पहाड़ों की वो आज़ाद औरतें, जो अब नहीं है

महिला यौनिकता
पहाड़ों की वो आज़ाद औरतें, जो अब नहीं है

शशांक

शादी, जिसमें एक औरत की यौनिकता का नियंत्रण एक पुरुष के हाथ में आता है और परिवार, जहाँ एक महिला बच्चे पैदा करती है और सब एक छत के नीचे रहते हैं। पर कैसा लगेगा अगर मैं कहूँ कि एक महिला, तीन-पांच या सात भाइयों से शादी करे, उनके बच्चे पैदा करे, किसी को पता नहीं, किस पिता का बच्चा कौन है और पूरा परिवार एक साथ एक छत के नीचे रहते हो। पहाड़ों का एक ऐसा ही गांव था जहाँ की एक जनजाति में महिलाओं को एक से अधिक पुरुषों के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने और बच्चे जनने की स्वतंत्रता थी।

मेरी दो मित्र, हिमाचल प्रदेश के मंडी और कुल्लू ज़िले की रहने वाली हैं| पहाड़ों में खस और कनैत नामक जनजातियों के लोग रहा करते थे| इसलिए क्योंकि अब सभी जाति और धर्म के खांचे में कहीं न कहीं फिट हो गए हैं। महिला होने नाते एक तरह का व्यवहार और मर्यादा का पालन करना पड़ता है और अकसर इनके माँ-बाप इन्हें इनकी दादी का उदाहरण देकर कहते हैं कि पढाई में मन लगाना और कभी अपनी दादी जैसी नहीं बनाना।

उनकी दादी के अपनी युवावस्था के दिनों में गांव के दो-तीन पुरुषों के साथ सम्बन्ध थे और उन्होंने बच्चे भी पैदा किये| उस ज़माने में पहाड़ों में जब शादी और परिवार की संस्थायें इतनी मज़बूत नहीं थी तब महिलायें एक पुरुष या परिवार में बंध कर नहीं रहती थी और समाज में ऐसी महिलाओं को बुरी औरत नहीं माना जाता था| पर अब माँ-बाप नहीं चाहते की उनकी बेटियाँ उनकी दादियों जैसी बनें। 

स्थानीय हिमाचली संस्कृति में महिलायें ज़्यादा खुले रूप से समाज में रहती थी। हिमाचल का नाटी नामक सामूहिक नृत्य का छायाचित्र आपने देखा होगा, जिसमें महिलायें और पुरुष एक दूसरे की कमर में हाथ डाल कर नाच रहे हैं। स्थानीय पहाड़ी संस्कृति में अभी भी महिलाएं और पुरुष, घरों में देशी शराब बनाते हैं और पीते भी हैं।

किन्नौर की एक परम्परा के अनुसार एक महिला घर के सभी भाइयों के साथ विवाह करती थी और बच्चे जनती थी| कौन-सा बच्चा किस पिता का है, किसी को पता नहीं होता था। पहाड़ों में खेती की ज़मीन थोड़ी होती है| ज़मीन को ज़्यादा भागों में न बटें इसलिए यह परम्परा शुरू की गयी होगी। पर आज के दौर में, इस तरह के परिवार के ढाँचे को पुराना और असभ्य माना जाता है। पहाड़ों की संस्कृति और इतिहास पर एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब है बिकमिंग इंडिया जिसे अनिकेत आलम ने लिखा है|

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पहाड़ों में झंझराला नामक एक प्रथा थी, जहाँ प्रेम करने की आज़ादी थी| अपना मनचाहा साथी मिलने पर जंगलों में भागकर एक दूसरे से सम्बन्ध बनाने की छूट थी| पर बदलते दौर में जहाँ परिवारों का स्वरुप बदला है, शादी जैसी संस्था को पवित्र मानकर बाकी सारी पहाड़ी प्रथाओं को असभ्य और अनैतिक बना दिया गया है|

खेती की बात करें तो किसी ने सही कहा है कि पहाड़ महिलाओं के मज़बूत कन्धों पर खड़े हैं| तथाकथित विकास के आने से जहाँ, नए बीजों की किस्मों, रसायनों ने खेती को चौपट किया है| वहीं पुरुषों का शहरों की तरफ पलायन बढ़ा है| यहाँ अधिकतर पुरुष मनाली के होटलों में, दिल्ली की टैक्सियों में या बद्दी की किसी फैक्ट्री में काम करते मिल जायेंगे। पीछे रह जाती हैं महिलायें, बच्चे और बुजुर्ग माँ-बाप| खेती, पशु, बच्चे और सास-ससुर की पूरी ज़िम्मेदारी औरतों के मज़बूत कांधों पर|

विकास, शिक्षा, मीडिया और शहरीकरण के बाद कैसे पहाड़ों की दुर्गती हुई है, इसकी एक बहुत ही खूबसूरत फिल्म है, दायें या बायें

आज भी बीजों का संरक्षण, बुआई, निराई, कटाई, अनाज की पैदावार और रखरखाव का पूरा ज्ञान, पहाड़ों में अधिकतर महिलाओं के पास है| इसके अलावा, जंगल में लकड़ी काटना, लाना, पशुओं के लिए चारा लाना भी। “चिंतामणि जोशी” जी की कविता की यह कुछ पक्तियां आज के पहाड़ी हालात में बहुत फिट बैठती हैं, जहाँ पुरुषों का पलायन हो रहा है और महिलायें सीना तान के पहाड़ के सम्मुख खड़ी है।

पुरुष हार रहा है
भाग रहा है
लेकिन अभी भी
फाड़ रही हैं
जंगली भालू के जबड़े को
अपने होंसले-हंसिये से,
दिखती हैं
भीमल, खड़क, बांज के पेड़ों पर
धान, मड़वा, चींणा के खेतों में स्त्रियां,
स्त्रियां
अभी भी जातीं हैं समूह में
लाती हैं-चारा बटोर कर
अपने डंगरों के लिए
कांठों की जिबाली और
चढ़ती उतरती ढलानों पर जिन्दा
जंगलों से,
स्त्रियां
अभी भी खड़ी हैं
पलायन के पहाड़ के सम्मुख
सीना तान कर,
जब तक खड़ी हैं स्त्रियां
तब तक खड़ा है पहाड़।

विकास की इस आंधी में पहाड़ों की आज़ाद हवा के साथ खेती और पशुपालन के ज्ञान को भी नष्ट कर दिया है| खेती का ज्ञान और समाज का समानता का ढांचा अब पूंजीवाद और पितृसत्ता के ढांचे में तेज़ी से बदलता जा रहा है। विकसित होने के लिए अब शहरों में जाकर पैसा कमाना बहुत ज़रूरी हैं| सभ्य होने के लिए महिलाओं की यौनिकता पर समाज का नियंत्रण भी ज़रूरी है और विकसित, सभ्य समाज के लोग, खेतों में अनाज बोना, जंगल से चारा-लकड़ी लाने जैसे काम नहीं करते।

अब सवाल खड़ा होता है कि जिस शिक्षा, विकास और आधुनिकीकरण के बल पर हम महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकारों की बात करते हैं, पहाड़ों में वो सारे अधिकार और स्वतंत्रता वहां की संस्कृति में पुराने समय से रही हैं तो सभ्य कौन हुए, हम, जो एक ही तरह की शादी और परिवार के ढांचों को स्वीकार करते हैं या वो, जो इंसानी हक़, भावनायें और आज़ादी के आधार पर लोगों को परिवार और समाज बनाने की आज़ादी देते हैं?

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यह लेख शशांक ने लिखा है|

तस्वीर साभार : paharicinema

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