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भारतीय मीडिया आए दिन अपनी महिला विरोधी छवि को पुख्ता करती रहती है। इस बात का ताजा उदाहरण हाल ही में, अर्थशास्त्र के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाली एस्थर डफ्लो के बारे में खबर पढ़ते हुए देखा जा सकता है। एस्थर डफ्लो को अभिजीत बनर्जी और माइकल क्रेमर के साथ संयुक्त रुप से इस साल का अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार दिया गया है।

इन तीनों को दुनियाभर में गरीबी मिटाने के लिए एक्सपिरिमेंटल अप्रोच के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। भारतीय मीडिया में इस खबर को कुछ इस तरह लिखा गया है – ‘नोबेल अवॉर्ड पाने वाले अभिजीत बनर्जी और पत्नी एस्थर डफ्लो’। क़रीब सारे ही मीडिया हाउस ने एस्थर डुफ्लो का परिचय अभिजीत बनर्जी की पत्नी के रूप में ही दिया है।

यह तथ्यात्मक रूप से सच है कि एस्थर डफ्लो अभिजीत बनर्जी की पत्नी हैं। लेकिन इसका दूसरा तथ्य ये भी है कि उन्हें यह नोबल बिल्कुल भी इसलिए नहीं दिया गया कि वो अभिजीत बनर्जी की पत्नी है। एस्थर अर्थशास्त्र में नोबल पुरस्कार पाने वाली दूसरी महिला हैं। उन्होंने सबसे कम उम्र में अर्थशास्त्र का नोबल पुरस्कार हासिल किया है। एस्थर को डेवलपमेंट अर्थशास्त्र के लिए दुनियाभर में महत्वपूर्ण नाम माना जाता है, उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में कई अभिनव प्रयोग किये हैं।

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नोबेल विजेता एस्थर डफ़्लो और अभिजीत बनर्जी

लेकिन भारतीय मीडिया ने एस्थर के कामों पर कम ही चर्चा किया है। क़रीब सारे ही मीडिया ने उनके परिचय के आगे ‘पत्नी’ लगाना जरुरी समझा। यहां तक कि हिन्दी अखबार हिन्दुस्तान ने तो यहां तक लिखा कि ‘अभिजीतः पीएचडी कराते समय डुफ्लो से प्रेम, 18 माह लिन इन में रहे।’ गोया उनकी पर्सनल लाइफ को हेडिंग बनाना ज्यादा जरुरी था ना कि उनके काम को ध्यान देना।

एस्थर को डेवलपमेंट अर्थशास्त्र के लिए दुनियाभर में महत्वपूर्ण नाम माना जाता है, उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में कई अभिनव प्रयोग किये हैं।

इस तरह की रिपोर्टिंग उसी धारणा की पुष्टि करती है जो अक्सर हमारे घरों में या आसपास सुनायी देती है। जब कोई महिला कुछ हासिल करती है  तो उसे उसके पति के साथ जरुर जोड़ा जाता है। गोया उनका अपना कोई अस्तित्व ही नहीं हो। एस्थर के संदर्भ में तो साफ है कि इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद उनके परिचय को किसी की पत्नी तक सिमटाने की कोशिश की जा रही है। यह एक तरह की साजिश नजर आती है जो हमेशा से पितृसत्तात्मक समाज में पले बढ़े और अब न्यूजरुम में बैठे मर्द चलाते आये हैं। वे चाहते हैं कि कोई भी महिला का अपना कोई स्वतंत्र, आजाद पहचान ना बने, वे चाहते हैं अगर किसी महिला ने तमाम कठिनाईयों के बावजूद अपनी बदौलत कुछ हासिल कर लिया तो उसकी पहचान को भी कमतर करके आंका जाये और उसके अस्तित्व तो किसी ना किसी मर्द के साथ चस्पा कर दिया जाये।

एस्थर के संदर्भ में तो साफ है कि इतनी बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बावजूद उनके परिचय को किसी की पत्नी तक सिमटाने की कोशिश की जा रही है।

नोबल पुरस्कार की ही बात करें तो आजतक नोबल पुरस्कार पाने वाले लोगों में सिर्फ पांच फ़ीसद महिलाएँ शामिल हैं। पूरी दुनिया में इस बात पर बहस चल रही है कि आखिर इन पुरस्कारों में भी क्यों महिलाओं को पीछे धकेलने की कोशिश की जाती है। क्यों नहीं आधी आबादी को उसके हक के हिसाब से पुरस्कार दिया जाता है। 

वहीं दूसरी तरफ हमारी भारतीय मीडिया अभी भी इन बहसों से दूर अपनी दकियानूसी विचारों को अपनी खबरों की सूर्खियां बना रहा है। मुझे नहीं लगता कि एस्थर के देश फ्रांस में यह खबर बनायी जा रही होगी कि एस्थर के पति अभिजीत बनर्जी ने नोबल पुरस्कार जीता, फिर क्यों एस्थर की पहचान को भारतीय मीडिया कमतर करने की कोशिश कर रही है?

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तस्वीर साभार : alum.mit.edu

मैं एक थियेटर आर्टिस्ट हूं। ट्रेनिंग से एक पत्रकार। नारीवाद और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर लिखना पसंद है। जातिय अभिजात्यपन और ब्राह्णवाद से मुक्त नारीवाद की प्रबल समर्थक।

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