मैं गौतम बुद्ध के जीवनकाल के बारे में पढ़ रही थीl उसमें लिखा था कि उस समय दास-दासियों को अपने खुद के परिवार रखने का हक़ नहीं थाl यह पढ़कर मैं सोचने लगी कि क्या आजकल हमारे फुलटाइम गृहकर्मियों के पास ये हक़ है? उनमें से कितने फीसद अपने परिवारों को अपने साथ रख सकते हैं और उन्हें समय दे सकते हैं? बुद्ध के 2500 साल बाद और देश की आज़ादी के सत्तर साल बाद भी लाखों गृहकर्मी अपने बच्चों, बुज़ुर्गों, परिवारों को छोड़कर अमीरों के बच्चों, बुज़ुर्गों, परिवारों को सम्भाल और संवार रहे हैंl आज भी इन में से बहुतों की स्थिति दासों जैसी ही हैl

ज़्यादातर स्त्री-पुरुष गृहकर्मी जो काम देने वालों के घरों में रहते हैं, अकेले रहते हैंl बहुत ही कम घरों में उनके लिए इतने बड़े क्वार्टर होते हैं जिनमें उनके परिवार रह सकेंl इनमें से कई, ख़ासतौर से औरतें, कुंवारे होते हैंl और जो शादीशुदा और बच्चों वाले हैं वे भी अपने परिवार से दूर रहते हैंl साल या दो साल में इन्हें अपने घर जाने का मौक़ा मिलता हैl कई औरतों को ग़रीबी के कारण अपने छोटे बच्चों को गाँव छोड़कर काम के लिए शहर आना पड़ता हैl ज़्यादातर गृहकर्मी अपना पूरा वेतन घर भेजते हैंl इनके जीवन में सिर्फ़ मेहनत औए काम हैl सुबह से रात तक काम करने के बाद भी बहुतों को इज्ज़त और प्यार नहीं मिलताl

काम कितना और सुविधाएं कितनी?

मेरी जानकारी के अनुसार ज़्यादातर गृहकर्मियों को दिन होते ही काम पर आना पड़ता है| यानी सुबह छह या सात बजे और देर रात तक काम पर रहना पड़ता हैl उन घरों में जहाँ रात का भोजन देर से होता है या अक्सर मेहमान आते हैं, वहाँ इनका काम 11-12 बजे रात तक चलता है और दूसरे दिन फिर सुबह सवेरे काम पर हाज़िरीl ज़्यादातर कर्मी दिन में 14 से 18 घंटे काम करते हैं, यानी काम के सामान्य 8 घंटों से दुगने घंटे काम करते हैंl बहुत से घरों में इन्हें साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जातीl

केवल कुछ परिवारों में इन कर्मियों के लिए अलग क्वार्टर होता हैl बहुत से घरों में इन्हें रात को कहीं भी ज़मीन पर सोने को कह दिया जाता हैl जहां अलग क्वार्टर होता है, वह क्वार्टर अक्सर छत पर होता है और आजकल दिल्ली जैसे शहर में यह चौथी मंजिल के ऊपर होता हैl महंगे से महंगे फ्लैट्स में भी सर्वेंट क्वार्टर इतने छोटे होते हैं कि एक खटिया डालने के बाद वहां हिला-डुला नहीं जा सकताl कई कमरों में  खिड़की तक नहीं होतीl दिल्ली की गर्मी में जब तापमान 45 डिग्री तक जाता है तब आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दोपहर में ये क्वार्टर कैसे तपते होंगे और सर्दियों में जब दिल्ली का तापमान 2-3 डिग्री तक नीचे जा सकता है तो आप सर्दी का भी अंदाजा लगा लीजियेl

नौकर शब्द सिर्फ़ उन कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें हम तथाकथित निचले दर्जे के काम मानते हैंl

कई घरों में 18 साल से छोटे बच्चे भी काम करते दिखेंगे और इनका काम भी सुबह से देर रात तक होता हैl और यह सब अमीर और शिक्षित लोगों के घरों में होता है जो लोग अच्छी तरह से जानते हैं कि बच्चों को काम पर लगाना क़ानूनन अपराध हैl बहुत कम गृहकर्मियों का स्वास्थ्य बीमा करवाया जाता है, इसलिए बीमार पड़ने पर इन्हें खुद अपने पैसों से इलाज करवाना पड़ता हैl कुछ परिवार इनके साथ इज्ज़त से पेश आते हैं, जैसे उनके बच्चे इन्हें दीदी या भैय्या कहकर पुकारते हैं, मगर कुछ घरों में इनके साथ काफ़ी बदतमीज़ी और दुर्व्यवहार होता हैl कुछ समय पहले अखबार में पढ़ा था कि दिल्ली की एक डॉक्टर दंपत्ति अपनी कमउम्र कर्मी को घर के अन्दर बंद करके कई दिनों के लिए छुट्टी मनाने बैंकाक चले गए थेl इन्हें बेदर्दी से पीटने के किस्से भी अक्सर सुनायी देते हैंl

महिला कर्मियों के साथ यौनिक हिंसा और बलात्कार के किस्से भी अनसुने नहीं हैंlकरीब हर घर में सब को खिलाने के बाद ये ज़मीन पर बैठकर खाना खाते हैं| इन्हें घरवालों के साथ कुर्सी या सोफ़े पर बैठकर बात करना या टीवी देखने का हक़ नहीं हैl जो लोग हमारा भोजन बनाते हैं, हमारे बच्चों को पालते हैं, जिनके बिना हम एक दिन भी ठीक से जी नहीं सकते, उनके साथ ऐसा व्यवहार मेरी समझ के बाहर हैl

ऊंच-नीच भरे ये रिश्ते हमारी भाषा में भी झलकते हैं

इन गृहकर्मियों के लिए जो शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं वे हैं नौकर और नौकरानीl वैसे तो ये शब्द ठीक हैं, क्योंकि जो नौकरी करे वो नौकरl मगर जब हम किसी स्कूल, दफ़्तर या बैंक में नौकरी करते हैं तब हमें नौकर नहीं कहा जाताl नौकर शब्द सिर्फ़ उन कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें हम तथाकथित निचले दर्जे के काम मानते हैंl इन शब्दों में सम्मान का भाव नहीं दिखताl

नौकरी देने वालों के लिए हमारी भाषा में मालिक शब्द इस्तेमाल होता हैl मालिक का मतलब है स्वामी| मगर आज के ज़माने में हमें काम देने वाले हमारे मालिक नहीं होते या नहीं होने चाहियेंl दास प्रथा के समय यह शब्द ठीक था, क्योंकि तब मालिक और दास होते थेl आज ऐसे शब्दों का इस्तेमाल ठीक नहीं हैl

वैसे अगर देखा जाए तो जब परिवार की गृहणियां भी खुद घर के काम करती हैं उनकी भी तो इज्ज़त नहीं होतीl उनके काम को भी तो अहमियत नहीं दी जाती और इसीलिए ज़्यादा मर्द और लड़के घर के काम नहीं करतेl गृहणियों के लिए कहा जाता है, “मेरी बीवी काम नहीं करतीl वह सिर्फ़ गृहणी हैl” अगर वह काम नहीं करती तो पता नहीं क्यों वह सबसे पहले उठती है, सबके सोने के बाद सोती है और उसे दिन भर सुस्ताने का भी समय नहीं मिलता?

अच्छे क़ानून और उनका पालन बहुत ज़रूरी हैं, मगर इनसे ज़्यादा ज़रूरी है हम सबकी इंसानियत और इंसानी रिश्तेl

सच तो यह है कि गृहणियों और गृहकर्मियों का काम जीवन देने वाला है और यही सब से अहम् काम हैl यह ठीक से न हो तो न परिवार चलें और न जीवनl यही काम बाहर काम पर जाने वालों को काम करने के लिए तैयार करता हैl देर शाम कमाऊ लोग जब थके हारे घर आते हैं, तब यही काम उनकी थकान मिटाता है, उन्हें खिला-पिला, नहला-धुला के फिर से काम करने लायक़ बनाता है, उन्हें प्यार-दुलार देकर उनके टूटे अहम् की मरम्मत करता हैl तब कहीं ये कमाऊ लोग अगले दिन काम पर जा पाते हैंl इस सबके बावजूद ये लोग मानते और जताते हैं कि इनके परिवार सिर्फ़ इनकी मेहनत पर चल रहे हैंl  

यह भी सच है कि कुछ गृहकर्मी चोरी करते हैं, या घरवालों पर हिंसा करके या उनकी हत्या करके फ़रार हो जाते हैंl हालांकि यह कम होता है मगर इसके चर्चे बहुत होते हैं और इसे रोकने के लिए बहुत क़दम उठाये जा रहे हैंl बड़े शहरों में सब गृहकर्मियों की पुलिस जांच ज़रूरी कर दी गयी हैl रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन इन पर निगरानी रखने के लिए तो बहुत से क़ायदे-क़ानून बना रहे हैं, मगर इनकी भलाई के लिए कुछ करते नहीं दिख रहेl मानसिकता ऐसी है कि मानो इन ग़रीब लोगों को काम देकर हम अमीर लोग उन पर अहसान कर रहे हैंl

मुझे तो मेरे गृहकर्मी परियों से लगते हैं

गन्दा घर छोड़कर जाओ और शाम को लौटो तो साफ़ सुथरा घर, रात का खाना तैयार और हँसते हुए साफ़-सुथरे बच्चेl यही तो करती हैं परियांl पिछले 40 साल से मैं अगर नौकरी करके कमा पायी हूँ, साल में 2-3 महीने काम के लिए सफ़र कर पायी हूँ| मेरे बच्चे स्वस्थ औए खुश रह पाए हैं, तो यह सब मेरे गृहकर्मियों की मेहरबानी से हैl मेरा 35 साल का बेटा करीब पूरी तरह विकलांग हैl वह हाथ-पैर नहीं हिला सकता, सर नहीं हिला सकता, बैठ नहीं सकता और बोल भी नहीं सकताl उसका सब काम औरों को करना पड़ता है और यह भी समझना पड़ता है कि उसे क्या तकलीफ़ है, वह क्या चाहता है, वगैरह-वगैरहl अगर मेरा बेटा ज़िन्दा है तो हमारे कर्मी साथियों की ख़ातिर हैl

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मेरे घर में आज तक चोरी नहीं हुई

हमारे कर्मियों और मेरा दोतरफ़ा रिश्ता हैl वे मेरी इज्ज़त करते हैं, मैं उनकी, मैं उनका ध्यान रखती हूँ वे मेरा, मैं उन्हें खुश रखती हूँ वे मुझेl किसी से भी ग़लती होने पर तरीक़े से समझा दिया जाता हैl इसी वजह से घर में सुकून है| यह साफ़ है कि देश की ग़रीबी के कारण ही मध्यम वर्ग के और अमीर लोग गृहकर्मी रख पा रहे हैंl विकसित देशों में यह प्रथा कब की ग़ायब-सी हो चुकी हैl जहां ये हैं भी, वहाँ इस काम के लिए सख्त क़ानून हैं और उनका पालन भी होता हैl गृहकर्मियों के अधिकारों के लिए बनाए इंटरनेशनल लेबर आर्गेनाइजेशन के कन्वेंशन पर हमारी सरकार भी दस्तख़त कर चुकी हैl आजकल एक नया और बेहतर कानून भी बन रहा हैl कई शहरों में गृहकर्मियों के संगठन भी बन रहे हैंl यह सब बहुत ज़रूरी है क्योंकि इस काम में बेहद शोषण है और इस पर निगरानी रखना हम सब की ज़िम्मेदारी हैl

अच्छे क़ानून और उनका पालन बहुत ज़रूरी हैं, मगर इनसे ज़्यादा ज़रूरी है हम सबकी इंसानियत और इंसानी रिश्तेl हमारी इंसानियत का पता इससे लगता है कि हम अपने से कमज़ोरों के साथ कैसा सुलूक करते हैंl

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तस्वीर साभार : thebetterindia

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