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साल 2009 में बनी फ़िल्म ‘फ़िराक’ नंदिता दास के निर्देशन में बनाई गई। ये फ़िल्म 2002 के गुजरात दंगो पर आधारित है लेकिन इस फ़िराक की खासियत ही यही है कि बिना किसी हिंसा के इसमें दंगो का दर्द महसूस कराया गया है। वो दर्द और वो सवाल जो हर एक किरदार की आँखों में नज़र आता है। इस एक ही फ़िल्म में आपको चार अलग-अलग किरदारों की कहानियां देखने मिलेंगी। सबसे ख़ास बात ये है की इन चार अलग-अलग कहानियों में अलग तबके भी दिखाए गए है।

हर तबके का दर्द बहुत गहराई और संवेदनशीलता से दर्शाया गया है। किस तरह एक मज़हब, एक नाम और एक पहचान आपकी जान पर हावी हो सकती है, वो डर वो घबराहट बखूबी फ़िल्म में दिखाया गया है। किस तरह एक ऑटो रिक्शा चालक जब अपना घर जला हुआ देखता है तो उसकी नफ़रत की आग के साथ-साथ ज़िन्दगी दुबारा बटोरने की झुंझलाहट, लाचारी  और गुस्सा ये सबकुछ महसूस किया जा सकता है,  शाहना गोस्वामी और नवाज़ुद्दीन सिद्द्की के किरदार में।

और वही दूसरी तरफ़ एक ऊंचे तबके का मुसलमान तक इन दंगो से अछूता नहीं रहता क्यूंकि इस तबके का विशेषाधिकार नहीं सिर्फ़ वो मज़हब जो हाशिये पर है उसे देखा जाता है। कैसे एक पढ़े-लिखे मुसलमान आदमी के मन का डर उसकी मजबूरी, उसके नाम का भार कैसे उसे हर रात जगाता है और वो शहर छोड़ने तक के लिए कदम आगे बढ़वाता है। इन सभी उलझनों में और दुःख में वो महसूस करता है कि वो जहाँ भी जाए उसके साथ उसका डर हमेशा साथ जाएगा। इन तमाम सवालों में, खलल में ख़ौफ़ में वो अपने नाम को गले लगाता है। संजय सूरी ने इस किरदार को बखूभी निभाया है।

शायद ये बड़े पर्दे पर दिखाया गया वो समाज का सच है जो हर बार हम सभी की इंसानियत को बेपर्दा करता रहेगा।

लेकिन किस तरह एक बूढ़े मुसलमान गायक जो कही न कही आज भी इस नफ़रत से आँखे मूंदे बैठें है, जो उम्मीद के दिये को दिल में रौशन किये हुए है जो गंगा-जमुनी तहज़ीब को मानते हैं, जो नहीं मानते की हिन्दुओं ने मुसलमानों को मारा जो बस यही मानते हैं कि इंसान-इंसान को मार रहा है, जो सच्चाई से दूर रहते हैं तबतक जबतक धीरे-धीरे समाज की ये सच्चाई उनके सामने खुद नहीं आती। कैसे एक मज़ार जो पहले किसी मोड़ पर हुआ करती थी वो वहां दुबारा नहीं दिखती, जब रोते चेहरे और सिसकते बच्चे लोग उन्हें अपनी आँखों से दिखते हैं तब कैसे वो अमन का दामन छोड़ देते हैं और कैसे मान लेते हैं कि सिर्फ़ सात सुरों में इतनी काबिलियत कहाँ की ऐसी नफ़रत का सामना कर सके! ऐसी बेचारगी नस्सरूद्दीन शाह के किरदार के तौर पर दिखाया गया है।

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इस फ़िल्म में इंसानी जज़्बातों को इतने करीब से दिखाया गया है कि हर एक जज़्बात ऐसा भीषण दुःख, ऐसी यातना, ऐसी नफ़रत जो एक मुर्दे का गला घोट देना चाहती है,  ऐसी महकुमियत जो हर लम्हा सीने पर बोझ बने ढोई जाती है, ऐसे सवाल जो आँखों में आग बने दहकते हैं। हर तबके का दर्द तो इस फ़िल्म में दिखाया ही गया है।

लेकिन औरत होना जंग में  दंगों में क्या होता है वो भी दर्दनाक एहसासों से बतलाया गया है कि किस तरह एक औरत अगर दूसरे मज़हब की है तो वो सिर्फ़ एक शरीर हैं। जैसे दीप्ति नवल के किरदार को देखें तो हिन्दू-महिला होते हुए भी वो लाचार है दंगों के कारण, जिसके दरवाज़े पर एक औरत मदद मांगती है, मिन्नतें करती है, दरवाज़ा खटखटाती है और वो खटखटाहट उसे रोज़ सुनाई देती है। वो दरवाज़ा खोलकर बार-बार देखती है, लेकिन दरवाज़ें पर सिर्फ़ पछतावा होता है। दीप्ति नवल का किरदार हमें उस मनुवादी पितृसत्ता को दिखाता है जो औरतों में ज़बान नहीं देखना चाहता, जो उसे महकूम रखना चाहता हैं उसके इंसान होने के अधिकारों से उसके एहसासों से। उनके किरदार में एक अलग-सी चमक थी और एक नारीवादी सोच थी। और इसी किरदार ने फ़िल्म को परत दर परत बारीकी भी दी है।

और फिर वो नन्हा किरदार जो अपनी छोटी-सी उम्र में समझ जाता है कि कहा उसे मोहसिन होना है और कहा मोहन। जो इतनी हिंसा देख लेता है कि आखिर में हम समझ सकते हैं कि उसका बचपन धुंधला जाता है। और कैसे उसकी आँखों में सवालों की लड़ी दिखाई पड़ती हैं,  कैसे उसके नन्हे कदम मज़हब में बटे इलाकों को नाप लेते है कि मंदिर की तरफ़ मुड़ूँगा तो मारा नहीं जाऊँगा।

ये सभी एहसास गहरी, संजीदा भावनाएं फ़िल्म ‘फ़िराक’ में पेश की गई हैं कि कैसे हिंसा अराजकता इंसान से उसके भीतर का एक ऐसा अंश ख़त्म कर देती है जो शायद कभी वापस नहीं आ सकता। जिस साहस के साथ नंदिता दास और शुचि कोठारी ने इन सभी किरदारों को कहानी के साथ में पिरोया है, वो काबिले तारीफ़ है। शायद ये बड़े पर्दे पर दिखाया गया वो समाज का सच है जो हर बार हम सभी की इंसानियत को बेपर्दा करता रहेगा।

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तस्वीर साभार : youtube

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