दूसरी शादी करना अपराध ही माना जाता है|

सबसे ज़रूरी शान-शौकत-संपदा-रौब इन सभी चीज़ों का निर्धारण होता है – दहेज की मोटी रकम और साजो-सामान से|

‘मर्दों पर औरतों का काम नहीं जंचता’

पड़ोस के मोहन बाबू यूँ तो अपने घर के हर काम में पत्नी का हाथ बटाते है| पर जब कभी भी वो छत पर बीवी के कपड़े सुखाने जाते है तो आस-पास ये ज़रूर देखते है कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा| बीवी की जब तबियत खराब हो तो घर का मेन गेट बंद करके ही वो रसोई में जाकर खाना बनाते है| उनके इस व्यवहार के बारे में जब कोई पूछता है तो वे अक्सर कहते है कि ‘समाज में सारा लोग यही कह-कह के ताना मारता है कि आप तो औरतों का काम करते है| बात सिर्फ बात तक होती तो मुझे फर्क न पड़ता लेकिन लोगों ने मुझे इसके चलते कई बार सामाजिक तौर पर मुझे बेईज्ज़त करके मेरा सार्वजनिक जगहों पर आना-जाना दूभर कर दिया था|’

‘कुछ कमाता-धमाता नहीं क्या लड़का, अभी तक पढ़ ही रहा है?’

दीपक और रेखा भाई-बहन थे| दोनों ही पढ़ाई में बेहद अच्छे| रेखा ने बीए अच्छे नंबरों से पास किया पर उसके बाद उसे आगे पढ़ाने की बजाय उसपर शादी का बोझ डाल दिया गया| शादी के बाद रेखा ने सिविल सर्विस की तैयारी शुरू की और इंटरव्यू तक पहुंची पर सफल न हो सकी| इसके बाद जुड़वाँ बेटियों की माँ बनने पर सारी पढ़ाई-तैयारी का किस्सा खत्म हो गया| दीपक को बकायदा घरवालों ने खेत बेचकर दिल्ली सिविल सर्विस की तैयारी के लिए भेजा| होनहार दीपक ने दो बार मेंस और एकबार इंटरव्यू भी दिया पर सफलता हाथ न लगी| इस दौरान घरवालों के ऊपर बेटे की कमाई-नौकरी को लेकर रिश्तेदारों ने अप्रत्यक्ष रूप से दीपक पर ऐसा दबाव बनवाया कि उसने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया|

पितृसत्तात्मक समाज में भी ‘मर्द’ होता नहीं बनाया जाता है|

‘लड़का ही तो होता है माँ-बाप का सहारा’

आनंद के माता-पिता ने संपत्ति में आनंद और उसकी दो बहनों बराबर का हिस्सा दिया| बड़ी बहनों के ससुराल वाले मोटे दहेज के बाद संपत्ति में मिले बहु के हिस्से से खूब खुश थे| आनंद के हिस्से में था संपत्ति और माता-पिता| पिता के कैंसर के लंबे ईलाज में सारी संपत्ति बेचनी पड़ी जिसके बाद वे चल बसे| आखिर में बूढी माँ की देखभाल का जिम्मा आनंद ने अपनी पगार से उठाना शुरू किया| इस दौरान जब आनंद ने बहनों से पैसों की मदद मांगी तो उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा कि – बहन-बेटियों को धन दिया जाता है उनसे लिया नहीं जाता| आखिर में माँ के देहांत के बाद आनंद अपना मानसिक संतुलन खो बैठा और सड़कों पर ज़िन्दगी गुजारने को मजबूर हो गया| ऐसा सिर्फ इसलिए हुआ कि क्योंकि अधिकार के नामपर पर तो समानता की बात हुई पर कर्तव्य के नामपर – लड़का तो होता है माँ-बाप का सहारा….वाली बात आ गयी|

‘पितृसत्ता पुरुषों का अमानवीयकरण करती है|’- कमला भसीन

‘मर्द को दर्द नहीं होता’

अगर इसी तर्ज पर हम घरेलू हिंसा, बलात्कार और यौन-उत्पीडन जैसी तमाम महिला-विरोधी समस्याओं का विश्लेषण करें तो यह पाते है कि महिलाओं के सन्दर्भ में सिमोन द बोउवार ने कहा था कि ‘लड़की होती नहीं बनाई जाती है|’ ठीक उसी तरह एक पितृसत्तात्मक समाज में भी ‘मर्द’ होता नहीं बनाया जाता है| समाज की सत्ता से लेकर महिला पर अपना दमन तंत्र कायम करने के लिए लगातार पुरुषों को एक निर्धारित ढांचें में ढालने का प्रयास किया जाता है और जिस जगह भी समाज इस प्रयास में असफल होता है वहां पुरुष को ‘नामर्द’ ‘आवारा’ ‘बाघी’ और भी न जाने किन-किन तमगो से संबोधित किया जाता है| सदियों से चली आ रही पितृसत्ता की सबसे सख्त मार उन युवाओं पर होती जो शिक्षित है और समानता और स्वतंत्रता पर विश्वास करते है| ‘मर्द को कभी दर्द नहीं होता है|’ – जैसी पंक्तियों के ज़रिए पितृसत्ता ने ‘मर्द’ को गढ़ने में अपना सक्रिय योगदान दिया है| इससे न केवल पुरुष सामाजिक व व्यवहारिक रूप से खुद को सर्वशक्तिमान मानने लगे बल्कि मानसिक तौर पर उनकी संवेदनाओं को सीधे तौर पर प्रभावित किया गया|

मेरे लिखे को पढ़ने के बाद हो सकता आप सवाल करें कि पितृसत्ता का संचालक भी तो एक मर्द है…? या हो सकता है आपको मेरी बातें ब्लेम-गेम सी लगे| पर बता दूँ कि मैं यहाँ समाज के हर एक पुरुष की बात नहीं कर रहा हूँ| बल्कि मैं बात कर रहा हूँ मध्यमवर्गीय परिवार के उन पुरुषों की – जो महिलाओं की शिक्षा और समान अधिकार को ज़रूरी मानते है, जिन्हें घर-परिवार के लिए, बीवी के लिए पैसा कमाने के लिए हर वक़्त ताने सुनने पड़ते है, जिसे न चाहते हुए भी अपनी कम पढ़ी-लिखी बहन के लिए भारी दहेज का बोझ उठाना पड़ता है, जिसे घर का (या यों कहें महिलाओं का) काम करने में किसी भी तरह का हर्ज महसूस नहीं होता, जिसके घर में भाई-बहन के बीच समानता के नियम लागू तो होते है और सिर्फ लड़कियों के अधिकार के संबंध में वहीं जिम्मेदारी का पूरा जिम्मा पुरुष के ऊपर होता है और सबसे ज़रूरी जो चाहते हुए भी अपने दर्द को किसी साझा नहीं कर पाते सिर्फ इसलिए क्योंकि वे मर्द है| पितृसत्तात्मक व्यवस्था का यह एक दूसरा वीभत्स पहलू है जिसने पुरुष के ज़रिए महिलाओं पर अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए पुरुषों को भी ‘मर्द’ वाले सांचे में ढालने की साजिश रची है, जिसका खामियाज़ा इस व्यवस्था को न मानने वाले हर पुरुष को भुगतना पड़ता है| ऐसे में नारीवादी कमला भसीन का कहा बेहद सटीक लगता है कि ‘पितृसत्ता पुरुषों का अमानवीयकरण करती है|’

Also read: How Patriarchy Hurts Men Too

2 COMMENTS

Leave a Reply