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टीवी वाले बता रहे थे कि 28 दिसबंर दिल्ली की अब तक के सबसे सर्द दिनों में से एक था। शाहीन बाग के उस इलाके में जाने के लिए जहां पिछले 15 दिनों से शाहीन बाग की महिलाएं इस ठंड में प्रदर्शन कर रही हैं मैं मेट्रो से पैदल ही निकली। थोड़ा आगे बढ़ने पर ही पुलिस ने पूरे रास्ते को बैरिकेड से घेरकर रखा था। मुझे देखकर एक पुलिसवाले ने घूमकर आगे जाने का इशारा किया। बैरिकेडिंग के आगे ही कुछ पुलिस वाले सुस्ता रहे थे तो कुछ महिला पुलिकर्मी बसों में बातचीत कर रही थी। ये दृश्य पुलिस की बैरिकेडिंग का था। इस बैरिकेडिंग के 5 मिनट की दूरी पर एक और बैरिकेडिंग थी- जनता की बैरिकेडिंग। शाहीन बाग के लोगों ने रस्सी, टूटे पत्थरों से उस पूरे इलाके की बैरिकेडिंग कर रखी थी। जो उस माहौल से परिचित थे वो अपने-अपने रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे।

मैं भी जनता की बैरिकेडिंग की ओर बढ़ी। बैरिकेडिंग के पास पहुंचते ही एक 12-13 साल के बच्चे ने डपटकर पूछा-आप कौन? मैंने अपना परिचय दिया कि मैं मीडिया से हूं। बच्चे ने फिर तपाक से पूछा कौन से मीडिया से? मैंने अपने संस्थान का नाम बताया। इससे पहले वह बच्चा कुछ और बोलता कुछ बड़ों ने उसे टोका और कहा, “जाने दे यार! ये गोदी मीडिया वाले नहीं हैं।” बच्चे ने रस्सी उठाकर मुझे अंदर जाने का इशारा किया। लेकिन नागरिकों के इस बैरिकेड पर चारों तरफ एनआरसी, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ नारे लिखे थे। उन पर आंबेडकर की तस्वीर की तख्तियां टंगी थी। ये बैरिकेड मानो किसी को रोकने के लिए नहीं बल्कि संविधान के आस-पास गैर संवैधानिक ताकतों को रोकने के लिए खड़ा किया बैरिकेड था। 

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर ही आज़ादी-आज़ादी के नारे तेज़ होने लगे। जमा देने वाली ठंड में आज़ादी के नारे लगाती औरतों को देखना भर ही सुकूनदायक था। आज़ादी के नारे सुनकर दिल में एक ही ख्याल आया कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी से आज़ादी के साथ-साथ  ये महिलाएं मन ही मन न जाने कितनी चीज़ों से आज़ादी मांग रही होंगी। इसके साथ एक सवाल और जो दिमाग में कौंध रहा था कि वो ये कि एनआरसी, नागरिकता संशोधन कानून ने कैसे इन महिलाओं को अचानक सत्ता के विरोध में लाकर खड़ा कर दिया….

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15 दिसंबर की शाम जामिया के छात्रों के साथ जो हुआ उस घटना ने इस इलाके की तस्वीर को बदल दिया। जामिया के छात्रों के साथ हुई हिंसा और नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीन बाग की महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ धरना दे रही हैं। इस ठंड में जहां हर कोई अपने घरों में दुबकने की चाहत रखता है वहां ये महिलाएं अपने बच्चों को गोद में लिए सत्याग्रह कर रही हैं। संविधान, नागरिकता, मोदी-शाह, बीजेपी-आरएसएस जैसे शब्दों से ये महिलाएं भली-भांति परिचित हैं। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ एक नैरेटिव मेनस्ट्रीम मीडिया ने यह भी चलाया कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को पहले यह कानून पढ़ लेना चाहिए। इस नैरेटिव का समर्थन करने वाले लोग जब शाहीन बाग आएंगे तो उनका भ्रम टूट जाएगा क्योंकि किसी कानून का विरोध करने के लिए उसके लिए उसकी हर लाइन का रटा होना ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी है इस मर्म को समझना कि नागरिकता संशोधन कानून संविधान विरोधी है। मुसलमानों को हाशिये पर ले जाने की साजिश है। बहुत दिनों बाद किसी सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं का हुजूम देखकर एक अजीब सी खुशी महसूस हो रही थी।

शाहीन बाग की महिलाएं, असम की महिलाएं, अपने दीक्षांत समारोह में इंकलाब के नारें लगाती लड़कियां, अकेले पुलिस मुख्यालय के बाहर तख्ती लेकर खड़ी लड़कियां, आरएसएस के दफ्तर के बाहर हिंदू राष्ट्र की नींव को चुनौती देती लड़कियां।

14 साल की शिफा पिछले 12 दिनों से स्कूल नहीं जा रही। ये पूछने पर कि वो यहां क्यों बैठी है शिफा बताती है – सीखने के लिए। शिफा के लिए नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रही ये महिलाएं किसी स्कूल जैसी ही मालूम पड़ती हैं। जहां शिफा जैसी बच्चियां हक की आवाज़ उठाना सीख रही हैं। अपने संविधान की अहमियत को समझ रही हैं। फर्ज़ कीजिए आज जो उन्मादी देश को बांटने की बात कर रहे हैं, वह पुलिस जो किसी इलाके में जाकर मुसलमानों को पाकिस्तान जाने की नसीहत दे रही है अगर वे सबके सब शिफा बन जाएं और कहें कि हमें सीखना है तो क्या कोई देश को बांट सकता है! शिफा से बातचीत के दौरान ही दुआ पढ़ी जाने लगी तो शिफा ने मुझे चुप रहने को कहा। दुआ खत्म होने के बाद पता चला उस दिन प्रदर्शनकारियों ने रोज़ा रखा था। 

तस्वीर साभार : रितिका

बिहार के एक छोटे से जिले से आकर बसी शगुफ्ता जिनकी उम्र 35 साल हैं वह बताती हैं कि वह विरोध-प्रदर्शन में इसलिए आई हैं क्योंकि वह हिंदुस्तानी हैं और इस बात को साबित करने के लिए वह किसी को कागज़ नहीं दिखाएंगी। उनकी इस लाइन पर मैंने मज़ाक में ही पूछा क्या आपने वरुण ग्रोवर का वीडियो देखा है, उन्होंने न में सिर हिलाया। बीच-बीच में अपने बच्चों को शगुफ्ता झिड़कती भी रहती हैं। शगुफ्ता आगे बताती हैं कि उनका दिन अमूमन बच्चों के बीच घर के अंदर ही बीतता है, वह एक संपन्न परिवार से आती हैं और उनके पास पूरे कागज़ हैं। यह पूछने पर कि जब उनके पास पूरे कागज़ हैं, पैसे की कमी नहीं है तो वह क्यों धरना देने आ रही हैं। इस सवाल पर तपाक से शगुफ्ता कहती हैं कि मेरे पास तो कागज़ हैं, मेरे बच्चों के पास भी हैं लेकिन उन गरीबों का क्या जिनके पास खाने को रोटी और रहने को छत नहीं वो कागज़ कहां से लाएंगे। शगुफ्ता वो शख्स हैं जो बहुत ज़रूरी होने पर ही घर के बाहर कदम रखती हैं लेकिन इस बार वह पिछले 14 दिनों से अंजान लोगों के लिए धरना दे रही हैं। उन्हें फिक्र हैं उनकी जिनके पास कागज़ नहीं है।

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हमारे बाप-दादा यहां के, उनकी कब्र यहां है, हमारा जन्म यहां हुआ फिर हम बाहरी कैसे हुए…इस सवाल के साथ शाहीन मेरी और शगुफ्ता की बातचीत को बीच में रोक देती हैं। शाहीन काफी गुस्से में हैं, वह कहती हैं हम अपने घर में राजी-खुशी रह रहे थे लेकिन बीच में ये सरकार एनआरसी और नागिरकता संशोधन कानून लेकर आ गई। सरकार हमें बाहर करना चाहती है लेकिन उसे शायद ये नहीं पता कि सरकार को बाहर करने का माद्दा हमारे अंदर भी है। अपने लोकतांत्रिक हक-ओ-हुकूक के बारे में बात करती औरतों से ज़्यादा खूबसूरत कुछ नहीं हो सकता।

आगे शाहीन कहती हैं कि इस सरकार ने कुछ दिया तो नहीं उल्टा हमसे छीनने पर आमादा है। शाहीन का इशारा यहां अर्थव्यवस्था की हालत पर था। वह भले अर्थव्यवस्था के भारी-भरकम शब्दों से परिचित नहीं थी लेकिन वह इतना ज़रूरत जानती हैं कि देश की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है, लोगों की नौकरियां जा रही हैं। रोज़े और ठंड की वजह से शाहीन के होंठों पर पपड़ियां जम गई थी लेकिन वह बोलती ही चली जा रही थी। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के बीच फर्क क्या है यह शाहीन उंगलियों पर गिनवा सकती हैं। 

तस्वीर साभार : रितिका

अभी हमें डिटेंशन सेंटर में डालेगी सरकार लेकिन एनआरसी तो सबके लिए है। जो लोग इसका समर्थन कर रहे हैं वो तब क्या करेंगे जब उनके नाम एनआरसी की लिस्ट में नहीं होंगे…शाहीन की आखिरी लाइन कुछ इस तरह की थी- क्या पता प्रधानमंत्री के पास खुद के दस्तावेज़ भी न हो। इतना कहकर शाहीन दुआ पढ़ने लगती हैं। शाहीन की शख्सियत कुछ ऐसी लगी मानो वह पूरी सरकार से अकेली लड़ जाएं, नागरिकता संशोधन कानून के पुर्जे-पुर्जे कर दिल्ली की ठंड में उसे अलाव में डालकर चैन से अपने बच्चों के साथ वापस घर चली जाएं। 

अपने लोकतांत्रिक हक-ओ-हुकूक के बारे में बात करती औरतों से ज़्यादा खूबसूरत कुछ नहीं हो सकता।

शाहीन बाग में उस जगह बैठी हर दूसरी महिला इस देश के संविधान की रखवाली के लिए खड़ी थी। हर तरफ लगी बाबा साहब आंबेडकर की तस्वीरें मानो कह रही थी कि इसी दिन के लिए मैंने संविधान में लिखा था कि इस देश का हर नागरिक बराबर है। अब उस संविधान को बचाने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। शाहीन बाग की महिलाएं, असम की महिलाएं,  अपने दीक्षांत समारोह में इंकलाब के नारें लगाती लड़कियां, अकेले पुलिस मुख्यालय के बाहर तख्ती लेकर खड़ी लड़कियां, आरएसएस के दफ्तर के बाहर हिंदू राष्ट्र की नींव को चुनौती देती लड़कियां।

इन औरतों, इन लड़कियों के हाथ में संविधान कितना सुरक्षित लगता है। वो औरतें जिन्हें अपने घरों में ही शायद पूरी तरह बराबरी का दर्ज़ा न मिला हो वे बाहर आकर अपने अधिकार, अपने नागरिक होने के अधिकार को रीक्लेम करने में लगी हैं। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध से शुरू हुआ यह आंदोलन संविधान को फासीवादी ताकतों से बचाने के आंदोलन में तब्दील हो चुका है।

इस आंदोलन में जहां तक नज़र जाती है लड़कियों, छात्राओं की तादाद लीड करती नज़र आती है। इसकी एक वजह साफ है नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी, एनपीआर सब साथ मिलकर जिस हिंदू राष्ट्र की नींव तैयार कर रहे हैं उस हिंदू राष्ट्र से सबसे ज़्यादा खतरा दलित, अल्पसंख्यकों और औरतों को ही है। जिस संविधान ने हमें बराबरी का हक दिया अगर उस संविधान के अस्तित्व पर चोट होगी तो वह चोट सीधा हमसे जुड़ी होगी। संविधान बचाने की इस लड़ाई में शाहीन बाग की औरतें एक मिसाल कायम कर चुकी हैं, उनका आंदोलन अब सत्याग्रह में बदल चुका है- संविधान को बचाने का सत्याग्रह। एक लड़ाई हमारे पूर्वजों ने संविधान बनाने के लिए लड़ी थी, अब ये लड़ाई बने-बनाए संविधान को बचाने की है।

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