हमारे भारतीय में अच्छी औरत की परिभाषा कुछ इसतरह गढ़ी गयी है कि सभ्यता, संस्कृति और समाज के लिए बनाये गये हर सकारात्मक शब्द इस अच्छी औरत के  पर्यायवाची लगते हैं| और इस परिभाषा की ख़ासियत ये है कि ये महिला के इंसान होने का हक़ पूरी तरीके से छीनकर उसे एक मूर्ति के रूप में प्रस्तुत करती है| यही वजह है कि हमारे पितृसत्तामक समाज को सोचती, बोलती और आगे बढ़ती महिलाएं अच्छी नहीं लगती है और अगर महिला दलित होतो ये न केवल पितृसत्ता बल्कि हमारी जाति-व्यवस्था को भी नागवार लगता है|

पर इन सब वर्जनाओं के बीच महिलाओं का लगातार आगे बढ़ना खासकर दलित महिलाओं का सशक्त रूप से सामने आना समाज के लिए शुभसंकेत है| आज हम बात करने जा रहे है ऐसी ही एक सशक्त दलित महिला की जिन्होंने अपने सघर्षों से न केवल दलित महिला को बल्कि नारीवादी आंदोलन को भी एक नई आवाज़ दी, वे हैं – रजनी तिलक|  

रजनी तिलक दलित नारीवादी आंदोलन की एक सशक्त आवाज थीं। वह लेखक-कवि होने के साथ-साथ एक कर्मठ संगठनकर्ता भी थीं। उन्होंने तमाम तरह के धार्मिक और पितृसत्तात्मक आडंबर से न सिर्फ खुद को दूर रखा, बल्कि अपने तमाम साथियों को भी तार्किक जीवन जीने और पितृसत्ता-जाति की जकड़नों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने के लिए लगातार प्रेरित किया।

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आर्थिक तंगी से जूझता रजनी का बचपन

रजनी तिलक का जन्म 27 मई 1958 को दिल्ली में हुआ था| इनके पिता एक दर्जी थे| इनके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी| इनके पूर्वज काम की तलाश में दिल्ली आये थे और फिर यहीं के होकर रह गए| पिता ने इनको बेहतर शिक्षा देने की भरपूर कोशिश की| मगर साल 1975 में उच्च माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के बाद आर्थिक तंगी इनकी पढ़ाई की रुकावट बनी| फिर वह सिलाई, कढ़ाई और स्टेनोग्राफी जैसे कामों को सीखने लगी| आगे की पढ़ाई पूरी न होने की वजह से रजनी को काफी दुःख हुआ था, जिसका बाद में इन्होंने ज़िक्र भी किया था| मगर पिता के बस में जितना था| उन्होंने इनको पढ़ाया| रजनी घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए परिवार की मदद करने का फैसला किया| फिर अपनी कुशलता के अनुसार इन्होंने भाई-बहनों के देखभाल का भी बीड़ा उठा लिया| आईटीआई के दौरान जब रजनी ने अन्य समान विचारधारा वाली महिलाओं और दोस्तों के संपर्क में आईं| तभी से सामाजिक कार्यों में उनकी सक्रियता शुरू हो चुकी थी|

रजनी तिलक अपने अथक प्रयास से दलित आंदोलनों में आजीवन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं|

संगठन, शक्ति और ‘रजनी’

रजनी ने दिल्ली में भारतीय दलित पैंथर्स के नाम से एक संगठन स्थापित किया| इन्होंने आह्वान थियेटर नामक एक समूह और युवा अध्ययन मंडल की स्थापना करके छात्रों की जागरूकता को बढ़ाने का भी बीड़ा उठाया|

इसी दौरान रजनी ने आंगनबाड़ी श्रमिकों के साथ मिलकर राष्ट्रीय स्तर पर एक संघ का गठन किया| इस संघ के अंतर्गत वेतन के मुद्दों को लेकर एक बड़ी सभा का आयोजन भी किया, जिसमें लगभग 40 हजार आगनबाड़ी महिलाओं को एक साथ इकठ्ठा किया गया था| रजनी ‘नेशनल फेडरशन फॉर दलित वीमेन’, नेकडोर और ‘वर्ल्ड डिगनिटी फोरम’ के साथ भी जुड़ीं रहीं| वहीं सेंटर फॉर अल्टरनेटिव दलित मिडिया की कार्यकारी निदेशक भी थीं| इनका मानना था, कि पहले दलित आंदोलन का उद्देश्य ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद, और पितृपक्ष से लड़ना था| मगर, अब दलित आंदोलन का मतलब रोजगार, शिक्षा और मूलभूत समस्याओं से सम्बंधित मुद्दों को उठाना है|

अगर, इनके नारीवादी आंदोलनों की बात करें, तो इनकी शुरुआत तब हुई, जब साल 1972 में इनके एक सहकर्मी के साथ मथुरा में बलात्कार हुआ था| इस घटना ने इनको झकझोर कर रख दिया, जिसके बाद इन्होंने दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन किया था|

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एक शानदार लेखिका ‘रजनी’

रजनी एक शानदार लेखिका भी थी| इन्होंने कविता के दो संग्रह लिखी थीं| पहला ‘पदचाप’ और दूसरा ‘हवा सी बेचैन युवतियां’, जो काफी पसंद की गई| रजनी ने अपनी आत्मकथा ‘अपनी जमीं, अपना आसमां’ काफी प्रशंसित हुई थी। इसमें उन्होंने उत्तर भारतीय दलित महिला के साथ होने वाले भेदभाव और अत्याचार को उसी सहजता से रखा, जिस सहजता से वह भाषण देती थीं या लोगों को जातिवाद से लड़ने को कहती थीं। उनका नया कहानी संग्रह ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ’ काफी विचारोत्तेजक है। इसमें उन्होंने पूरी बेबाकी से अपने अनुभवों को, खासतौर से पितृसत्ता से टकराने वाले जीवन संघर्षों को चित्रित किया है और सामाजिक आंदोलनों की भी पड़ताल की है। इस संग्रह से साफ होता है कि वह सिर्फ अंबेडकरवादी विमर्श तक ही सीमित नहीं थी| इससे बाहर समाज के बड़े बदलावों से जुड़ी हुई थीं। उनके कविता संग्रहों ‘पदचाप’ और ‘हवा सी बेचैन युवतियां’ से पता चलता है कि वह हर समय नया जोखिम उठाने को तैयार रहती थीं। सफाई-कामगारों पर, खासतौर पर दिल्ली के भीतर, उन्होंने उल्लेखनीय काम किया।

रजनी खासियत ये थी कि वे किसी दूसरे के द्वारा आयोजित किये गए आंदोलनों में भी बड़ी सक्रिय भूमिका निभाती थीं|

इन्होंने समकालीन दलित महिला लेखन और सावित्रीबाई फुले की रचनाओं का अनुवाद भी किया था, जिसकी करीब 10 हजार प्रतियां पेश की गई थीं|

रजनी तिलक ने 10 मार्च फुले की मृत्यु दिवस को ‘महिला दिवस’ के रूप में मनाया था| वहीं इनकी यौमे पैदाइश (जन्मदिन) के मौके पर ‘शिक्षा दिवस’ के रूप में ख़ुशियाँ भी मनाई थीं| इसके बाद, रजनी तिलक ने 30 मार्च 2018 को दुनिया को अलविदा कह दिया|

रजनी तिलक अपने अथक प्रयास से दलित आंदोलनों में आजीवन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं| रजनी खासियत ये थी कि वे किसी दूसरे के द्वारा आयोजित किये गए आंदोलनों में भी बड़ी सक्रिय भूमिका निभाती थीं| रजनी तिलक जी का अचानक चले जाना अम्बेडकरवादी महिलावादी आन्दोलन के लिए गहन धक्का है क्योंकि उन्होंने जीवन प्रयत्न इन सवालों पर कोई समझौता नहीं किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए वह संघर्षरत रही| आज ये कठिन दौर में साम्प्रदायिकता और जातिवाद के विरुद्ध सीधे खड़े होने के लिए बहुत वैचारिक निष्ठा चाहिए होती है| रजनी तिलक उन गिने चुने लोगो में थीं जो बिना किसी ईगो के ऐसे किसी भी प्लेटफार्म पर जाने के लिए तैयार रहती थीं जहाँ जनता के प्रश्नों पर लोग लड़ रहे थे|

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तस्वीर साभार : Dalit Women Speak Out Conference

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