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बीते कुछ सालों में हमारे देश में विश्वविद्यालयों की परिभाषा को सरकार के बताये मानकों में समेटने का एक चलन-सा चल पड़ा है। ये वो चलन है जो साफ़ शब्दों में ये बताता है कि शिक्षा का मतलब है – ‘राजनीति के अलग रहना। संगठित नहीं होना। अपने विचार न रखना। वग़ैरह-वग़ैरह।’ यूँ तो ये कोई नई बात नहीं है, इस बात की पुष्टि भारत में विश्वविद्यालयों में बेहद सीमित छात्र-राजनीति करता है। अगर हम लोकतांत्रिक मूल्यों से सक्रिय छात्र राजनीति की बात करें तो हमारे ज़हन में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) का नाम आता है।

लेकिन दुर्भाग्यवश मौजूदा सरकार ने अब जेएनयू पर सीधे निशाना साधना शुरू कर दिया है और दिन-प्रतिदिन ये बेहद हिंसात्मक होता जा रहा है। साथ ही, बहुत से लोग आज भी ये नहीं समझ पा रहे हैं कि  की जेएनयू क्यों आंदोलनों में सक्रिय रहता है? क्यों हमेशा जेएनयू की आवाज़ ही सभी के कानों में चुभती है? जबकि वो एक ऐसा विश्वविद्यालय है जो हमेशा से संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए, उन कानूनों के ख़िलाफ़ जो उसका हनन करते हैं सभी के लिए अपनी बुलंद आवाज़ उठाते हैं, आंदोलन करते हैं। वहां के छात्र पढ़ते हैं, समझते हैं, सवाल करते है, असहमति जताते है सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ़।

हम लड़ेंगे साथी

ये बात न जाने क्यों समझ मुश्किल है कि जेएनयू के छात्र अगर कभी भी आवाज़ उठाते है तो वो इसलिए नहीं कि उनका भला हो बल्कि इसलिए कि सभी का भला हो।

इसी तर्ज़ पर, हमें समझना होगा कि हाल ही में, नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ जेएनयू के छात्रों का प्रदर्शन हमारे मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकारों को बचाने के लिए है और अगर कोई प्रतिरोध कर रहा है तो यह सभी के लिए है। अगर देश वाकई संविधान के अनुसार चले तो शायद ही हमारे समाज में इतनी गैर-बराबरी दिखे, ख़ैर ये तो बाद की बात है। ज़रूरत है ये समझने की कि आखिर क्यों हम इनकी आवाज़ों में छिपी संविधान की गरिमा बचाये रखने की गुहार को सुन नहीं पाते।

जनांदोलनों से हक़पकायी सत्ता का ‘हिंसा और दमन’

बीते रविवार जेएनयू में जो भी हुआ, वो जनांदोलनों से हक़पकाए हुए लोगों की क्रूरता थी। ये एक हिंसात्मक प्रतिक्रिया थी, लोगों की एकजुटता और उनके प्रतिरोध के खिलाफ़। कई घण्टों तक चलती इस हिंसा में नक़ाबपोश गुंडों ने हमारे लोकतान्त्रिक देश के कड़वे सच और सत्ता के पगलाए मद का पर्दाफ़ाश कर दिया। इस घटना से साफ़ है कि देश में  कोई भी शिक्षण संस्थान इन गुंडों से सुरक्षित नहीं है। ग़ौरतलब है कि हिंसा के इतने विक्राल रूप लेने के बावजूद पुलिस ने कैंपस के भीतर आकर तुरंत कोई एक्शन नहीं लिया बल्कि तब पुलिस ‘नियम और क़ानून’ के अंतर्गत वीसी की अनुमति का इंतज़ार कर रही थी! तब ये नियम क़ानून कहा थे, जब जामिया विवश्वविद्यालय के छात्रों को लाइब्रेरी में पुलिस वालों ने घुस कर पीटा था! तब कितनी बर्बरता से निहत्थे छात्रों पर गोलियों तक का इस्तेमाल किया गया!

जेएनयू  में जिस बेशर्मी से ये तमाम नक़ाबपोश गुंडे बर्बरता कर रहे थे, हांथों में लोहे की रॉड्स, डंडे व लाठियां लिए निहत्थे छात्र-छात्राओं को पीट रहे थे, कैंपस में हॉस्टलों में तोड़-फोड़ कर रहे थे। इससे साफ़ है कि किस प्रकार शिक्षण संस्थानों में खुलेआम ऐसी गुंडागर्दी हो सकती है।

और पढ़ें : जेएनयू में दमन का क़िस्सा हम सभी का हिस्सा है, जिसपर बोलना-मुँह खोलना हम सभी के लिए ज़रूरी है!

जेएनयू स्टूडेंट यूनियन की अध्यक्ष आईशी घोष के साथ प्रोफ़ेसर सुचारीता सेन और भी कई अन्य छात्र व शिक्षक भी इस हमले के दौरान गंभीर रूप से घायल हुए। जेएनयू के छात्र कई वीडियो और तस्वीरों से ये दावा कर रहे  हैं कि सभी नकाबपोश गुंडे एबीवीपी (जो की आरएसएस का एक छात्र संगठन है।) वहां के थे। कुछ लोगों को पहचान भी लिया गया और एक ऐसा व्हाट्सअप ग्रुप का स्क्रीनशॉट सामने आया जहाँ साफ़तौर पर हिंसा की शुरूआती बातें प्लानिंग बकायदा की जा रही है, जो ये दिखा रहा है की ये हिंसा कितने हद तक सुनियोजित थी।

इन नकाबपोश गुंडों के भी हिंसा करते हुए कई वीडियो सामने आये, लेकिन पुलिस की माने तो ये सभी गुंडे भाग चुके थे! ये भाग नहीं रहे थे, ये सभी हमे दिखा रहे थे की कितना कमज़ोर हो सकता है हमारा लोकतान्त्रिक देश और हमारा प्रशासन अगर इसके दमन के विरुद्ध आवाज़ उठाई जाए!

जेएनयू के छात्र व शिक्षकों का साथ आना, नारे लगाना, अपने आप में हिम्मत और हौसला देता है।

‘सत्ता की चाल’ असल मुद्दों से भटकाना

सोचने वाली बात ये भी है कि किस तरह ऐसी हिंसा से लगातार देश का ध्यान अन्य मुद्दों से भटकाया जा रहा है। लगातार कोई न कोई ऐसी घटना जो तुरंत मुख्यधारा मीडिया की कवरेज में हर क्षण टीवी पर छाई दिखेंगी। ऐसे में गिरती हुई अर्थव्यवस्था, डिटेंशन सेंटर में मरते लोगों की खबरे या कश्मीर जो भी पिछले 150 दिनों से न जाने किन हालात में है, आप तक ये खबरे नहीं पहुंच पाएंगी। जिस तरह जनांदोलनों को एक हिंसात्मक रूप देकर इन्हें रोकने की पुरज़ोर कोशिशें की जा रही है उससे कैसे इन आंदोलनकारियों की छवि को खराब किया जाए,  और किस तरह ये डर कायम रखना कि किसी भी शिक्षण संस्थान पर दमनकारियों का हमला कभी भी किया जा सकता है। ऐसे तमाम पैंतरों से जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय की गरिमा को बार-बार ठेस पहुंचाया जाता है। इतना ही नहीं, ये आम जनता के मन में ये झूठी बातें भर देना कि जेएनयू कितना देश विरोधी है, जबकि वहां बस छात्रों द्वारा सवाल उठाये जाते हैं, हकों के लिए, संविधान के लिए!

शरीर को घायल किया है जज़्बे को नहीं!

इस सभी हिंसा के बावजूद, जेएनयू के छात्र व शिक्षकों का साथ आना, नारे लगाना, अपने आप में हिम्मत और हौसला देता है। एक ऐसी हिम्मत जो कभी नहीं टूटनी चाहिये, फिर चाहे प्रतिरोध विरोधी शक्तियाँ ऐसी गिरी हुई हरकतों पर ही क्यों न उतर आये। बोलना, आवाज़ उठाना, सवाल करना और सोचना ये कभी बंद नहीं होना चाहिए। क्योंकि “हम लड़ेंगे साथी उदास मौसम के ख़िलाफ़!”

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तस्वीर साभार : deccanherald

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