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बीते 3 जनवरी 2020, महाराष्ट्र के शिक्षाविद् और समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले की जयंती पर महिलाएं, ट्रांस और क्वीयर समुदाय ने पूरे भारत में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ एक रैली का आयोजन किया। इसी कड़ी में, दिल्ली का मंडी हाउस भी ‘हल्ला बोल’ और ‘आज़ादी’ के नारों से गूँज उठा। पर इसबार आवाज़ें केवल छात्रों या किसी मुख्य तबके के लोगों की नहीं थी। आवाज़ें थी औरतों की, ट्रांसजेंडर्स की, क्वीयर समुदाय के लोगों की। यानी उनकी आवाज़ जिन्हें इस समाज ने दबाने की पुरज़ोर कोशिश की है।

समुदाय का कहना है कि वे नागरिकता संशोधन कानून, राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण और राष्ट्रीय जनसंख्या पंजीकरण को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं। हाल ही में प्रदर्शनकारियों के बीच की गई हिंसा का वे खुलकर विरोध करते हैं, साथ ही उनके विरोध के मुख्य कारण इस प्रकार हैं-

  • सीएए ग़ैर-मुसलमानों को धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करता है जो पूरी तरह से भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है। इसके अलावा यह असम समझौते का उल्लंघन भी है।
  • यह कानून आर्थिक व सामाजिक रूप से कमज़ोर लोगों के ख़िलाफ़ है जिनके पास आवश्यक दस्तावेज़ नहीं हैं। इनमें मुस्लिम, प्रवासी मज़दूर, छोटे किसान, घरेलू कामगार, सेक्स वर्कर, दलित, बहुजन, आदिवासी, महिलाएं आदि आते हैं।
  • देशव्यापी एनपीआर के महँगे और तार्किक रूप से बोझिल कार्यान्वयन का उद्देश्य क्या है, जब भारत हर दस साल में अपनी आबादी की जनगणना पहले से ही करता है?

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इसके अलावा रैली और जनसभा का मूल उद्देश्य भारत के संविधान में निहित समानता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर फासीवादी और हिंसक ताकतों द्वारा किए गए हमले के खिलाफ़ आवाजों को एकजुट करना था। यह रैली महिलाओं, क्वीयर और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, छात्रों, कार्यकर्ताओं, पेशेवरों, घरेलू श्रमिकों, कलाकारों, शिक्षाविदों, नौकरशाहों, पत्रकारों, वकीलों, सेक्स वर्कर, किसानों और अन्य संबंधित नागरिकों को एक साथ लाने का एक प्रयास था। दी गयी सूची उनके प्रदर्शन के अन्य पहलुओं को ज़ाहिर करती है-

● अपने धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी गणराज्य को फिर से पाने के लिए, संविधान द्वारा प्रदत्त हमारे अधिकारों का दावा करते हैं और हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों के विघटन के खिलाफ खड़े होते हैं;

● शांतिपूर्ण तरीक़ों से असंतोष ज़ाहिर करने के अधिकार को पुनः प्राप्त करने के लिए;

● सीएए, एनआरसी और एनपीआर को अस्वीकार करने के लिए;

● असम और त्रिपुरा के जनजातीय समुदायों के संघर्ष के लिए समावेशी, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान खोजने के लिए सरकार से आग्रह करने के लिए;

●  शैक्षिक संस्थानों में पुलिस के हिंसक हमले की निंदा करने, देशभर के छात्र  जो सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का साहसपूर्वक नेतृत्व कर रहे हैं, को अपना समर्थन और एकजुटता प्रदान करने के लिए;

● छात्रों और निहत्थे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी रूप में हिंसा की निंदा करने के लिए;

● सीएए, एनआरसी और एनपीआर के खिलाफ विरोध करने पर गिरफ़्तार किए गए राजनैतिक क़ैदियों और आंदोलनकारियों के ख़िलाफ़ दायर किये गए मामलों और उनकी तत्काल रिहाई की मांग करने के लिए;

● प्रदर्शनकारियों पर हिंसा भड़काने के लिए, मनमानी करने, हत्याएं करने, जनता को डराने और संपत्ति को नष्ट करने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी मुलाज़िमों को कानून के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए; और

● देशभर में संचार और इंटरनेट कनेक्टिविटी के मनमाने तरीक़े से बंद करने की निंदा करने और उनको दोबारा शुरू करने की मांग करने के लिए।

हज़ार से भी ज़्यादा लोग मंडी हाउस से जंतर मंतर तक इस जुलूस का हिस्सा बने। उनमें अपने छोटे बच्चों के साथ आई औरतें भी थी, अपने दिन की दिहाड़ी छोड़ आए मजदूर भी; ट्रांस लोग भी और वे भी जो ट्रांस और क्वीयर समुदाय के साथ खड़े होते हैं। यह वाक़या प्रदर्शनकारियों पर लगे ऐसे इल्ज़ामों को खारिज करता जिनमें कहा जाता है कि इतने लोग जो सड़कों पर प्रदर्शन करने उतरे हैं वे बिना कानून को पढ़े ही विरोध कर रहे हैं। यही वो वक़्त है जब लोगों को समझना होगा कि किस तरह एक धर्म की आड़ में सरकार ने कितने और पहलुओं को सीएए के ज़रिये छिपा दिया।

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