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संयुक्त राष्ट्र में सोलह साल की पर्यावरण ऐक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग के भाषण ने न केवल विश्व नेताओं को बल्कि हर उस इंसान को झकझोर दिया जिसे जलवायु परिवर्तन के बारे में थोड़ी भी जानकारी है।

ग्रेटा की उस बेबाक़ी और तर्कपूर्ण बातों ने मुझे इसबात पर सोचने को मजबूर कर दिया कि हमारे भारतीय समाज और यहाँ की परवरिश में और स्वीडन की परिवरिश में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है। आज जब मैं गाँव-गाँव में किशोरियों के साथ काम करती हूँ तो यह पाती हूँ कि जलवायु परिवर्तन की बात तो छोड़िए किशोरियाँ अपने शारीरिक बदलावों के बारे में जागरूक नहीं हो पाती है। माहवारी जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया शुरू होने पर आज भी उनका अनुभव डरावना होता है और इसे समस्या बताकर परिवार में उन्हें प्लास्टिक के सेनेटरी पैड समाधान के रूप में दिए जाते है। बाक़ी इस सेनेटरी पैड से उनकी सेहत और पर्यावरण पर क्या नुक़सान होगा इसकी बात छोड़ ही दीजिए। इसे यह कहकर ख़त्म किया जाता है कि ‘अरे अब तो माहवारी पर सब जागरूक है। वो अच्छी कंपनी का सेनेटरी पैड इस्तेमाल करती है।’

ऐसे में उसी उम्र की एक किशोरी का अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आना और जलवायु परिर्वतन जैसे मुद्दे पर तर्कसंगत बात करना, सीधेतौर पर यह दर्शाता है कि न केवल ग्रेटा की बातों को समझने और इसपर काम की सख़्त ज़रूरत है बल्कि अपनी अगली पीढ़ी को भी सजग करना बेहद ज़रूरी है। ग्रेटा ने अपने भाषण में विश्व नेताओं पर जलवायु परिवर्तन पर कार्रवाई करने में विफल रहने का आरोप लगाया। ग़ौरतलब है कि इस भाषण के बाद से पूरी दुनिया में ग्रेटा सुर्खियो में हैं। या यों कहें कि वो युवा नेतृत्व का अंतर्राष्ट्रीय चेहरा बन चुकी हैं।

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स्कूल से शुरू हुआ ग्रेटा का सफ़र

ग्रेटा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए पहली पहल अपने स्कूल में की थी, जब 15 मार्च 2019 को पर्यावरण संरक्षण के लिए 105 देशों के स्कूली छात्र हड़ताल पर गए और इसका मुख्य चेहरा और वजह ग्रेटा ही थीं। इससे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने भारतीय अखबार को दिए अपने पहले इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए और देश के बच्चों के लिए संदेश भेजा था। इसके बाद, बीते 20 सितंबर को ग्रेटा थनबर्ग के नेतृत्व में वर्ल्ड लीडर्स को क्लाइमेट चेंज के खिलाफ कदम उठाने के लिए एक बहुत बड़ी हड़ताल की जा रही है।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन को संबोधित करते हुए ग्रेटा ने विश्वभर के नेताओं से जो कुछ कहा, उसमें नई पीढ़ी की आवाज शामिल है, तमाम पर्यावरणविदों के अलावा उन आम लोगों की चिंताएं भी शामिल हैं, जो दुनिया को प्रकृति के प्रकोप से बचाना चाहते हैं और आबोहवा को जीने लायक बनाना चाहते हैं। ग्रेटा ने अपने संबोधन में संसार के तमाम बड़े नेताओं पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से निपटने में नाकाम रहने और इस तरह नई पीढ़ी से विश्वासघात करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अपनी खोखली बातों से आपने मेरे सपने और मेरा बचपन छीन लिया है। लोग त्रस्त हैं, लोग मर रहे हैं, पूरी पारिस्थितिकी ध्वस्त हो रही है। हम सामूहिक विलुप्ति की कगार पर हैं और आप पैसों के बारे में और आर्थिक विकास की काल्पनिक कथाओं के बारे में बातें बना रहे हैं।

ग्रेटा ने गुस्से में पूछा कि ऐसा करने की आपकी हिम्मत कैसे हुई? बता दें कि अगस्त 2018 से ग्रेटा हर शुक्रवार को अपना स्कूल छोड़कर जलवायु परिवर्तन के लिए आवाज उठा रही हैं। वह स्वीडिश संसद के बाहर धरने पर बैठ चुकी हैं और संयुक्त राष्ट्र के अलावा ब्रिटिश, इटैलियन और यूरोपियन संसद में भी बोल चुकी हैं। उनके आंदोलन से प्रभावित होकर बीते 20 सितंबर को 150 देशों में आंदोलन हुए।

ऐसे दौर में जब हम आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में पगला रहे हैं ऐसे में सोलह साल की ग्रेटा का इस तरह सामने आना ज़रूरी और प्रेरणादायक है।

निजी ज़िंदगी में भी जारी है ग्रेटा का प्रयास

ग्रेटा ने ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के चलते हवाई यात्रा छोड़ दी और जमीन के रास्ते या नाव से यात्रा करती हैं। कुछ लोग ग्रेटा पर हंस सकते हैं और उन्हें बैकवर्ड और फ़ॉरवर्ड की क़तार में भी शामिल कर सकते हैं। लेकिन पर्यावरण को लेकर उठने वाली आवाजों को रोकना अब बहुत मुश्किल है।

यह एक विडंबना है कि राजनीतिक नेतृत्व के लिए यह अब भी कोई मुद्दा नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप इसे बौद्धिकों की एक सनक के रूप में देखते हैं, जबकि संकट हमारे जीवन में, हमारी आंखों के सामने बिल्कुल साफ खड़ा है।

राजनीति के शिथिल रवैए की थी आशंका

कुछ समय पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक रिपोर्ट ‘द स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट’ में कहा गया था कि राजनेताओं के रवैये के कारण पेरिस संधि का लक्ष्य निर्धारित समय पर तो क्या, देर से भी पूरा होना कठिन है, जिसके चलते हालात सुधरने के बजाय दिनोंदिन और बिगड़ते ही जा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक कार्बन उत्सर्जन में कमी न आ पाने के चलते ही बीते पांच साल धरती के दर्ज इतिहास में पांच सबसे गर्म सालों के रूप में छप गए हैं। इसके दुष्परिणाम के रूप में हमारे महानगर लगातार गैस चैंबर में तब्दील होते जा रहे हैं और कहीं सूखा कहीं बाढ़ का सिलसिला हम देख ही रहे हैं। बहरहाल, अब भी देर नहीं हुई है। दुनिया का राजनीतिक-आर्थिक नेतृत्व अगर समझदारी का परिचय दे तो जलवायु परिवर्तन से निपटने की मुहिम को कामयाबी तक पहुंचाया जा सकता है।

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ग्रेटा की बात पर विश्व नेताओं ने कहा

बैठक का आयोजन करने वाले गुटेरेस ने कहा कि दुनिया में एक गहरा जलवायु संकट है और इसके लिए तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है। वहीं, जर्मनी के चांसलर एंगेला मार्केल ने कहा कि दुनिया में बढ़ती गर्मी से मुक़ाबला करने के लिए उनका देश दोगुना ख़र्च करेगा। और न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न ने कहा कि दुनिया में चीज़ें बदलनी शुरू हो गई है।

उल्लेखनीय है कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले पाँच साल की तुलना में कार्बन उत्सर्जन 20 प्रतिशत बढ़ी है। अब तक रिकॉर्ड में दर्ज सबसे गर्म साल रहे, यानी 2014 से 2019 के बीच रिकॉर्ड गर्मी रही।ग्रैंथम इंस्टीच्यूट, इम्पीरियल कॉलेज लंदन के अध्यक्ष और रीडिंग विश्वविद्यालय में मौसम विभाग के प्रोफ़ेसर ब्रायन होस्किन्स ने कहा कि हमें स्कूली बच्चों की आवाज़ सुननी चाहिए।

अब समय है बदलने का। क्योंकि धीरे-धीरे प्रकृति ने अपना बदला लेने का मन बना लिया है, जिसे हमें जलवायु परिवर्तन के रूप में देख सकते हैं। ऐसे दौर में जब हम आधुनिकता और विकास की अंधी दौड़ में पगला रहे हैं ऐसे में सोलह साल की ग्रेटा का इस तरह सामने आना ज़रूरी और प्रेरणादायक है। हमें ग्रेटा से प्रेरणा लेकर न केवल जागरूक होने की ज़रूरत है बल्कि अपने स्तर पर प्रयास शुरू करने की ज़रूरत है। प्रयास जलवायु के संदर्भ में और प्रयास अपनी अगली पीढ़ी की तैयारी में। ऐसा न हो कि अपने बच्चों को हम तथाकथित अच्छी शिक्षा के लिए एसी रूम वाले स्कूल में भेजकर इसबात पर चिंता करना सिखाए कि जलवायु परिर्वतन हो रहा है। बल्कि उन्हें जलवायु परिवर्तन का मायने बताने के साथ-साथ अपने स्तर पर काम करना भी सिखाए।

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तस्वीर साभार : punjabkesari

Swati lives in Varanasi and has completed her B.A. in Sociology and M.A in Mass Communication and Journalism from Banaras Hindu University. She has completed her Post-Graduate Diploma course in Human Rights from the Indian Institute of Human Rights, New Delhi. She has also written her first Hindi book named 'Control Z'. She likes reading books, writing and blogging.

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