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ज़िन्दगी में हर किसी इंसान का कुछ ना कुछ सपना जरूर होता हैं। कोई जिन्दगी में प्रसिद्धि के सपने देखता है तो कोई अपने सम्मान के सपने देखता है। कुछ लोग ऐसे भी है जिनके सपने पूरे नहीं हुए लेकिन वो अपने  बच्चों के सपनों में ही अपने सपने देखते हैं। अपने सपनो को पूरा करने के लिए बहुत सारे व्यक्ति एक शहर से दूसरे शहर की तरफ रूख भी करते हैं। दीपावली के इस त्यौहार के मौसम में आइए हम बात करते हैं कुछ ऐसे ही सपनों की जो कई जिन्दगियों की दहलीज़ से ही वापस लौटने को मजबूर होते हैं क्योंकि आज भी समानता और स्वतंत्रता का दीपक किन्हीं मानकों के चलते असमानता की दिवाली मना रहा है।

सपने देखना और अपने सपनों के लिए प्रयास करना तो सभी का हक हैं। लेकिन जब बात हक की आती हैं तो एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारे समाज का ऐसा भी है, जिनके सपनो के बारे में अक्सर बात नही होती। हमारे समाज के इस हिस्से की जिंदगी के हर एक अहम फ़ैसले की डोर पितृसत्तात्मक सोच के हाथ में है। उनकी जिंदगी में कब, क्या और कितनी मात्रा में होगी इसका निर्णय यह सोच ही करती हैं।

हमारे समाज का वो हिस्सा है हमारे समाज की बेटियाँ। हमारे समाज का बेटियों के भविष्य इसबात पर निर्भर करता है कि परिवारों में पितृसत्ता की जड़े कितनी गहरी है। बचपन से ही लड़कियों को इसबात का एहसास दिलाया जाता है कि उनकी जिदंगी का हर निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नही हैं । बात सिर्फ यही तक ही सीमित नही है बल्कि परम्पराओं और समाज का हवाला देखकर ये स्थापित करने की कोशिश लगातार की जाती है कि निर्णय ना लेना ही लड़कियों के लिए हितकारी हैं।

विश्व स्तर पर 10 में से 9 लड़कियां अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करती हैं। लेकिन 4 में से केवल 3 अपनी निम्न माध्यमिक शिक्षा पूरी करती हैं। कम आय वाले देशों में, दो तिहाई से कम लड़कियां अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करती हैं और केवल 3 में से 1 निम्न माध्यमिक विद्यालय पूरा करती है।

अगर ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो लड़कियों में प्राथमिक शिक्षा से वरिष्ठ स्कूली शिक्षा तक साफतौर पर ड्रॉप आउट देखा जा सकता है।  जैसै-जैसे स्कूली शिक्षा से आगे की पढ़ाई की बात आती है तो ड्रॉप आउट की खाई और गहरी होती चली जाती है । जब हम शहरों में कॉलेज में लड़कियों को आते देखते है तो यह गलतफहमी होती हैं कि सारी लड़कियाँ उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ रही हैं। लेकिन वास्तविकता में यह अनुपात बहुत कम है। लड़कियों के सपनों के बीच बहुत सारी मुश्किलें है जो सामाजिक- सांस्कृतिक ,आर्थिक एवं अन्य कारकों से बहुत गहरे से जुड़ा हुआ हैं।

आज भी समानता और स्वतंत्रता का दीपक किन्हीं मानकों के चलते असमानता की दिवाली मना रहा है।

विज्ञान और तकनीकी के समय में आज भी हमारे समाज में जब किसी परिवार में लड़की पैदा होती हैं तो यह मान्यता हैं कि उस परिवार पर तो बोझ आन पड़ा या फिर आर्थिक सकंट आ गया हैं। लड़कियों को एक बोझ समझने की मानसिकता एक कारण है जिसके चलते लड़कियों के सपनों पर घरों में बात नही होती। यह मान्यता है कि ये बोझ तब ही उतर सकता है जब लड़की की शादी हो जाए।

लड़की के जल्दी से हाथ पीले करने का सामाजिक दबाव के कारण बहुत से माता पिता सिर्फ लड़कियों को दसवीं या बारहवीं तक कि पढ़ाई कराते है और उसके बाद सिलाई-कढ़ाई  सिखाकर शादी कर दी जाती है।  ऐसे में जब कोई परिवार सामाजिक दबाव से परे अपनी लड़कियों को आगे पढ़ाने की पहल करता है तो समाज उन्हें ताना मारना शुरू कर देता है। ऐसे परिवारों को यह एहसास दिलाने की भरपूर मात्रा में कोशिश की जाती है। यहां तक कि लड़की हाथ से निकल गयी तो समाज मे इज्जत खराब हो जाएगी। ऐसा इसलिए भी किया जाता है। क्योंकि समाजिक तौर पर यह माना जाता है कि अगर किसी लड़की के साथ किसी प्रकार की यौनिक हिंसा /उत्पीड़न होता या लड़की ने अपनी मर्जी से शादी कर ली तो परिवार की इज्जत चली जाती है। लेकिन सही मायनों में समाज में इज्जत से ज्यादा इसबात का डर है कि अगर कोई लड़की पढ़-लिखकर अपने पैरो पर खड़ी हो गयी तो अपने अपनी जिंदगी से जुड़े फैसलों में खुद से निर्णय लेने लगेगी। अगर वो अपने निर्णय स्वंय लेने लगी तो पितृसत्ता खत्म हो जाएगी। पितृसत्ता को कायम रखने के लिए डराने की नीति का इस्तेमाल किया जाता है।

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लड़कियों को हमारे समाज में पराया धन समझा जाता है। यह भी एक कारण है जिसकी वजह से लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा खर्च नही किया जाता। यह सामाजिक  मान्यता है कि लड़किया तो  दूसरे घर का उजाला है। शादी के बाद वह अपने ससुराल चली जाएगी तो उसके सपनों और पढ़ाई लिखाई के बारे ज्यादा सोचने से क्या फायदा।  एक लड़का तो बुढ़ापे का सहारा होता है तो इसलिए माता-पिता उसकी पढाई और सपनों के प्रति सचेत रहते है। सामाजिक रूप से यह अवधारणा की अगर लड़की अपने पैरों पर खड़ी हो भी गयी तो वो अपने ससुराल पक्ष को ही आर्थिक लाभ पहुँचाएगी। दूसरा लड़की की कमाई पर जीवनयापन करना सामाजिक रूप से बहुत नीच  माना जाता हैं।

लड़कियों को इसलिए स्कूल जाने से परिवार द्वारा रोक दिया जाता है क्योंकि घर से स्कूल की दूरी ज्यादा है। ऐसे में स्कूल से लेकर घर के रास्ते तक सुरक्षा का सवाल हर माता-पिता के मन में जरूर आता है। जब गाँव में माता-पिता से लड़कियाँ आगे की पढ़ाई के बारे में सवाल करती है तो परिवार और गाँव के  व्यक्ति  माहौल खराब होने की दुहाई देते है। वह यह बात स्वीकार तो करते है कि लड़कियों और महिलाओं के लिए अब माहौल बहुत खराब है पर इस माहौल को बदलकर एक बहेतर समाज बन जाये इसकी पहल कोई नहीं करता कि जहाँ हमारे गाँव और कस्बे की लड़कियां अपने सपनों को बिना किसी डर के पूरा कर सके।

यह माना जाता है कि घरेलू कार्य और बच्चों की देखभाल करना सिर्फ महिलाओं और लड़कियों की ही जिम्मेदारी है।

सामाजिक तौर पर यह माना जाता है कि घरेलू कार्य और बच्चों की देखभाल करना सिर्फ महिलाओं और लड़कियों की ही जिम्मेदारी है। जिसके चलते  ज्यदातर लड़कियों पर घरेलू कार्य या अपने छोटे बहनों – भाइयों की देखभाल का भार आ जाता हैं, जिसके चलते शुरू-शुरू में लड़कियां स्कूल से अनुपस्थित बढ़ती जाती हैं। बाद में स्कूल ही छुड़वा दिया जाता हैं। ऐसे में लड़कियों के सपनों की जो बड़ी सी आशा है, घर की चार दीवारों में सिमट कर रह जाती हैं। और जिन किताबों को हथियार बनाकर वो पितृसत्तात्मक सोच पर हमला कर सकती थीं वो घर के किसी कोने में धूल चाट रही होती हैं।

अभी तक हमनें सिर्फ उन कारकों पर चर्चा की है जो सामाजिक परम्पराओं से जुड़े कारकों के इर्द गिर्द घूमती हैं। लेकिन कुछ कारण इनसे परे हैं। वो कारण है संसाधनों या जरूरी सुविधाओं तक पहुँच की कमी का होना।  इनमें से स्कूलों या कॉलेज का दूर होने का ज़िक्र हम ऊपर कर चुके हैं। इसके अलावा भी कुछ अन्य कारण है जो सामाजिक तौर से तो नही आते लेकिन समाज के गैर जिम्मेदार होने की वजह से जरूर आते है। आज भी अधिकतर सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयुक्त टॉयलेट की सुविधाएं नही हैं। जिसके कारण उन्हें अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शिक्षा के केंद्र में आज भी हम लड़कियों के लिए स्कूलों में सेनेटरी पैड व अन्य सुविधाओं से इतने डरते है कि उसपर खुलकर बात भी नहीं। पीरियड के दिनों में सुविधाओं के अभाव में लड़कियों को स्कूल से छुट्टी करनी पड़ती और इसके साथ-साथ कुछ लड़कियों को तो स्कूल ही छोड़ना पड़ जाता है। एक स्कूल के स्तर पर स्कूल मैनेजमेंट कमेटी एक ऐसी कड़ी है अगर उन्हें जागरूक किया जाए तो बहुत सारी समस्या का समाधान किया जा सकता है ।

एक बेहतर और स्थाई भविष्य को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने  2015 में संयुक्त राष्ट्र के माध्यम में 17 सतत विकास लक्ष्यों को निर्धारित किया, जिसमें सतत विकास लक्ष्य 4 जो की गुणवत्ता शिक्षा पर जोर देता है और सतत विकास लक्ष्य पाँच लैंगिक समानता को एक मौलिक आधार पर जोर देता है। इन 17 सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक प्राप्त करने का भी लक्ष्य बनाया गया हैं। ऐसे में इन लक्ष्यों को 2030 तक प्राप्त करने के लिए हमारी कोशिशों को ओर तेज करके की ज़रूर हैं। हमें समाज के हर किसी पक्ष तक इस चर्चा को लेकर जाने की जरूरत है जो जाने अनजाने में लड़कियों के सपनों को प्रभावित कर रहे है। लड़कियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और लैगिंक समानता तक ही पहुँच के लिए , चाय की टपरी से लेकर संसद तक हर जगह सख्त प्रयास करके की जरूरत है। तभी हमारे गाँवों और शहरों रहने वाली हर लड़की छोटी सी आशा नही ,बल्कि बड़ी सी आशा रख पायेगी।

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तस्वीर साभार : reliefweb.int

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