FII is now on Telegram
2 mins read

टीवी पर सेनेटरी नैपकिन का विज्ञापन आ रहा है और घर का हर बड़ा (वयस्क) सदस्य बगलें झाँक रहा है| बच्चे उत्सुकता से देख रहे हैं…। यह कोई नई बात नहीं है। जब से टीवी पर विज्ञापनों ने अपनी जगह बनाई है तब से आज तक महिलाओं की निजी इस्तेमाल की चीज़ों के विज्ञापन आने पर करीब हर घर में यही दृश्य होता है। महिला होना और महिला के शरीर को इतना शर्मनाक क्यों बना दिया गया है?

एक बच्ची जब युवा होने की ओर पहला कदम उठाती है, तब सबसे प्राथमिक शारीरिक और मानसिक बदलाव होता है। पीरियड्स का शुरू होना ठीक उसी तरह से है, जैसे बच्चा युवा होने की ओर बढ़ता है तो मूँछ दाढ़ी निकलने लगती है।

अधकचरी जानकारी और स्त्री के शरीर को रहस्य की तरह प्रस्तुत करना ही हमारे समाज में समस्याओं को बढ़ा रहा है।

तो जब रेज़र शेविंग क्रीम के विज्ञापन और खरीद पर कोई शर्मिंदगी नहीं है, फिर सेनेटरी नैपकिन की खरीद और विज्ञापन पर इतनी शर्म और हिचक क्यों? क्या ये सहज और ज़रूरी प्रक्रिया नहीं है? क्या कोई पुरूष कल्पना भी कर सकता है… हर महीने 3 से 5 दिनों तक किसी पीड़ादायी रक्त स्राव के साथ सामान्य दिनचर्या की। पर महिलायें बेहद शालीनता के साथ इसे निभा रही हैं।

और पढ़ें : पीरियड पर चुप्पी की नहीं चर्चा की ज़रूरत है

मासिक चक्र शुरू होते ही घर की महिलाओं का हिदायती पिटारा खुल जाता है, जिनमें बहुत कम बातें काम की होती हैं और बाकी सब बेकार। इतनी बातें जो लड़कियों को समझाई जाती हैं अगर उसकी अाधी भी माँ- बाप लड़कों को समझा दें तो अाधी समस्या अपने आप खत्म हो जाए।आज स्कूलों में लड़के-लड़कियाँ साथ पढ़ते हैं। ऐसे में पीरियड्स के दौरान लड़कियां भयभीत और तनावग्रस्त रहती हैं। इसका सीधा असर उनकी पढ़ाई और दूसरी स्कूली गतिविधियों पर पड़ता है।

मासिक चक्र शुरू होते ही घर की महिलाओं का हिदायती पिटारा खुल जाता है, जिनमें बहुत कम बातें काम की होती हैं और बाकी सब बेकार।

अक्सर ऐसा होता है कि किसी लड़की के पीरियड्स आ जाते हैं तो लड़के उसका मज़ाक बनाते हैं शर्मिंदा करते हैं। क्योंकि उन्हें इस बारे में पता तो होता है पर ग़लत तरीके और ग़लत स्रोतों से। माँ को चाहिये कि वो अपने बेटों को भी सही तरीके और पूरी ज़िम्मेदारी के साथ इन शारीरिक बदलावों के बारे में सही जानकारी दें, जिसस वे ज़्यादा संवेदनशील बन सकें।

और पढ़ें : अधिकारों की अंधी दौड़ में किशोरावस्था के भयानक परिणाम

अगर आप ख़ुद शर्म और झिझक में ग़लत जानकारी देंगी या हँसी उड़ायेंगी तो वे कहीं न कहीं से पता लगायेंगे है और यहीं से सारी समस्याओं का जन्म होता है। अधकचरी जानकारी और स्त्री के शरीर को रहस्य की तरह प्रस्तुत करना ही हमारे समाज में समस्याओं को बढ़ा रहा है।

शर्मिंदगी की बात पीरियड्स होना नहीं बल्कि हमारा शर्मनाक रवैया है। सहज शारीरिक परिवर्तन और हारमोनल बदलाव पर एक लड़की का भी उतना ही अधिकार है जितना कि एक लड़के का। इसके लिये उन्हें शर्मिंदा करके उनके सहज शारीरिक और मानसिक विकास में बाधा न डालें बल्कि उनका साथ दें।


ये लेख इससे पहले मेरा रंग में प्रकाशित किया जा चुका है, जिसे मनीषा श्रीवास्तव ने लिखा है|

तस्वीर साभार : Abstract

Support us

Leave a Reply