दिल्ली में महिलाओं का मुफ़्त सफ़र ये पहल ‘अच्छी’ या ‘बुरी’ : एक विश्लेषण

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दिल्ली में महिलाओं का मुफ़्त सफ़र ये पहल 'अच्छी' या 'बुरी' : एक विश्लेषण
दिल्ली में महिलाओं का मुफ़्त सफ़र ये पहल 'अच्छी' या 'बुरी' : एक विश्लेषण

लैंगिक समानता पर भारतीय पुरूष और महिलाएं भले ही एक न हो लेकिन महिलाओं को जैसे ही कुछ सरकारी सौगात मिलती है तो उसपर हंगामा ज़रूर खड़ा कर दिया जाता है। दिल्ली में जैसे ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह घोषणा की, कि अब से महिलाएं डीटीसी बस औऱ मेट्रो में मुफ्त सफर कर पाएंगीं तभी से इसपर बहस होने लगी।

मुख्यमंत्री का यह भी कहना है कि जो महिलाएं टिकट लेना चाहे, वे ले सकती है। उनका कहना है कि 2 से 3 महीने के भीतर वह इस योजना को लागू कर सकते है। सोशल मीडिया पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया आने लगी। कुछ महिलाओं ने इस फैसले का स्वागत किया तो कुछ ने इसे भीख का नाम दिया। इस फैसले को लेकर सबसे ज्यादा आक्रोश पुरूषों में देखने को मिला औऱ गजब की बात तो ये रही कि उनलोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि, किसी भी फैसले में समानता की बात पहले होनी चाहिए।

इस फैसले को चुनावी दाँव कहा जा रहा है क्योंकि 2020 में दिल्ली में चुनाव होने जा रहे है। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है और वह शायद इस नई योजना के बहाने जनता को बहलाने की कोशिश कर रहे है। कुछ महिलाओं का यह भी कहना है कि पैसा जनता से ही लिया जाएगा औऱ इससे जनता पर ही दबाव पड़ेगा। कुछ महिलाओं औऱ पुरूषों का यह भी मानना है कि अगर फ्री करना ही है तो दोनो के लिए किया जाना चाहिए था।

अगर हम ये हवाला देते है कि अब लैंगिक असमानता नहीं है और महिलाएं भी बराबरी से काम कर रही हैं और पैसे कमा रही है, उन्हें ज़रा और शोध करने, पढ़ने, देखने, जांचने और समझने की ज़रूरत है|

पर यहाँ गौरतलब है कि इस बहस के बीच हम उन महिलाओं को भूल रहे है जो गरीब परिवार से आती है| उन महिलाओं को इससे सबसे ज्यादा इससे फायदा होगा। इसके अलावा वो महिलाएं जो दूसरों के घर काम करती है और उनका सारा पैसा जो अब तक किराए पर जा रहा था वो अब उनके पास बच पायेगा, जिससे वे अपनी और ज़रूरतों को पूरा सकेंगीं। इस फैसले से वो महिलाएं भी काम कर सकेंगी जिनके माता-पिता उन्हें काम करने से रोकते है क्योंकि अब उन्हें उनसे पैसे नहीं लेने पड़ेंगें। इस फ़ैसले से उन महिलाओं पर बोझ कम पड़ेगा जो केवल 5,000 से 10,000 वेतन पाती है औऱ आधा पैसा उनका केवल किराये पर ही खर्च हो जाता है।

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जो इस फैसले से गुस्से में है या असहमत है उनसे मैं ये कहना चाहूंगी कि सरकार से अपने सवालों की कुछ इन सवालों से करें कि – महिलाओं को समान योग्यता के साथ समान कार्य करने के लिए पुरुषों की तुलना में 34 फीसद कम वेतन क्यों मिलता है। वेतन के अंतर को लेकर केवल बहस होती है लेकिन इसपर आज तक उचित योजना नहीं बनी है।

इसके अलावा लैंगिक समानता सूचांक में भारत का 108 वां स्थान क्यों है? रिपोर्ट के अनुसार लड़कों को तरजीह देने की वजह से यह हुआ है। भारत जैसे देश में देखा जाए तो महिलाओं को देवी की उपाधि दी जाती है लेकिन उन्हें इंसान मानकर समान जीवन देने में हम असफल हैं| हजारों सालों से महिलाओं की हालत में कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है। घरेलू हिंसा, दहेज़ उत्पीड़न, महिलाओं पर की जाने वाली हिंसा को बढ़ावा देने वाला समाज तब बोलता है जब महिलाओं को कुछ राहत दी जाती है।

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मेरा मानना है कि इस फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए औऱ सरकार को यह भी तय करना चाहिए कि महिलाओं की सुरक्षा पर भी बात की जाए और मेट्रो की रात की टाइमिंग को भी बढ़ाना चाहिए ताकि महिलाएं देर रात तक सफर कर सकें। साथ ही यह भी कहूंगी कि किसी भी फ़ैसले को चंद लोगों तक सीमित देखकर उसपर अपनी धारणा न बनाये| क्योंकि अगर हम ये हवाला देते है कि अब लैंगिक असमानता नहीं है और महिलाएं भी बराबरी से काम कर रही हैं और पैसे कमा रही है, उन्हें ज़रा और शोध करने, पढ़ने, देखने, जांचने और समझने की ज़रूरत है| क्योंकि वास्तविकता ये है कि आज भी कामकाजी और आर्थिक रूप से सशक्त महिलाओं की संख्या मुठ्टीभर है| जिन्हें लगता है कि ये योजना पुरूष और महिलाओं के दरमियां अंतर को बढ़ाएगी, उसे भारत की स्थिति को अच्छे से देखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि अंतर पहले से ही बहुत बढ़ा हुआ है।


तस्वीर साभार : thehindu

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