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तब प्रिया की उम्र करीब सोलह या सत्रह साल की होगी, जब वो बाल यौन-शोषण का शिकार हुई थी| इस घटना ने उसे बुरी तरह से झकझोर दिया और इसका प्रभाव उसके दिमाग पर पड़ा| इतना ही नहीं, इस घटना के बाद परिवारवालों ने उपाय के रूप में उसकी जल्द शादी को चुना और उसकी पढ़ाई पर रोक लगा दी| नतीजतन प्रिया परिवार के नकारात्मक रवैये से बीतते समय के साथ-साथ मानसिक बिमारी का शिकार हो गयी| आखिर में उसकी शादी संतोष से हुई, जो ज्यादा दिन नहीं चली और प्रिया के ससुराल वालों ने प्रिया को पागल करार कर छोड़ दिया| मायके वालों ने प्रिया को समस्या समझकर उसे मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया|

शुरूआती दिनों में उसकी माँ उससे मिलने हॉस्पिटल जाया करती, लेकिन बाद में वो भी बंद हो गया| घरवालों ने प्रिया से सारे नाते तोड़ लिए| प्रिया को कुछ दिन बाद कलकत्ता के मेंटल हॉस्पिटल भेज दिया गया, जहाँ वो अस्पताल में अंजली संस्था की मुहिम के संपर्क में आई और उसने जल्द ही रोजगार कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जिससे उसका मानसिक स्वास्थ्य सुधरने लगा| समय के साथ प्रिया मानसिक रूप से ठीक हो गयी और उसकी मुलाकात महेश से हुई जो उससे बेपनाह प्यार करता है| प्रिया और महेश की शादी को अब करीब पांच साल बीत चुके है और उनकी बेटी ख़ुशी भी स्कूल जाने लगी है|

प्रिया अकेली नहीं है और इस बात से हम और आप अच्छी तरह वाकिफ हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को हम सिर्फ और सिर्फ बीमारी के रूप में देखते है, जिसके आधार पर पीड़ित के साथ दुर्व्यवहार करते है| ऐसे में अगर बात मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता की हो तो ये पहलू हमारी सोच से कोसों दूर दिखाई पड़ता है|

हम माने या न माने मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र आज भी हमारी चर्चा में कहीं शामिल नहीं होता है|

चंद शब्दों में सिमटी हमारी मानसिक स्वास्थ्य की समझ

मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसा शब्द है जिसपर आमतौर पर हमारी समझ बीमारी या समस्या के पर्यायवाची के रूप में होती है| शायद इसी धारणा का ही परिणाम ये है कि हम जब भी गूगल में मानसिक स्वास्थ्य को तलाशते हैं तो उसमें अक्सर मानसिक स्वास्थ्य को – उपचार में देरी, समस्या, निदान और तमाम तरह की सावधानियों जैसे स्तंभों तक सीमित पाते है| सच कहूँ तो मानसिक स्वास्थ्य को लेकर मेरी समझ पहले इन्हीं स्तंभों तक सीमित थी|

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मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता क्र मुद्दे पर ‘अंजली’ की बेहतरीन पहल

लेकिन वास्तव में मानसिक स्वास्थ्य का संबंध इन सबकी बजाय बेहद वृहत है| बीते दिनों कलकत्ता में मानसिक स्वास्थ्य के इस वृहत क्षेत्र को समझने, उजागर करने और काम में शामिल करने की दिशा-दशा निर्धारित करने के संदर्भ में छह दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया| मैंने बतौर प्रतिभागी इस प्रशिक्षण में हिस्सा लिया| उल्लेखनीय है कि यह प्रशिक्षण मानसिक स्वास्थ्य पर सालों से काम कर रही संस्था ‘अंजली’ की तरफ से मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता को केंद्र में रखकर आयोजित किया गया था|

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इस प्रशिक्षण की रुपरेखा एक बौद्धिक और रचनात्मक कार्यक्रम के रूप में तैयार की गयी थी, जिसमें देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आये प्रतिभागी मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता से जुड़े अनेक पहलुओं पर स्वस्थ चर्चा के माध्यम से परिपक्व समझ बनाई, जो सीधेतौर पर इस प्रशिक्षण की सफलता का सूचक है|

सफल प्रशिक्षण में पारंगत प्रशिक्षकों का साथ

मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित इस प्रशिक्षण में करीब पन्द्रह अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े बुद्धिजीवियों ने प्रशिक्षक की भूमिका अदा की| प्रशिक्षण में यौनिकता के विषय पर प्रतिभागियों की मजबूत समझ बनाने के लिए प्रमदा मेनन, मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के संबंध के विषय पर अंजली की संस्थापिका व प्रसिद्ध कार्यकर्ती रत्नाबोली रे, घरेलू हिंसा, मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के विषय पर अनुराधा कपूर, भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े क़ानूनी पहलुओं के लिए अम्बा, साहित्य में मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के विषय पर परोमिता व मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अधिकार के विषय पर केतकी रनाडे जैसे कई अहम विषयों पर रूमी हरीश, रुचिरा गोस्वामी, शैल्स महाजन, मो.तारीक व चयनिका शाह जैसे पारंगत प्रशिक्षकों ने प्रतिभागियों की समझ को और विस्तृत करने की दिशा में अहम भूमिका अदा की|

ज़रूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा के क्षेत्र से परे अपने जीवन के केंद्र में रखकर सोचा-समझा जाए|

‘जिन्दगी जीने की कला है ‘मानसिक स्वास्थ्य’

प्रशिक्षण में सभी के अनुभवों और सीख ने मुझे व्यक्तिगत स्तर पर बेहद प्रभावित किया| साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य और यौनिकता के विषय पर मेरी समझ को और विस्तृत करने में अहम भूमिका अदा की है| प्रशिक्षण के पहले मानसिक स्वास्थ्य पर मेरी समझ चंद स्तंभों तक सीमित है लेकिन अब मैं इसे इंसान से जुड़े एक अहम पहलू के रूप में समझ सकती हूँ| एक ऐसा पहलू जिसपर इंसान के जीवन जीने का ढंग, उसका सामाजिक जीवन या यों कहूँ कि उसका पूरा विकास आधारित है| इसलिए ज़रूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य को चिकित्सा के क्षेत्र से परे अपने जीवन के केंद्र में रखकर सोचा-समझा जाए|

हम माने या न माने मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र आज भी हमारी चर्चा में कहीं शामिल नहीं होता है| इसके कई वाजिब कारण भी है और इन्हीं कारणों का नकारात्मक प्रभाव ये है कि हम मानसिक अस्वस्थता को ‘पागलपन’ और उससे पीड़ित इंसान को समाज के लिए अनचाहा समझते है| वहीं दूसरी तरफ, मौजूदा समय में जब हर क्षेत्र बाजारीकरण और तथाकथित विकास (आर्थिक मानकों के संदर्भ में) की चपेट में है, ऐसे समय में इसतरह के प्रशिक्षण का आयोजन वक़्त की मांग है| खासकर उनलोगों के साथ जो सीधेतौर पर समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में काम कर रहे है|

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तस्वीर साभार : अंजली संस्था

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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