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आकांक्षा सिन्हा

हिन्दूधर्म के वेदों में मासिकधर्म को कहीं भी अपवित्र नहीं माना गया है| लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे हिन्दू समाज में माहवारी को शर्मनाक और घृणित माना जाता है| यह निषेध है| लोग इसके बारे में बात करने में सहज महसूस नहीं करते। ताज्जुब होता जब विकास और प्रगतिशीलता के मार्ग पर आगे बढ़ते समाज में लिंग-असमानता के तत्व के तौर माहवारी जैसे मुद्दों पर लोगों की जुबान चुप होती दिखाई पड़ती है|

इन सबकी कई वजहें हैं जो समय-समय पर समाज की दकियानूसी बातों को कायम रखने में अपना योगदान देती है| गौरतलब है कि समाज में लोगों ने हर बुनियादी चीजों से दूरी बना ली है| इसका सटीक उदाहरण है आज भी हमारे समाज में पुरुषों का माहवारी के विषय में संकोच करना| जबकि ये बात आज के दौर की है जब टीवी में हर दूसरे विज्ञापन में हम सेनेटरी पैड और महिलाओं के मुश्किल दिनों की तमाम दवाईयों का विज्ञापन देखते हैं| पुरुषों के इस व्यवहार की मूल वजह से उनकी अज्ञानता और इस अज्ञानता की वजह से उन्हें कभी-भी इस विषय की बातचीत में शामिल नहीं होने दिया जाना|

सदियों से माहवारी को एक अभिशाप के रूप में देखा जाता रहा है| लेकिन वास्तव में, यह महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बड़ा आशीर्वाद है। जब हम मासिकधर्म पर स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से इसका वैज्ञानिक अध्ययन करते है तभी हम इसकी महत्ता को समझ सकते हैं| पर इन सबसे ठीक उल्टा हम इसे अपवित्र कहकर गोपनीयता का विषय बना लेते है, जिससे इससे जुड़े मिथ्य रुके हुए पानी की तरह इसमें लगातार सडन पैदा करके इसके अपवित्र होने को प्रमाणित करते है| नतीजतन महिला के जीवन के हर महीने के उन कुछ दिनों ने उसके अस्तित्व की कमजोर प्रतिमूर्ति तैयार कर दी और महिलाओं ने भी इसे उसी रूप में स्वीकार करना शुरू कर दिया कि ये उनके लिए एक अभिशाप है जो उन्हें कमजोर करता है|

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समाज में लोगों ने हर बुनियादी चीजों से दूरी बना ली है|

आधुनिकता और तकनीक के इस वैज्ञानिक दौर ने महिलाओं की इस शिकायत के आधार पर मासिकधर्म के दौरान होने वाली शारीरिक समस्याओं से निपटने के लिए तमाम तरह की दवाओं और उपचारों का बड़ा बाज़ार खड़ा कर दिया| इसने महिलाओं को उनकी शिकायत दूर करने की सुविधा तो दी लेकिन इससे महिलाएं खुद अपने शरीर से दूर होती गयी| वे इन उपचारों का इस्तेमाल मासिकधर्म के दौरान खुद को अपवित्रता से बचाने या ज़ल्द निपटने के दृष्टिकोण से करने लगी|

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मीडिया ने भी इन बाज़ारों को खड़ा में और महिलाओं को उनके तन के भूगोल में उलझाने में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया| इसके तहत उत्पादों के कई विज्ञापन तैयार किये गये, जिसमें इस बात को केन्द्रित किया गया कि महिलाएं कैसे इन उत्पादों के इस्तेमाल से अपने मुश्किल दिनों की समस्याओं से छुटकारा पा सकती है| उनके इस संदेश ने जाने-अनजाने में मासिकधर्म के दौरान योनि से निकलने वाले खून को दूषित और छिपाए जाने का विषय बना दिया| उत्पादों को इस तर्ज पर तैयार किया गया कि मासिकधर्म के दौरान महिलाओं को होने वाली हर समस्या फिर चाहे कपड़े में दाग़ लगने की समस्या हो या पेडू दर्द या फिर इकट्ठे खून से आने वाली दुर्गन्ध की समस्या हो इन सबसे निजात मिले और वे यह भूल जाए कि उनके मासिकधर्म शुरू हो गये| इतनी जद्दोजहद के बाद वे इस रणनीति में सफल भी हुए| अब बाज़ार में बड़ी मांग उन उत्पादों की है जिसके इस्तेमाल से मासिकधर्म के दौरान महिलाएं भी उन्हें इसके होने का एहसास न हो|

उपचारों का इस्तेमाल मासिकधर्म के दौरान खुद को अपवित्रता से बचाने या ज़ल्द निपटने के दृष्टिकोण से करने लगी|

मासिक धर्म के प्रति हर संस्कृति का अपना दृष्टिकोण होता है| जिस संस्कृति में महिलाओं को उनके मासिकधर्म के दौरान भी सामान्यरूप से सम्मानपूर्वक स्वीकार किया जाता है वहां महिलाएं आत्म-विश्वासी महसूस करती है| उनका यह अनुभव न केवल उनके बल्कि समाज के लिए भी कल्याणकारी होता है|

मुझे भी मासिकधर्म पर अपनी दादी की कही बातें याद है| वह कहती थी कि मासिकधर्म महिलाओं की शक्ति का श्रोत है| ये एक ऐसा जादू है जो दुनियाभर की महिलाओं को आपस में जोड़ता है| इससे हर महीने महिला अपने ज़रिए दुनिया में नया जीवन लाने की क्षमता को इक्कठा करती है| पर साथ ही, वह ये भी कहती थी कि यहाँ नया जीवन का मतलब सिर्फ बच्चे से नहीं है| बल्कि इसका ताल्लुक महिला के अस्तित्व, उसके विचार, अनुभव और शक्ति से है|  

बाज़ार में बड़ी मांग उन उत्पादों की है जिसके इस्तेमाल से मासिकधर्म के दौरान महिलाएं भी उन्हें इसके होने का एहसास न हो|

लेकिन अब मासिकधर्म में दादी-नानी के ऐसे किससे गुजरे जमाने की बात हो गयी है| आज महिलाओं में शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उन्हें कई तरह की सामाजिक, आर्थिक, मानसिक और शारीरिक समस्याओं का समाना करना पड़ता है| इसके के लिए ज़रूरी है समाज में ज़रूरी बदलाव लाये जाएँ| महिलाओं से जुड़े मासिकधर्म जैसे विषयों को समस्या के रूप से बाहर निकालकर उनके स्वस्थ्य जीवन के लिए ज़रूरी तत्व के तौर पर स्थापित करना ज़रूरी है| समाज में महिला के जीवन में मासिकधर्म एक ऐसा समय हैं जब उनकी सभी समस्याओं को आमतौर पर अनदेखा किया जाता है, जिसे हमें बदलना होगा| हमें समझना होगा कि अगर इन दिनों महिलाओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया जाए तो यह न केवल महिला बल्कि स्वस्थ समाज के लिए भी फायदेमंद होगा|

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अब यह वह समय है जब दुनिया की सभी महिलाएं ‘जीवन की लाल नदी’ में गहरे गोता लगाकर अपनी ताकत बहाल करें। महिलाओं को अपने पूर्वजों के ज्ञान की गहराई तक पहुंचाना चाहिए और इस पवित्र समय के मूल्य को जारी करना चाहिए। यह पितृसत्तात्मक समाज की उन सभी नकारात्मक मान्यताओं को बदलने का समय है, जो रचनात्मक और उपयोगी हो सकता है। पर ऐसा होना, हम सभी महिलाओं के कर पाने पर निर्भर करता है कि आने वाले समय में हमारी बेटियों का जीवन शर्म की बात और अपराध से भरा होगा या खुशी और शक्ति से भरा होगा। जरूरी है इस बात को समझना कि खुशी केवल हमारी पसंद नहीं है यह हमारी जिम्मेदारी है।


यह लेख आकांक्षा सिन्हा ने लिखा है जो इससे पहले मुहीम में प्रकाशित किया जा चुका है|

फ़ोटो साभार : Brodly vice  

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