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21 अक्टूबर 2019 को इंडिया हैबिटैट सेंटर (नई दिल्ली) के मैगनोलिया हॉल में वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क ने राष्ट्रीय विमर्श बैठक का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य साल 2015 में भारत सरकार द्वारा फाइल की गयी सीआरपीडी कंट्री रिपोर्ट का अवलोकन करना है। इसके साथ ही भारतीय विकलांग महिलाओं की स्थिति की बेहतरी को सुनिश्चित करने के लिए भावी योजनाओं पर विचार – विमर्श करना था। 

गौरतलब है कि साल 2012 में स्थापित हुए वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क में भारत के विभिन्न हिस्सों से सदस्य जुड़े हुए हैं। इनके मुख्य कार्यों में राइट्स ऑफ पर्सन्स विथ डिसेबिलिटीज़ एक्ट 2016 में परिवर्तन करने के लिए वकालत करना, भारतीय विकलांग महिलाओं की स्थिति के विषय में सीईडीएडब्ल्यू समिति, यूनिवर्सल पीरिओडिक रिव्यू और सीआरपीडी के लिए रिपोर्ट तैयार करना, आदि सम्मिलित रहा है।कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए नंदिनी घोष ने ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ ( यूएनसीआरपीडी – यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द राइट्स ऑफ पर्सन्स विथ डिसेबिलीटी) के विषय और प्रक्रिया के बारे में परिचय दिया।

इसके पश्चात रेणु अद्दलाका के संचालन में नंदिनी घोष, कुहू दास, रत्नाबोली रे, संध्या लिमाए, रीना मोहंती, जीजा घोष और निधि गोयल के पैनल ने सीआरपीडी (विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर समिति) के समक्ष वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क के तरफ़ से प्रस्तुत की गईं समस्याओं के विषय में चर्चा की, जिनमें विकलांग महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार और स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवाएँ प्रमुख थीं।

इन समस्याओं के विषय में गहन चर्चा करने के लिए और समस्याओं के समाधान को लेकर भावी योजनाओं के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए कार्यक्रम में सम्मिलित हुए प्रतिभागियों को विभिन्न समूहों में बांटा गया। स्वास्थ्य के समूह का संचालन नंदिनी घोष और रीना मोहंती ने किया। इस समूह में प्रतिभागियों ने सीआरपीडी के आर्टिकल 15 और आर्टिकल 25 के विषय में चर्चा की।

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इस चर्चा में यह बात भी सामने आई कि अस्पतालों और स्वास्थ्यकर्मियों, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं, विकलांग व्यक्तियों ख़ासतौर पर विकलांग महिलाओं के परिवारों, आदि के बीच विकलांगता को लेकर जागरुकता की बेहद कमी है और इस दिशा में काम किए जाने की बहुत ज़रूरत है।

इसके साथ ही यह भी ज़रूरी है कि स्वास्थ्यकर्मियों, विशेषकर डॉक्टर्स और नर्सों के लिए विकलांगता संवेदीकरण पर अनिवार्य रूप से कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँ क्योंकि स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा विकलांग व्यक्तियों के साथ अक्सर असंवेदनशील व्यवहार करने के मामले सामने आते रहें हैं। छोटे शहरों व ग्रामीण क्षेत्रों के क्लिनिक्स में विकलांग व्यक्तियों के साथ भेदभाव और अस्पर्श्यता की घटनाएँ भी होती रही हैं। जापान, कोरिया, चीन आदि देशों की तरह विकलांगता विशेषीकरण पर और काम किया जाए। सोशल सर्विसेज़ का विकास किया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कैसे इंटरसेक्शनैलिटी को ध्यान में रखते हुए समस्याओं और उनके समाधान की दिशा में काम हो। इस सम्बन्ध में गुणात्मक डेटा का अभाव होने के मुद्दे को भी प्रतिभागियों ने चर्चा में उठाया। वहीं शिक्षा के समूह का संचालन संध्या और राधिका ने किया। इस समूह में प्रतिभागियों ने एजुकेशन बिल को बेहतर तरह से लागू करने को लेकर चर्चा की। यह सुझाव भी दिया गया कि विकलांग छात्रों को पढ़ाने और उनके प्रति संवेदनशील व्यवहार करने के सम्बन्ध में शिक्षकों को अनिवार्य रूप से विशेष ट्रेनिंग दी जानी चाहिए।

वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क की यह मीटिंग भारतीय विकलांग महिलाओं के विकास और उनकी वर्तमान स्थिति को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम पहल साबित हुई।

इसके साथ ही, ग्रामीण इलाकों में स्कूलों तक विकलांग बच्चों की आसानी से पहुंच हो सके। ऐसी सुविधाएँ उपलब्ध कराए जाने की ज़रूरत को लेकर भी चर्चा की गई। यह सुनिश्चित किया जाना भी ज़रूरी है कि स्कूलों में विकलांग बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव अथवा दुर्व्यवहार नहीं किया जाए।

कितने विकलांग बच्चे प्राथमिक कक्षाओं तक भी पढ़ पाते हैं, इस सम्बन्ध में डेटा का अभाव है और इस अभाव को दूर करते हुए, विकलांग बच्चों की शिक्षा से सम्बन्धित पूरा डेटा पब्लिक पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसके बाद, रोज़गार के समूह का संचालन कुहू और दीपा के द्वारा किया गया। चर्चा में यह तथ्य सामने आया कि विकलांग व्यक्तियों की पूरी जनसंख्या में से केवल 37 फ़ीसद ही रोज़गार प्राप्त कर पाते हैं और केवल 1.8 प्रतिशत विकलांग महिलाएँ ही रोज़गार प्राप्त कर पाती हैं। इनमें इंटेलेक्चुअली डिसेबल्ड व्यक्तियों का प्रतिशत और भी कम है।

कार्यस्थल पर विकलांग महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और छेड़खानी के मामलों में न्याय व सुरक्षा को लेकर भी बात की गई। यह बात भी सामने आई कि सरकार की कौशल विकास/स्किल बिल्डिंग योजनाओं में विकलांग महिलाओं के साथ भेदभाव के मामले होते रहें हैं। प्राइवेट और सरकारी सेक्टर्स में विकलांग महिलाओं की भागीदारी को लेकर डेटा उपलब्ध नहीं है। विकलांग महिलाओं को स्टार्ट अप आदि के लिए आर्थिक सहयोग दिए जाने की ज़रूरत को लेकर और प्रोफेशनल नेटवर्क्स में विकलांग महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर भी चर्चा की गई।

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इसके अलावा, निधि और शम्पा के संचालन में प्रतिभागियों के दूसरे समूह ने ‘हिंसा और शोषण’ को लेकर चर्चा की। इस चर्चा में यह बात सामने आई कि एसिड अटैक जैसी घटनाओं के कारण विकलांग हो जाने वाली महिलाओं को आर्थिक और रोज़गार सम्बन्धी सुविधाएँ प्राप्त होने में लम्बा समय लग जाता है। समाज में उनके साथ भेदभाव किया जाता है, किराए के लिए आसानी से घर नहीं मिलना, सामान्य सुविधाओं से वंचित कर दिए जाना आदि कुछ गंभीर समस्याएँ हैं जिनका सामना एसिड अटैक या किसी भी प्रकार की हिंसा और शोषण के कारण विकलांग हुई महिलाओं को करना पड़ता है।

कार्यक्रम में विकलांग महिलाओं के लिए रत्नाबोली और अम्बा के संचालन में कानूनी सहायता और सुविधा को लेकर चर्चा की गई। वहीं जीजा और अनीता के संचालन में पारिवारिक और सामाजिक जीवन को लेकर विचार-विमर्श किया गया। वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क की इस बैठक के आख़िर में निधि गोयल और कुहू दास ने सभी समूहों के आपसी विमर्श से प्राप्त हुई जानकारी, समस्याओं, समाधान और संभावित स्टेकहोल्डर्स को लेकर भावी योजनाओं के विषय में चर्चा की।

ज़ाहिर है कि वीमेन विथ डिसेबिलिटीज़ इंडिया नेटवर्क की यह मीटिंग भारतीय विकलांग महिलाओं के विकास और उनकी वर्तमान स्थिति को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम पहल साबित हुई। इस कार्यक्रम में महिला अधिकारों के लिए निरंतर काम करने वालीं डॉ.आशा हंस, एसिड अटैक सर्वाइवर प्रमोदिनी, नीता, गीतिका, ईशानी, मुरलीधरन, रति, मैरी, विदुषी, आदि भी मौजूद थे।

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