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परिवार एक ऐसी संस्था में महिला को परिवार की उन परंपराओं से मुक्ति चाहिए जिससे उनके अधिकारों और स्वतंत्रता को बांधकर रखा गया है। महिलाओं की ये मांग कोई आज की नहीं बल्कि सालों पुरानी है जो आज भी किसी न किसी रूप में कायम है| स्त्रीवादियों ने स्त्रीवादी आंदोलन की शुरुआत भी इसी मांग के साथ की थी, जिसमें उनकी सीधी मांग पितृसत्ता से महिला-स्वतंत्रता की रही| इसपर एंगेल्स कहते हैं कि “औरत जाति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक हार मातृसत्ता से पितृसत्तात्मक समाज का अवतरण था।”

हमारा भारतीय समाज पितृसत्ता की देन है। पितृसत्ता जहां पिता ही परिवार का मुखिया होता है| परिवार संस्था भी पितृसत्ता की एक शाखा है जहां निर्णय और अधिकारों की स्वतंत्रता केवल पुरुष वर्ग के पास ही सुरक्षित है। इसके तहत परिवार संस्था में महिला की कभी भी कोई स्वतंत्र संज्ञा नहीं रही| उसका नाम जन्म से मृत्यु तक पिता, पति और पुत्र के साथ पैबंद की तरह जुड़ा होता है। पितृसत्तात्मक समाज में चूँकि औरत को पुरुष की संपत्ति के तौर पर देखा जाता है और परिवार संस्था में महिला पर पुरुष का पूरा अधिकार होता है इसलिए आज औरत की लड़ाई बाहर के किसी भी स्त्रीवादी आंदोलन से अलग इस परिवार संस्था में ही उसके स्वतंत्र अस्तित्व से है।

एंगेल्स कहते हैं कि “औरत जाति की सबसे बड़ी ऐतिहासिक हार मातृसत्ता से पितृसत्तात्मक समाज का अवतरण था।”

अब सवाल यह है कि आज की स्त्री को परिवार संस्था के उस परंपरागत ढाँचे में ही अपनी अस्मिता की तलाश क्यों करनी पड़ी? चूँकि किसी भी समाज की पहली ईकाई परिवार को माना जाता है जहाँ से किसी भी तरह सामाजिक प्रक्रिया की शुरुआत होती है, फिर चाहे वो समाजीकरण हो या सामाजिक बदलाव और महिलाओं के संदर्भ में पितृसत्ता के तहत महिलाओं पर पुरुषों के प्रभुत्व स्थापित करने की पहली ईंट भी इसी संस्था में रखी जाती है, जहां उसके स्वतंत्र अस्तित्व को लगातार नकारा जाता है| इसलिए अपने अस्तित्व के तलाश की शुरुआत महिला को अपने घर से करनी पड़ती है|

परिवार में स्त्री-पुरुष का संबंध

परिवार संस्था में स्त्री और पुरुष का संबंध विवाह संस्था के ज़रिए ही जुड़ता है| हमारे भारतीय परिवार में शादी के बाद ही स्त्री और पुरुष में यौन-संबंध स्थापित हो सकते हैं जिससे परिवार और समाज आगे बढ़ सकें। पितृसत्तात्मक समाज में विवाह के बाद पत्नी का सब कुछ तो पति का होता है लेकिन पति का सब पत्नी का नहीं हो होता है। कानूनी आधार पर आज भले ही महिलाओं को तमाम अधिकार दिए गये है पर वास्तव में पितृसत्ता इन्हें किसी भी रूप में अपनाने को तैयार नहीं होती है| शादी के बाद से महिला का अस्तित्व पत्नी में सिमटने लगता है जिससे उसपर जिम्मेदारियों का भार तो बढ़ता है पर खुद के लिए फैसले लेने से लेकर उसने अपने अधिकारों का झोला खाली होता चला जाता है|

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भेदभाव का बीज बोता परिवार

परिवार संस्था में बेटे और बेटी के प्रति भेदभाव महिला के अवचेतन मन में संक्रमण करता चला आ रहा है। अवचेतन मन में बैठी गैर-बराबरी की यह भावना औरत को परिवार के सामने विद्रोह की मुद्रा में खड़ी करती है। परिवार में अगर एक बेटा और बेटी है तो बेटे को भविष्य की आशा मानकर उसे केंद्र में रखा जाता है| उन्हें महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाया जाता और बेटी को पराया धन मानकर उस पर व्यर्थ धन न खर्च करते हुए सस्ते स्कूलों में सिर्फ इतना ही पढ़ाया जाता है जिससे उसकी शादी हो सके| सामाजिक संस्थान में पूरे अधिकार क्योंकि पुरुष के पास सुरक्षित है इसलिए अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए स्त्री के खिलाफ स्त्री खड़ी है| अगर बेटी उन सभी जिम्मेदारियों को पूरा करे जिसकी उम्मीद बेटे से की जाती है इसके बावजूद परिवार में बेटी के अधिकारों में कोई ख़ास बढ़त नहीं होती| बल्कि इसके उलट उसे परिवार में कमाई का जरिया भी माना जाने लगता है| बहुओं के संदर्भ में परिवार या यूँ कहें कि पितृसत्ता का नजरिया और रवैया यही रहता है|

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सुरक्षा नहीं कौमार्य सुरक्षा कहिये

परिवार का नाम सुनते ही हमारे जहन में अपने लिए एक सुरक्षित जगह की तस्वीर बनने लगती है| महिलाओं के संदर्भ में पितृसत्तात्मक समाज में सुरक्षा की सीधी लकीर घर की औरतों के लिए खींची गयी और जिसमें सुरक्षा के दायरे में औरत के कौमार्य को किसी निर्धारित पुरुष के हवाले करने से पहले तक उसके कौमार्य की सुरक्षा को केंद्र में रखा गया| पर वास्तव में सुरक्षा की इस लकीर का किस्सा सिर्फ ऊपरी तौर पर ही उन्हें सुरक्षित रखने तक सिमटा रहा है| इस बात का अंदाज़ा हम मौजूदा समय में बलात्कार या यौनाचार के मामलों में नब्बे फीसद जान-पहचान वाले या सगे-संबंधी होने से लगा सकते है| सत्ता, संस्था और सामाजिकता के नामपर महिलाओं को व्यवस्थित रूप में बाँधने का काम तो बखूबी किया जाता है पर बिना ये सोचे कि इससे महिलाओं के अस्तित्व की कैसी परिभाषा रची जाती है|

तन के भूगोल से परे की पहचान

परिवार के यथार्थ में स्त्री के मुक्ति के सवालों पर पितृसत्तात्मक समाज इसमें भी औरत को ही दोषी मानता है। औरत को खुद ही उसकी हालत के लिए जिम्मेदार माना गया है| पर अब सवाल यह है कि क्या औरत का सबसे बड़ा गुनाह क्या यह है कि वह औरत है ? आज की औरत परिवार के यथार्थ से साक्षात्कार करती हुई स्त्री मुक्ति के रास्ते परिवार से बाहर खोजती है। आर्थिक और सामाजिक रुप से सशक्त होने की आवश्यकता ने स्त्री को परिवार से बाहर भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने को मजबूर किया। यहाँ हमें समझना होगा कि स्त्री संघर्ष यात्रा में अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं निकली है बल्कि उसने सुविधा को छोड़कर संघर्ष को चुनना पसंद किया है। वह देह से नहीं श्रम और बुद्धि से पहचानी जाना चाहती है|

पाश की कविता में कहें तो –

लड़ने की जरूरत बाकी रहने तक लड़ना चाहती है,
वह धोखा खाकर आत्महत्या नहीं करती जिंदा रहना सीख रही है यही इस सदी का सच है ।”


यह लेख श्वेता प्रजापति ने लिखा है, जो इससे पहले मुहीम में प्रकाशित किया जा चुका है|

तस्वीर साभार : राजस्थान पपेट 

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