‘सुपरवुमन’ का तमगा ही है सबसे खतरनाक!

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‘सुपरवुमन’ का तमगा ही है सबसे खतरनाक!
‘सुपरवुमन’ का तमगा ही है सबसे खतरनाक!

पूजा यादव 

आज महिलाओं ने घर से बाहर निकलकर काम करना शुरू कर दिया है| देश की आधी आबादी यानी महिलाएं अब कॉर्पोरेट सेक्टर से लेकर ऐसे काम भी करने लगी हैं, जो पहले सिर्फ पुरुषों के लिए ही समझे जाते थे| भले ही, महिलाओं के विभिन्न सन्दर्भों में होने वाले ये विकास की तस्वीर उभरती दिखाई देती है| लेकिन फिर एक ऐसी रिपोर्ट सामने आती है जो इस सुंदर तस्वीर पर एक काली स्याही के धब्बे सामान दिखाई पड़ती है| इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने के बजाय घटने लगी है|

वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम की जेंडर गैप रिपोर्ट में, भारत को 144 देशों में से 108 स्थान मिला, जबकि आर्थिक मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन और भी खराब रहा| इसमें आर्थिक भागीदारी और अवसर के मानदंडों पर भारत 139 स्थान पर है| हैरानी की बात ये है कि भारत में महिलाओं की संख्या बढ़ने की जगह और भी घट रही है| अगर ये आंकड़े ऐसा न होते तो भारत 27 फीसद तक और भी ज्यादा अमीर देश बन सकता था|

इसके पीछे कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से महिलाओं को अपने अन्दर मौजूद काबिलियत के बावजूद खुद को पीछे खींचना पड़ता है|ये रिपोर्ट महिलाओं की बेहद गंभीर दशा को दर्शाती है जिसमें वह आगे बढ़ने की बजाय खुद को पीछे ढकेलती हुई नज़र आती हैं| इसमें एक सबसे बड़ा कारण जो सामने आता है वो है महिलाओं पर दोहरा कार्यभार| इसका मतलब है अगर कोई महिला बाहर काम करती है तो उसे अपने घरेलू कामों को भी करना पड़ता है|

सुपरवुमन का तमगा महिलाओं का शोषण करता है, जिसमें वह एक खुद को एक आम महिला के तौर पर नहीं प्रदर्शित कर सकती है|

इसी तरह एक महिला चाहे किसी भी पद पर मौजूद हो उससे घर के काम करने की अपेक्षा की जाती है|इस तस्वीर में घी डालने का करते हैं टीवी पर आने वाले विज्ञापन| कुछ सालों पहले एक विवादित विज्ञापन भी आया था, जिसमें एक महिला ऑफिस की बॉस होती है, जबकि उसका पति उसी ऑफिस का एक आम कर्मचारी होती है| इस विज्ञापन में महिला बॉस ऑफिस से घर जाने के बाद अपने पति के लिए खाना बनाती है|इससे कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि चाहे एक महिला कितने भी बड़े पद पर पहुँच जाए उसे अपने घरेलू कामों से छुटकारा नहीं मिल सकता है|

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इस विज्ञापन का विरोध हुआ कि आखिर क्यों एक महिला को दोहरे काम का भार झेलना पड़ता है| गौरतलब है कि अगर कोई महिला ऐसी करती हुई दिखाई देती है तो, उसे ‘सुपर वुमन’ की उपाधि दे दी जाती है|

यही छवि सबसे खतरनाक है, जो महिलाओं पर एक तथाकथित ‘सर्वगुण संपन्न’ होने का दबाव डालती है, जिसमें महिलाएं खुद को ढालने का प्रयास करती हैं और जब वह इस दोहरे कार्य के भार को झेल नहीं पाती हैं तो वह ऑफिस और घर के बीच घर को चुनना ज्यादा बेहतर समझती हैं|समाज की रूढ़िवादी सोच की वजह से एक लड़की को नौकरी करने के लिए पहले अपने परिवार को मनाना पड़ता है| यहाँ तो जैसे-तैसे वो अपने परिवार को मनाकर नौकरी करने लगती हैं|

लेकिन शादी के बाद आमतौर पर वह ससुराल वालों और खुद को सामाजिक अलगाव से बचाने के लिए अकसर अपने कदम पीछे कर लेती हैं| साल 2012 में एक सर्वे में 84 फीसद भारतीय इस बात पर सहमत हुए कि कम नौकरियां होने की स्थिति में महिलाओं को काम करने का कम अधिकार है| ऐसी स्थिति होने  पर पुरुषों को नौकरी में ज्यादा वरीयता देनी चाहिए|

समाज की रूढ़िवादी सोच की वजह से एक लड़की को नौकरी करने के लिए पहले अपने परिवार को मनाना पड़ता है|

ऐसे में ये समाज का दिया गया सुपरवुमन का तमगा महिलाओं का शोषण करता है, जिसमें वह एक खुद को एक आम महिला के तौर पर नहीं प्रदर्शित कर सकती है| आज के प्रतियोगिता के माहौल में महिलाओं को सबसे ज्यादा प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है|

महिलाओं के कंधों पर प्रतियोगिता का भार डाल दिया जाता है, यह पुरुष प्रधान समाज का सुपरवुमन के रूप में दिया हुआ एक ऐसा भार है, जिससे महिलाओं को हर कदम पर किसी न किसी प्रकार की हीन भावना और शोषण का शिकार होना पड़ता है|

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एक महिला इसी वजह से समाज को अपमे आदर्श स्त्री होने के किरदार से संतुष्ट करने में अपना सारा जीवन बिता देती है| इसीलिए यह बेहद ज़रूरी है कि महिलायें अपने ऊपर डाले जा रहे भार को लेने से बचें और खुद को एक सुपर वीमेन को बनने से बचाए रखें|


Pooja Yadav is a graduate in English Journalism from Kamala Nehru College, Delhi University and post-graduate in Radio & TV Journalism from Indian Institute of Mass Communication (IIMC, Delhi). Follow her on Facebook

तस्वीर साभार : beachange

1 COMMENT

  1. मुबारक हो आज की महिला सशक्त हो चुकी है, हमारी सरकार ने भी सकारात्मक सोच के साथ काफी काम किया है महिला सशक्तिकरण पर, ५०% आरक्षण तक आज महिलाओ के लिए हमारे विधान में है, तो महिलाए कही न कही आज अग्रशर हो चुकी है, ThatsPerosnal कंपनी जो की पर्सनल वैलनेस उत्पादों के लिए जनि जाती है कही न कही महिला सशक्तिकरण के लिए काफी हद तक स्वयं महिलाओ एवं सरकार को ही जिम्मेदार मानती है और स्वयं उनका धन्यवाद् करती है.

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