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जब औरतें देहरी लांघती हैं तो विरोध का पहला शब्द कौन-सा होता है ?

वेश्या ! या वो सारे शब्द जो औरत के चरित्र पर सवाल खड़े करते हों। उसकी यौनिकता को अस्वीकार करते हों। एक शब्द ही काफ़ी है, एक स्त्री के ज़रिए दूसरी स्त्री को अपमानित करने का पितृसत्तात्मक समाज का यह क्रूर तरीका !

इसे आख़िर किस विद्रोही स्त्री ने नहीं सहा होगा? हर वो स्त्री जो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती है और समाज की बनायी दक़ियानूसी सोच को चुनौती देती है वो विद्रोही ही कही जाती है। ऐसी ही एक विद्रोही स्त्री थीं कादम्बिनी गांगुली – भारत की सबसे पहले ग्रेजुएट हुई दो लड़कियों में से एक। शुरुआती स्त्री – चिकित्सकों में से एक! वह स्त्री जो एक पूरी व्यवस्था से लड़ गई। न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी की लड़कियों के लिए भी जिससे वे अपने पिंजरे का दरवाज़ा खोल सकें !

लड़कियों को शिक्षा देना बेसिर पैर की बात

साल था 1861, जुलाई का अट्ठारवां दिन, जब बिहार के भागलपुर में कादम्बिनी का जन्म हुआ। उनके पिता बृजकिशोर बासु भागलपुर स्कूल के हेडमास्टर थे और राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित किए गए सुधार आंदोलन ‘ब्रह्म समाज’ के एक महत्वपूर्ण सदस्य भी। यह वह समय था, जब लड़कियों को शिक्षित करना बेसिर पैर की बात समझी जाती थी।

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लेकिन बृजकिशोर बासु एक शिक्षक होने के नाते शिक्षा का महत्व समझते थे। उन्होंने साल 1863 में अभय चरण मलिक के साथ मिलकर भारत में महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली पहली संस्था ‘भागलपुर महिला समिति’ की स्थापना की।

प्राथमिक विद्यालय के बाद, कादम्बिनी ने भारत के पहले महिला विश्वविद्यालय ‘बंग महिला विद्यालय’ में पढ़ाई शुरू की जो बाद में बेथुन कॉलेज में मर्ज हो गया था।साल 1878 में कादम्बिनी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी, और उसमें उत्तीर्ण होने वाली वे पहली भारतीय महिला बनीं।

कादम्बिनी के प्रयासों से प्रेरित होकर ही बेथुन कॉलेज ने पहले फाइन आर्ट्स प्रोग्राम की शुरुआत की, और फिर साल 1883 में स्नातक कार्यक्रमों की। शुरुआती कक्षाओं में केवल दो ही छात्राएँ होतीं थीं, कादम्बनी गांगुली और चंद्रमुखी बासु। बाद में यही दो लड़कियाँ एक साथ भारत की सबसे पहली ग्रेजुएट होने वाली महिलाएँ बनी थीं।

कादम्बिनी गांगुली भारत की उन चुनिंदा महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने कल लड़ाई लड़ी, ताकि आज की लड़कियों के लिए उनके सपनों की राहें आसान बन सकें।

चिकित्सा के क्षेत्र में कदम

कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश पाने के लिए कादम्बिनी को काफी संघर्ष करना पड़ा। कॉलेज प्रशासन महिलाओं को मेडिकल की शिक्षा देने के लिए तैयार नहीं था। पर कादम्बिनी की कोशिशों के आगे उन्हें हार माननी ही पड़ी, और कादम्बिनी ने मेडिकल की पहली छात्रा के रूप में पढ़ाई शुरू की। उन्होंने साल 1886 में अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और ऐसा करने वाली वह भारत की पहली दो स्त्री – चिकित्सकों में से एक थीं !

कादम्बिनी की तरह ही हज़ारों लड़कियाँ शिक्षा हासिल करना चाहती हैं, लेकिन सबको न समान अवसर हासिल होते हैं न ही समान अधिकार। हालांकि, कादम्बिनी के लिए भी यह आसान नहीं था। फर्क बस इतना था कि उन्हें अपने पिता और पति का भरपूर सहयोग हासिल हुआ, जबकि लड़कियों के लिए मुश्किलों की शुरुआत अक्सर सबसे पहले घर – परिवार से ही होती है। बाद में उन्हें समाज से भी लड़ने की तैयारी करनी पड़ती है।

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यहाँ कादम्बिनी सीधे समाज से लड़ने की शुरुआत कर चुकी थीं। वे भारत की स्वतंत्रता के लिए चलाए जा रहे विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लेती थीं। उन्होंने भारत के पूर्वी भागों में कोयले की खान में काम करने वाली महिलाओं के अधिकारों के लिए लगातार लड़ाई लड़ी। चिकित्सा के क्षेत्र में भी उनका काम जारी ही था।

यह हैरानी की बात है कि आठ बच्चों की माँ होने की ज़िम्मेदारी निभाते हुए, वे अपने करियर और समाज – सुधार से जुड़े कार्यों को किस कुशलता से संभाल रहीं थीं। एक ‘वर्किंग मदर’ होना न कल आसान था, न ही आज आसान है। उन्हें दोनों मोर्चों पर लड़ाई संभालनी ही पड़ती है, क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज आज भी महिलाओं के करियर को महज़ एक ‘शौक’ की तरह देखता है, वहीं घर संभालना एक ऐसा काम माना जाता है जिसे करने के लिए ही औरत का जन्म हुआ था। इसीलिए महिलाओं से ऐसी उम्मीद की जाती है कि या तो वे घर संभालने को प्राथमिकता दें, या फिर उन्हें करियर बनाना ही है तो वे घर और नौकरी के बीच संतुलन बनाने की ज़िम्मेदारी भी निभाएँ।

चरित्र पर सवाल का दिया मुँहतोड़ जवाब

कादम्बिनी को शिक्षा हासिल करने से लेकर काम करने तक, बार – बार सिर्फ इसीलिए रोकने की कोशिशें की जाती रहीं क्योंकि वे एक महिला थीं। एक महिला होकर, वे पुरुषों के तथाकथित ‘स्पेस’ में न केवल दखल दे रहीं थीं, बल्कि उसी स्पेस में अपने लिए और अपनी आने वाली पीढ़ी की लड़कियों के लिए भी स्पेस तैयार कर रहीं थीं। ज़ाहिर है कि उनका दखल देना पितृसत्तात्मक समाज को नागवार गुज़रा। उन्हें रोकने की कोशिशें तो होती ही थीं, लेकिन अब उन्हें लगातार तीखी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ रहा था।

एक दकियानूसी हिंदू पत्रिका ने उनकी शैक्षणिक योग्यताओं पर सवाल उठाते हुए, उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से ‘वेश्या’ कहकर अपमानित करने की कोशिश की। लेकिन कादम्बिनी इस तरह की आलोचनाओं से न डरती थीं, न ही रुकती थीं। उन्होंने पत्रिका के सम्पादक के विरुद्ध कोर्ट में मुकदमा दर्ज किया, और सज़ा के रूप में सम्पादक को छह महीने की जेल भी हुई।

इस तरह कादम्बिनी गांगुली भारत की उन चुनिंदा महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने कल लड़ाई लड़ी, ताकि आज की लड़कियों के लिए उनके सपनों की राहें आसान बन सकें।

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तस्वीर साभार : inextlive

Writer, Blogger, Translator, History & Mythology Lover. Supporting #StopAcidAttack Campaign.

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