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‘अच्छी औरत और बुरी औरत’ कहकर महिलाओं में समावेशी स्त्रीद्वेष को बढ़ावा देना पितृसत्ता के मूल गुणों में से एक रहा है। ‘अच्छी औरत’ जो पितृसत्ता की सभी शर्ते-नियम आदि का पालन करती हैं और बुरी औरत जो ऐसा नहीं करती है। माने औरत के सिर्फ़ दो ही खाँचे हैं – या तो औरत अच्छी है या फिर व कुल्टा है, कुलक्षिणी है।

पर इंसान? नहीं-नहीं औरत इंसान तो है ही नहीं। सिमोन दे बोउवार का कहना था “कोई औरत पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है।’ यानी कि समाज उसे औरत बनाता है, उसे पितृसत्ता के ढाँचे में ढाला जाता है, समाज अपने पितृसत्तात्मक साधनों से ज़रिए बक़ायदा एक औरत का काम निर्धारित करता है, उसकी भूमिकाओं को आकार देता है, उसकी जीवन-शैली को रूप देता है। वो कैसे चले, कितना हँसे, किस से बात करे, सबकुछ हमारा समाज उसके लिए निर्धारित करता है। इस तरह एक इंसान के रूप में उसका अस्तित्व धूमिल पड़ने लगता है। क्योंकि उसे बस औरत होना होता है। और वो भी अच्छी! अच्छी यानी की ऐसी जो की आगे चलकर किसी की पत्नी बनने योग्य हो, जिसे बच्चों से लगाव हो, घर के सारे काम जानती हो, वग़ैरह-वग़ैरह। लेकिन जिसका अपना कोई लक्ष्य न हो। पढ़ाई करायी भी जाए तो बस डिग्री के लिए, उसकी अपनी इच्छा के लिए नहीं।

औरत की सहजता

औरत की सहजता को तो पहले ही ख़त्म कर दिया जाता है, उसका साधारण होना उसका, उसके जैसा होना, एक इंसान होना, हँसना-बोलना। अगर कोई लड़की अपने आराम के हिसाब से बैठी है, पैर फैलाकर तब तो उसे सबसे पहले ‘फूहड़’ करार कर दिया जाता है, उससे कहा जाता है ‘तमीज़ से बैठो’ और इन शब्दों का असल मतलब होता है की ‘औरत की तरह बैठो’ पैरों को सिकोड़कर, खुद को जितना हो सके सिकोड़ लो, इतना की तुम दिखो ही न। शायद वाकई में, बचपन से यही तालीम लड़कियों को दी जाती है, खुद को सिकोड़ लेने की, दायरों में रहने की, अपने ख़्वाबों को सिकोड़ लेने की, एक दायरे में सिमट जाने की, ठीक वैसे ही जैसे दुनिया की तमाम ज़मीनें सरहदों से बंधी हैं। ऐसे में समाज को और खुद औरत को कहाँ याद रह पायेगा की वो है तो एक इंसान ही।

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‘बुरी औरत’ माने!

बुरी औरत की परिभाषा पितृसत्ता के मापदंडो से बिलकुल विपरीत है, वो औरत जो जानती है कि उसका जीवन उसके खुद के अधिकार, उसके ही हांथों में होने चाहिए, जैसे हर आम इंसान चाहता है और इसीलिए वो कहलाती है बुरी औरत। एक तरह से समझे तो वो औरत जो जीवन अपने मौलिक अधिकारों से जीना चाहती हो वो सीधे-सीधे बुरी औरत बना दी जाती है, जो औरत जो पितृसत्ता की शर्तों को नहीं मानती, जो सिर्फ एक आम इंसान की तरह एक तालीम हासिल करके अपनी ख़्वाबों को जीना चाहे, जो मनुवादी ढाँचे का विरोध करें, जो सक्षम हो, जिसे किसी के भी सहारे की ज़रूरत न हो, वो औरत तुरंत बुरी बना दी जाती है, उसे चालाक, तेज़, बिगड़ी हुई, बेहया, क्या कुछ नहीं कहा जाता? और ये सबकुछ किसलिए सिर्फ इसलिए क्योंकि व इंसानी ख्वाहिशे रखती हैं, जो किसी को दमन करने का अधिकार नहीं देती, जो पितृसत्ता के ढाँचे की अच्छी औरत बनकर कोई भी विशेषाधिकार स्वीकार नहीं करती।

एक औरत को सिर्फ अच्छी या बुरी बना देना उसके इंसान होने की पहचान पर हावी कर दी जाती है, उसकी ख्वाहिशे हों तो व बुरी, न हों, तो अच्छी। ये

इंसानी ख्वाहिशे = बुरी औरत

इंसानी ख्वाहिशे हद से हद क्या हो सकती हैं? खुल कर जीना? अपनी खुद की सुनना, किसी पाबंदियों से बांधा न जाना? और अगर ये ख्वाहिशें औरत की हैं तो सरासर ग़लत हैं, क्यूंकि ये सीधा-सीधा पितृसत्ता पर धावा बोलती हैं। पितृसत्ता को चुनौती देती हैं। इसीलिए महिलाएं अगर इंसानी ज़िन्दगी की बात करें तो फ़ौरन बुरी औरत में तब्दील कर दी जाती हैं। उसका खुलकर हँसना, अपने मन का खाना-पीना, जैसी भी चाल से चलना हो वैसे चलना, उसे अल्हड़ बना देता है, इंसान नहीं! इंसान के अलावा दुनिया की सारी चीजें उसे कह दी जाती हैं, बस उसका इंसान होना किसी को रास नहीं आता। उसकी अपनी सरल स्वाभाविक तम्मनाएं होना, आम व्यक्तियों जैसा रहना, न की अल्हड़ या फूहड़ होना, बस आम इंसान होना।

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औरत के खाँचे की नहीं ‘इंसान’ बनने की बात है बस!

इंसान की पहचान उसके दिमाग़ उसके व्यवहार से की जानी चाहिए, लैंगिक गैर बराबरी करना, क़तई सही नहीं है। एक औरत को सिर्फ अच्छी या बुरी बना देना उसके इंसान होने की पहचान पर हावी कर दी जाती है, उसकी ख्वाहिशे हों तो व बुरी, न हों, तो अच्छी। ये कहाँ का इन्साफ़ है? ये कैसा मनुवादी पितृसत्तात्मक ढांचा है? जो हमारे देश की औरतों को आंकता हैं, घोटता है, तौलता है? क्या वाक़ई इस ढाँचे की हमें ज़रूरत है? अगर आपको ये महसूस हो रहा है कि नहीं है ऐसी खोखली इमारत की ज़रूरत, तो शुरूआत कर दें इसे तोड़ने की, अपनी बेटी को, देश की हर लड़की को, हर महिला को इंसान बनने देने की।

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तस्वीर साभार : dissolve

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