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मोहिनी हरियाणा के राज्य में समन्वयक के रूप में काम करती हैं। उनका जन्म और पालन-पोषण हरियाणा के पानीपत के गढ़ीछाजू गांव में हुआ था। वह एक गरीब सफ़ाई कर्मचारी जाति के परिवार से है। उन्होंने स्कूल में अपनी जाति के आधार पर भेदभाव का सामना किया, जहाँ टीचर उनको उनकी जाति के नाम से बुलाते थे। उनके गाँव में चमार और सफ़ाई कर्मचारी जाति के लोगों के लिए अलग-अलग नल हैं। कम उम्र से इस तरह की अस्पृश्यता का सामना करने के बाद, उनमें सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए काम करने की इच्छा जताई। साल 2006 में, उन्हें सफाई कर्मचारी आन्दोलन के साथ काम किया और फिर बाद में राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार आयोग [एनसीडीएचआर] के साथ काम किया। कई जाति विरोधी संगठनों के साथ उनके काम के आधार पर, उन्हें दलित फाउंडेशन से फ़ेलोशिप मिली, जिसने उन्हें आर्थिक रूप से समर्थन दिया। उन्होंने अपने बेटे के जन्म के बाद स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वह वर्तमान में अपने कानून और सामाजिक कार्य डिग्री के लिए तैयारी कर रही है। आइये आपके साथ साझा करते हैं सृष्टि कपिल की मोहिनी के साथ बातचीत के कुछ अंश :

सृष्टि :  मोहिनी, राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार आयोग (NCDHR) और आल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच (AIDMAM)  में अपने काम के बारे में कुछ बताइए|

मोहिनी : मैं करीब 2009 में NCDHR से जुड़ी हूँ। उस समय एक साइकिल रैली निकाली गयी थी, जिसमें स्लम्स/ बस्तियों का सर्वक्षण किया गया था। उसमें हमने नुक्कड़ नाटक भी किये थे और महिलाओं के शोषण, अत्याचार और समस्याओं से संबंधित कई मुद्दे सामने आ रहे थे|  उस वक्त AIDMAM का भी उस समय गठन हो चुका था, जो कि महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों की ही मोनिटरिंग और एडवोकेसी करने का काम करता था। मैं उसकी वॉलंटियर बनी और लगातार हरियाणा में मैंने महिला उत्पीड़न के मामलों में न्याय के लिए लड़ाई को जारी रखा और अब मैं फरवरी 2017 से इससे पूरी तरह जुड़कर AIDMAM में हरियाणा की जिमेदारियाँ सम्भाल रही हूं। हरियाणा में महिलाओं के ऊपर हो रहे अत्याचारों से लड़ने के लिए हम लड़कियों को लीडरशीप में भी ला रहे है ।

तस्वीर साभार : मोहिनी

सृष्टि : FII के कार्यक्रम में आपने आम्बेडकर का उल्लेख करते हुए बेहद संवेदनशीलता से अपनी बात रखी| कृपया बताएं बाबा साहेब के काम ने आपको किस तरह प्रभावित किया?

मोहिनी : मैंने अपना जीवन साथी खुद चुना था| मेरे परिवार की पहली अधिक पढ़ी-लिखी और बाहर नौकरी करने वाली लड़की केवल मैं हूं और ये सिर्फ बाबा साहब की बदौलत हुआ। इतना ही नहीं, आज मैं गरिमापूर्ण जिंदगी भी बाबा साहब के विचारों से जी रही हूं।

बाबा साहब के हर एक शब्द से मैंने इंसाफ, न्याय और संघर्ष की शिक्षा ली है।

क्योंकि जब तक मैं बाबा साहब को नहीं जानती थी तो यही मानती  थी कि भगवान ने ही भेदभाव बनाया है। महिलाओं को डरा सहमा और मर्यादा में लिपटी हुई बनाया है। पर जब बाबा साहब के बारे में पढ़ा तो ये मूर्तियां मुझे सिर्फ पथर दिखने लगी। बाबा साहब के हर एक शब्द से मैंने इंसाफ, न्याय और संघर्ष की शिक्षा ली है। मैने भी गावँ में बहुत भेदभाव देखा है| पर जब बाबा साहब को समझा और  उनके विचारों को समझा, तभी मैने गलत नियमों को तोड़ना शुरू किया|  घर से बाहर निकलना शुरू किया और जब समाज से ताने मिलते थे तो  हिम्मत सिर्फ बाबा साहब से मिलती थी कि जब भी आप किसी अच्छे काम के लिए ओर बढने की सोचोगे या दिर बेड़ियों को तोड़कर बाहर निकालोगे तो सबसे पहले आपके घरवाले, समाज वाले और महिलाएं सब आपका विरोध करेंगे । हमें सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी के न्याय के लिए भी आगे बढ़ाना होगा।

सृष्टि :  हरियाणा, अक्सर शिक्षा, अधिकार और सुरक्षा के मामले में महिलाओं के लिए सबसे खराब राज्य जाना जाता है। यहां आपका काम कैसा रहा है? क्या आपको लगता है कि यह सच है?

मोहिनी : हाँ हरियाणा के बारे में जो भी लोग ये बोलते और सुनते है, वो बिल्कुल कड़वा सच है। आज भी यहां छोटी बच्चियां और महिलाएं सुरक्षित नहीं है और जो हमारा अपना अनुभव भी हैं कि आज भी समाज में पितृसत्ता की जड़ें मजबूत है। बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी में भी लड़कियों के कपड़ो से उनका आंकलन किया जाता है|  हॉस्टलों में जानवरों की तरह ताले लगाकर रखा जाता है। पर  अक्सर जब घटना घटित होती है तो वो बिल्कुल अनपढ़ नासमझ परिवार होता है जिनको कानूनी प्रक्रिया का थोड़ा भी ज्ञान नही होता। बहुत समय लगता है सही धाराएं लगवाने में, केस को सही दिशा देने में। हमें भी हमारी जान-मान का डर लगता है| पर आज इन विपरीत हालातों में भी डट कर काम कर पा रहे हैं तो ये बाबा साहब के दिये कानून की जानकारी हैं|  आज कोई यहां नहीं सहन करता कि नेतृत्व में एक महिला हो|

तस्वीर साभार : मोहिनी

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सृष्टि : एकटिविस्म कठिन, थकाऊ और श्रमसाध्य है। नौकरी के साथ आने वाले आघात से निपटने के लिए आप क्या करते हैं?

मोहिनी : बहुत परेशानी होती है, कई बार| पर परिवार, समाज और दोस्तों को पता है कि एक्टिविज्म में मैं अब इतनी डूब चुकी हूं कि मैं जहाँ भी जाती हूँ  लोगों की समस्याओं पर वही पर काम करना बात करना शुरु कर देती हूं। मुझे ये लगता है कि अगर आज मैं एक अच्छी समाजसेवा कर पा रही हूं तो इसमें मेरे पापा और मेरे हमसफ़र का बहुत बड़ा साथ और विशवास है जो मुझे इस काम मे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता हैं ।

सृष्टि :  बहुत सारे लोग सोचते हैं कि जातिगत भेदभाव शहर के स्थानों में बिल्कुल भी मौजूद नहीं है या गांवों में बदतर है। आपका अनुभव क्या रहा है? आप इन लोगों से क्या कहना चाहेंगीं?

मोहिनी : मेरे अनुसार ये कहना बिल्कुल गलत है कि शहरों में जातीय भेदभाव नहीं है। वहां पर भी बहुत अधिक भेदभाव किया जाता है| पर वहां सब छिपा रहता है| लेकिन गावँ में इसका स्वरूप आज भी जिंदा है। आज भी सवर्ण लोग, जो पानी पशुओं को पिलाते है उसमें गरीब दलित का बर्तन नहीं डालने देते और हमारे जैसे को भी जब वो लोग देखते है तो यकीन  नही करते बल्कि अफसोस करते है कि ये इतने सुंदर कपड़े वाली सुंदर लड़की दलित है और जाति पता चलने पर लोगों का व्यवहार अचानक बदल जाता है।  

पर सिर्फ जो थोड़े विचारों और जानकारियों, शिक्षा और आर्थिक  तौर पर ऊपर उठ चुके है उनको गावँ में कुछ इंसानियत को मानने वाले सवर्ण लोग पसन्द करते है और इज़्ज़त देते है| 

सृष्टि :  आप एक साथ कानून और सामाजिक कार्य का भी अध्ययन कर रहे हैं। आप काम और पढ़ाई को कैसे बेलेन्स करती हैं? क्या आपको लगता है कि कक्षा का ज्ञान क्षेत्र में मदद करता है?

मोहिनी : एक महिला होने की वजह से बहुत अधिक जिमेदारियाँ को उठाना पड़ता हैं। घर, परिवार और पति का साथ है, इसलिये अपने लिए पढ़ने का समय रात को दे पाती हूँ। मैं अपने परिवार के साथ भी समय नहीं बिता पाती हूं| मेरा मानना है कि क़ानूनी पढ़ाई करना हमारी जरूरत है क्योंकि ख़ुद पुलिस प्रशासन को कानूनी ज्ञान नहीं है। अगर मैं कानून में परिपक्व हो जाऊंगी तो उनको भी सबूत के साथ जवाब दे सकती हूं। मेरे काम का तो कानून से गहरा रिश्ता है, जो हम पढ़ते है उसी का सामाजिक जीवन में प्रैक्टिकल करते है|

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तस्वीर साभार : Srishti Kapil

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