इंटरसेक्शनलजेंडर पितृसत्ता का वास्ता ‘जेंडर’ से ज़्यादा ‘सोच’ से है, जो किसी की भी हो सकती है

पितृसत्ता का वास्ता ‘जेंडर’ से ज़्यादा ‘सोच’ से है, जो किसी की भी हो सकती है

पितृसत्ता की ईमारत यानी की इसके पूरे ढांचे का सर्वोपरि पुरुष ही होता है, जो की सत्ता को बाँटकर और महिलाओं में आपस में ही फूट डलवाकर राज करना चाहता है।

पितृसत्ता का अर्थ परिवार में पुरुष प्रधानता होना है, ये तो सभी जानते हैं, लेकिन पितृसत्ता के इस ढाँचे की व्यवस्था सत्ता पर भी निर्भर करती है। पितृसत्ता व्यवस्था की विचारधारा, महिलाओं को पुरुषों से कमतर मानती है और गैर बराबरी का चश्मा लगाकर दुनिया को देखती है।

अमूमन यही खयाल आता  है कि पितृसत्तात्मक सोच सिर्फ पुरुषों की हो सकती है, जो की मनुवादी होते हैं। ये बात सच भी है। लेकिन ये मानना  बेहद  ज़रूरी है कि एक विचारधारा होने के कारण ये एक सोच भी है। और ये सोच जेंडर पर निर्भर नहीं करती। पितृसत्ता का सम्बन्ध किसी जेंडर की बजाय सोच से है जो महिला या पुरुष किसी की भी हो सकती। पितृसत्ता महिलाओ की मदद से भी कायम रखी जाती है। ये ज़्यादातर दो साधनों का इस्तेमाल करके अपनी जड़े जमाती है, दंड और विशेषाधिकार। जो भी पितृसत्ता के नियमों का पालन करता है उसे विशेषाधिकार दिए जाते हैं, और जो उल्लंघन करता है उसे मिलते हैं दंड।

कई महिलाओं को भी पितृसत्ता सम्मान देकर तथाकथित अच्छी महिला बनाकर उनके साथ भी इस ढाँचे की सत्ता को साझा करती है। इसीलिए बात पितृसत्तातमक होने के साथ सत्ताहीन और सत्ताधारी होना भी हुआ। जैसे कि कई मसलों में एक दलित पुरुष एक सवर्ण जाति की महिला कि तुलना में सत्ताहीन हो सकता है।

और पढ़ें : पितृसत्ता का ये श्रृंगार है महिलाओं के ख़िलाफ़ मज़बूत हथियार

सारा खेल सत्ता का

कई घरों में बहुत सी महिलाएं पितृसत्तात्मक हो सकती हैं, क्यूंकि ये विचारधारा वर्चस्व जमाना और  नियंत्रण रखना सिखाती है। ऐसे में कई ऐसी महिलाएं होती  हैं जो कि घर में पितृसत्तात्मक अनुशासन के नामपर कड़े प्रतिबन्ध घर की अपनी ही महिलाओं एवं बच्चों पर लगाती हैं, उन्हें एक दायरे में सिकुड़कर रह जाना दिखाया जाता है। सिर्फ़ यही नहीं, कई महिलायें जो की सत्ताधारी होती हैं वह समाज में किसी अन्य महिला के चरित्र का अनुमान उसके कपड़े और जीने के ढंग से लगाती हैं, जो कि मनुवादी तक हो सकती हैं। पितृसत्ता की इस व्यवस्था की थोड़ी सी  सत्ता के मिल जाने पर कई महिलाएं भी दमनकारी हो जाती हैं, ऐसे में  ये भी हो सकता है कि घर के पुरुषों पर भी दबाव बनाया जाए। कोई पुरुष घर के काम में मदद करे तो तुरंत ये कहना की ये तुम्हारा काम नहीं है, एक प्रकार का लैंगिक बटवारा कर देती है। 

सत्ताहीन केवल महिलाएं ही नहीं

जैसे की हमने बात की कि कई मसलों में एक सवर्ण महिला एक दलित पुरुष से सत्ताधारी हो सकती है, ऐसे में इसे परत-दर-परत के नज़रिये से देखना ज़रुरी है, एक ही घर में दो महिलाएं हो और एक की बातों को माना जाए सुना जाए अथवा दूसरी महिला को नज़रअंदाज़ किया जाए, ये समझना ज़रूरी है कि बात सिर्फ पितृसत्ता से मिले विशेषाधिकार और सत्ता की है और इस बात की भी कि एक महिला जिसने कई पितृसत्तात्मक अन्याय झेले, जिसे यही दर्शाया गया की यही नियम कानून हर घर के होते हैं, ऐसे में वो महिला आगे चलकर सत्ता प्राप्त करते ही इन सभी बातों को दोहराएगी।

पितृसत्ता की ईमारत यानी की इसके पूरे ढांचे का सर्वोपरि पुरुष ही होता है, जो की सत्ता को बाँटकर और महिलाओं में आपस में ही फूट डलवाकर राज करना चाहता है।

महिलाएं ढो रही हैं पितृसत्ता  

जब हम ये कहते है की पितृसत्ता एक सोच है जिसका सम्बन्ध जेंडर से नहीं है, जबकि पितृसत्ता एक पुरुष प्रधानता व्यवस्था है। सच ये है की पितृसत्ता को महिलाओं के कंधो पर लाद दिया जाता है। एक ऐसी सोच के साथ जो कहती है कि ’ऐसा ही होता आ रहा है।’ पितृसत्ता महिलाओं के दिमाग में समावेशी स्त्री दोष का बीज बोकर उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देता है, सत्ता का बटवारा करके।

क्यूंकि मर्दो के बनाये इस ढाँचे में सत्ता का सौपने का सारा अधिकार पुरुषों का ही होता है। और यहाँ पर बात आ जाती है पूंजीवादी पितृसत्ता की, यानी की जिसकी पूंजी और उसकी सत्ता। अमूमन पितृसत्ता की व्यवस्था से चल रहे घरों में केवल पुरुष के पास ही पूंजी का नियंत्रण एवं अधिकार होता है, ऐसे में जो भी उस पुरुष की पितृसत्तात्मक मानसिकता के हिसाब से चलेगा व विशेषाधिकार के काबिल बन जायेगा। और फिर उसकी पूंजी पर जिस भी महिला का सबसे नज़दीकी अधिकार होगा उसकी ही सत्ता चलेगी, तो ये सत्ता बहु या सास किसी के भी हाथ में हो सकती है।

तोड़नी होंगी सोच की ये ईमारत

पितृसत्ता की ईमारत यानी की इसके पूरे ढांचे का सर्वोपरि पुरुष ही होता है, जो की सत्ता को बाँटकर और महिलाओं में आपस में ही फूट डलवाकर राज करना चाहता है। ऐसे में ज़रूरत है इस ढाँचे को तोड़ने की, क्यूंकि इसकी बांटी हुई सत्ता से ही इसकी जड़े और मज़बूत होती हैं। ये काम सरल नहीं हैं,कठिन है। लेकिन नामुमकिन नहीं है, अगर सभी महिलायें ये समझ जाएँ की हमे दमनकारी और शोषण करने वाला बनाया जा रहा है तो जल्द ही बदलाव आएगा, बस इसे पहचानने की देरी है। अगर अपनी इस सोच को बदलें की ऐसा ही होता आ रहा है तो धीरे-धीरे पितृसत्ता हर जेंडर से अपने कदम पीछे लेती नज़र आएगी!  

और पढ़ें : पितृसत्ता के कटघरे में चिखती महिला की ‘यौनिकता’


तस्वीर साभार : minorityrights

About the author(s)

I love reading and writing has been my only constant. Feminist, foodie and intersectional.

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content