‘सुसाइड नोट’ पर प्रतियोगिता करवाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के नाम खुला खत

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‘सुसाइड नोट’ पर प्रतियोगिता करवाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के नाम खुला खत
‘सुसाइड नोट’ पर प्रतियोगिता करवाने वाले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्रों के नाम खुला खत

तोषी

प्रिय शताब्दी हास्टल के सथियों,

मुझे यह देखकर  बहुत ख़ुशी होती है कि विश्वविद्यालय में पढ़ाई से इतर गतिविधियों का आयोजन हो रहा है। ख़ुशी से कौतूहल वश मैं आपका पोस्टर देखकर रुक गयी। ‘द अवेकनिंग’ यही है न आपके कार्यक्रम का नाम? कार्यक्रम में ऐसे कई हिस्से हैं जिन्हें देखकर अच्छा लगा, लेकिन एक ऐसा हिस्सा भी है जिसने ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम कितने असंवेदनशील है?

उस कार्यक्रम के तहत 250 शब्दों में सुसाइड लेटर लिखना है। आज तक मैंने ढ़ेरों लेखन प्रतियोगिताओं के बारे में सुना, लेकिन ‘सुसाइड नोट’ किसी लेखन प्रतियोगिता का विषय हो ये पहली बार देख रही हूँ| बेशक ये कुछ नया करने वाली होड़ में आकर्षक है, लेकिन सच कहूँ तो ये उस होड़ का हिस्सा है जो पूरी तरह से अंधी है| ये बहुत पुरानी घटना नहीं है जब यूनिवर्सिटी में एक 18 साल के लड़के ने आत्महत्या को गले लगा लिया था। हम आत्महत्या करने की घटना को लेकर ये समझते हैं कि ये दुनिया का सबसे कायरों वाला काम हैं। अब ऐसे कार्यक्रम को आयोजित करने के पीछे आप सबकी मंशा क्या है? ये मेरी समझ के परे है, क्योंकि यहाँ मैं इस कार्यक्रम के उद्देश्य को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज की सोच के परिपेक्ष्य में देख रही हूँ| ऐसे में सवाल ये है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर और खुद सुसाइड नोट के लिखे जाने की मंशा के पीछे के विमर्श पर आप कितने असंवेदनशील हैं।

शिक्षा जब तक आपको संवेदनशील न करें तब वह शिक्षा व्यवस्था ही फ़ेल है|

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पिछले कुछ सालों से अमूमन हर साल एक सुसाइड का केस दर्ज हुआ है। कोई इंसान जब ज़िन्दगी के बजाए मौत को गले लगाता है तो उस वक़्त उसे ज़िन्दगी की अपेक्षा उसे मौत ज्यादा सरल लगती है| ऐसा इसलिए नहीं होता है कि वो कायर है बल्कि ऐसा इसलिए होता है  क्योंकि उसको सही समय पर मदद नहीं मिलती है और वो अपनी समस्याओं के किसी समाधान तक नहीं पहुंच पाता है। किसी संस्थान में जब कोई आत्महत्या चुनता है तो वो उस संस्थान की सड़ चुकी व्यवस्था को इंगित करता है। जब कोई व्यक्ति समाज में आत्महत्या को चुनता है तो ये इस बात का इशारा होता है कि आपका समाज अलग विचारों और इंसानों के लिए नहीं है। बतौर छात्र हमें कम से कम अपने साथ वालों के प्रति इतना संवेदनशील होना चाहिये कि  हम आत्महत्या को कॉम्पिटिशन के तौर पर पेश न करें। 

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जाहिर तौर पर मुझे आयोजकों और परमिशन देने वालों की समझ पर न सिर्फ संदेह है बल्कि ऐसा लग रहा है कि ये सभी लोग घोर असंवेदनशील भी हैं| मानसिक स्वास्थ्य के साथ एक शब्द जुड़ा होता हैं ट्रिगर पॉइंट, यानी कि ऐसी कोई घटना, जगह या कुछ भी जो आपके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है और आपको आत्महत्या तक पहुँचा सकता हैं। एक 250 शब्दों में लिखा गया सुसाइड नोट आपके ही हास्टल के कई छात्रों के लिए न सिर्फ ट्रिगरिंग है, बल्कि उन्हें उस ओर धकेलने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकता हैं, जिसके परिणाम भयंकर हो सकते हैं।

उद्बोधन कार्यक्रम का पोस्टर

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इस कॉम्पिटिशन का आयोजन करके आपने उन सभी लोगों का मज़ाक बना दिया जो अब हमारे बीच नहीं है और जो रोज़ ज़िन्दगी और आत्महत्या के विचार के बीच झूल रहे है। वो चाहे इस देश के किसान हो, हाशिये पर खड़ा समुदाय हो, तमाम तरह के डिप्रेशन से जूझकर अपनी जान लेने वाले लोग हो या महिलाएं हो और आपके ही जैसे अन्य छात्र हो।

अगर आपने इस कॉम्पिटिशन को इस लिहाज़ से रखा है कि लोग इसके प्रति संवेदनशील होंगे तो भी आप गलत है क्योंकि इसका मतलब है कि आपका सामना किसी के भी सुसाइड नोट से नहीं हुआ है। ये बहुत दुःखद है कि मुझे उनके नाम यहां लिखने पड़ रहे हैं, जो अगर होते तो दुनिया थोड़ी बेहतरी की ओर बढ़ रही होती वर्जिनिया वुल्फ़ और रोहित वेमुला जैसे ऐसे अनगिनत लोग जो दुनिया को कुछ देना चाहते थे औऱ खुद को केवल एक सुसाइड नोट ही दे पाए। कई तो ऐसे भी थे जो सुसाइड नोट नहीं लिख पाये और कई ऐसे जिनके सुसाइड नोट आप तक पहुँच भी नहीं सके।

जब कोई आत्महत्या चुनता है तो वो उस संस्थान की सड़ चुकी व्यवस्था को इंगित करता है।

हो सकता है मेरे इस खुले खत के लिए कुछ लोग आकर कहें कि इतनी सी बात के लिए इतना लिख़ने कि क्या ज़रूरत है? मसला ये है कि ये किसी भी सभ्य समाज के लिए ये दुर्भाग्य का दौर होगा, जहाँ युवा समाज के अन्य मुद्दों को छोड़कर सुसाइड नोट लिखने की प्रतियोगिता  में हिस्सा लें| मैं ये सिर्फ मान कर कह रही कि जिन छात्रों ने ये कॉम्पटीशन ऑरेंज किया है वो मानविकी साहित्य और विज्ञान के छात्र होंगे लेकिन वे अपने ही विषयों के मर्म को समझ नहीं पाये हैं। एक सफल आयोजक होना एक बड़ा टैग होता है और एक आयोजक ये सब देखता है कि कैसे हर किसी का प्रतिनिधित्व तय हो सके। एक आयोजक कई मायनों में एक नेता होता है, जो खुद को आयोजक रखकर बाकियों से उनकी बात कहे जाने का मौका देता हैं| इसलिए उससे थोड़ी अधिक संवेदनशीलता की अपेक्षा रखी जाती है।

सोशल मीडिया में सुसाइड नोट पर आयोजित होने वाली प्रतियोगिता की पोस्ट

शिक्षा जब तक आपको संवेदनशील न करें तब वह शिक्षा व्यवस्था ही फ़ेल है| दुनियाभर के विषयों पर कॉम्पटीशन किया जा सकता था लिखने के लिए। मसलन डिप्रेशन या रोज़गार तमाम पर। लेकिन अगर हम सुसाइड नोट लिखने में होड़ करेंगे तो ऐसे में ये संदेश हम सुनिश्चित करेंगे कि दुनिया अपने ही लोगो के लिए नहीं हैं। अगर आप इसके बाद भी इस कार्यक्रम को करवाकर वाहवाही लूटना चाहते है और आपको ये लगता है कि ये बकवास है। तो फिर एक बार कहूंगी कि समय है अपनी संवेदनशीलता को रि चेक करिये।

 धन्यवाद!!


यह खत तोषी ने लिखा है| वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मानवविज्ञान की शोध छात्रा है|

तस्वीर साभार : mobile5213

2 COMMENTS

  1. Sisters Living Works is an organisation with a mission of Suicide free India. They would like to send out a press statement. Can we use this a a reference to be sent along with the statement.

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