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आज पर्यावरण हमारे लिए ज़रूरत का दूसरा नाम बन गया है। एक ओर जहां आज के विश्वस्तरीय राजनेता जलवायु परिवर्तन के ऊपर लंबे-लंबे भाषण देते हैं और उससे जनता को लुभाते हैं। वहीं दूसरी ओर वे किसी भी प्रकार से पर्यावरण को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाने में असमर्थ नज़र आते हैं। हाल ही में एक रिपोर्ट जारी हुई जिसके अनुसार पूरे विश्व में अमेरिका और भारत को क्लाइमेट चेंज की तरफ ध्यान केंद्रित करने में सबसे धीमा पाया गया। इसे केवल एक रिपोर्ट ना समझें बल्कि प्रलय का खतरा समझें।

हालांकि ऐसे बहुत से लोग विश्व में मौजूद हैं जो लगातार पर्यावरण को सुरक्षित करने की तरफ निरंतर प्रयास कर रहे हैं और उनकी कोशिश है साकार भी हो रही है। आज हम उन्हीं में से एक ऐसी महिला के बारे में जानेंगे जिसने अपने जीवन का आधे से भी ज्यादा समय हमारे पर्यावरण को समर्पित कर दिया। ताकि आगे आने वाला कल हमारे लिए बेहतर हो। बात करते हैं सालूमरदा थिमक्का की।

कर्नाटक की 107 वर्षीय सालूमरदा थिमक्का को लोग ‘वृक्ष माता’ के नाम से भी जानते हैं। ये पर्यावरण को सुरक्षित रखने के क्षेत्र में पिछले 80 सालों से निरंतर काम कर रही हैं। इन्होंने 385 बरगद के पेड़ों को 4 किलोमीटर के हाईवे के आसपास लगाया और उनकी रक्षा कर बड़ा किया। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने अब तक के जीवन में तकरीबन 8,000 पेड़ और लगाए हैं। थिमक्का हाल ही में चर्चा में आई जब उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

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थिमक्का ने अपने पति के सहयोग से पर्यावरण के प्रति इस सकारात्मक सोच को वास्तविकता में बदला। चूंकि इन दोनों के बच्चे नहीं थे इसलिए इन्होंने पेड़ लगाकर उन्हें ही बच्चों की तरह पाला-पोसा और बड़ा किया। ऐसा अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग अच्छी सोच के साथ पेड़ तो लगा देते हैं लेकिन उनकी रक्षा करने में मात खा जाते हैं। पर इस जोड़े ने पेड़ों को लगाया भी और उनकी अच्छी तरह रक्षा भी की। थिमक्का पानी भरके, लंबा सफर तय करके इन पेड़ों की प्यास बुझाती थी। साथ ही जानवरों से सुरक्षा के लिए इन्होंने सभी पेड़ों के आसपास फेंसिंग भी लगाई।

कर्नाटक की 107 वर्षीय सालूमरदा थिमक्का को लोग ‘वृक्ष माता’ के नाम से भी जानते हैं।

यहां एक पहलू को ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है। आज जिस तरह से ग्लोबल वार्मिंग के कारण देश-विदेश में हमें सूखे, बाढ़, तूफान जैसी जानलेवा आपदाओं की खबरें मिल रही हैं वे बहुत ही डरावनी है। थिमक्का ने 80 साल पहले ही इस आपदा को भांप लिया था और हम सबके लिए अपना जीवन पर्यावरण को समर्पित कर दिया। अगर हम उन्हें केवल एक प्रेरणा स्रोत के रूप में देखेंगे, पढ़ेंगे और भूल जाएंगे तो यह हमारा बुरा है जो नेक कार्य उन्होंने शुरू किया हमें उसमें सहयोग भी करना है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। पीने के पानी की किल्लत हो रही है। खेती किसानी को नुकसान पहुंच रहा है। सभी प्रदूषण भयंकर रूप ले रहे हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो कुछ सालों में जीवित प्राणियों का नामोनिशान ही खत्म हो जाएगा।

अगर इतनी बुजुर्ग महिला भी हिम्मत ना हारकर लगातार पेड़ लगाती जा रही है तो आखिर हम युवा इस कार्य में क्यों पीछे रह गए हैं। लंबे-चौड़े भाषणों से कोई हल नहीं निकलेगा। ना ही किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार के कदम उठाने के इंतजार से। हर इंसान को अपने स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। थिमक्का की तरह हमें भी पर्यावरण संरक्षण में भाग लेने की ज़रूरत है। हमें इस दुनिया को बचाने के लिए एक्शन लेने की ज़रूरत है। थिमक्का की तरह हमें भी पर्यावरण संरक्षण में भाग लेने की ज़रूरत है। हमें इस दुनिया को बचाने के लिए एक्शन लेने की ज़रूरत है। 

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तस्वीर साभार : aajtak.intoday.in

Ayushi is a student of B. A. (Hons.) Mass Communication and a social worker who is highly interested in positively changing the social, political, economic and environmental scenarios. She strictly believes that "breaking the shush" is the primary step towards transforming society.

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