Subscribe to FII's Telegram

माहवारी यानी पीरियड्स वैसे है तो एक महिला के शरीर का हिस्सा। ऐसा हिस्सा जो की पूरी तरह से जैविक और प्राकृतिक है। लेकिन हम महिलाएँ अपने जीवन से जुड़े इस हिस्से से जब गुजर रही होती है तो उस दौरान हमारा पितृसत्तात्मक समाज इसके बीच में दख़ल देने खड़ा हो जाता है और समाज के साथ खड़ा होता है धर्म। और धर्म के साथ खड़े होते हैं रीति-रिवाज़ और मान्यताएं, जो धीरे-धीरे कुप्रथा का रूप ले लेते हैं। एक तरीक़े से ये बात समझने वाली है कि पितृसत्ता महिलाओं के जीवन, शरीर, यौनिकता और सोच यानी की हर जगह जड़े जमाये बैठी है। महिलाओं का अपने खुद के शरीर पर कोई अधिकार न तो  हमारा समाज देखना चाहता है और न इसे स्वीकारना चाहता है। और ऐसे समय में जब महिला पीरियड के दर्द और कई तरह के शारीरिक बदलावों से गुजरती है तब उसकी ज़िंदगी में समाज ढेरों सामाजिक मुश्किलें और भेदभाव को बढ़ावा देता है।

हमारे समाज में हर दूसरी लड़की ने चाहे वो शहर हो या गाँव, अपने-अपने हिस्से का भेदभाव उसने ज़रूर झेला होगा। खासकर तब जब उसके पीरियड्स चल रहे होते हैं। और ये सभी अजीब सी धारणाएं हम लड़कियों को कुछ नहीं बल्कि सिर्फ़ असहज करती है। जैसे की कई जगहों पीरियड के दौरान में नए कपड़े पहनने में मनाही होती है। वहीँ तथाकथित ऊँची जाति वाले घरों में पीरियड्स के समय में लड़की का रसोई में जाना, पूजा या व्रत रखना आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता है। बल्कि कई जगहों पर तो उसे इस दौरान महिला को घर से ही बाहर रहने को मजबूर किया जाता है। वहीँ कुछ घरों में लड़की को ज़मीन पर सोने के लिए तक कह दिया जाता है। ये तो चंद उदाहरण मात्र है। बस इनकी फ़ेहरिस्त क्षेत्र के अनुसार बदलती है। जब हम इन सभी पाबंदियों और भेदभाव का विश्लेषण करते है तो यही पाते है कि इसका मूल है – पीरियड के दौरान महिलाओं को अपवित्र मानना। इसी विचार के आधार पर महिला के साथ भेदभाव किया जाता है। अब ये सब एक तरह की अजीबोगरीब धारणाएं नहीं तो और क्या है भला?

और पढ़ें : ‘पीरियड का खून नहीं समाज की सोच गंदी है|’ – एक वैज्ञानिक विश्लेषण

पीरियड की बात पर हमारा ‘दोमुँहा समाज’

हमारे भारतीय समाज में जहाँ एक तरफ़, पीरियड्स को अशुद्ध और गन्दा मानता है। वहीँ भारत में एक ऐसी देवी का मंदिर भी है, जिनके पीरियड को पूजनीय माना जाता है। ‘कामाख्या देवी का मंदिर’ न केवल असम में एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल है, बल्कि देश का एक अनूठा मंदिर भी है। मंदिर की अधिष्ठात्री देवी कामाख्या देवी ‘रक्त देवी’  के रूप में प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि, हर साल आषाढ़ (जून) के महीने में, कामाख्या के पास ब्रह्मपुत्र नदी लाल हो जाती है। यह माना जाता है कि इस दौरान देवी की ‘माहवारी’ होती है। इसी वजह से इस दौरान देवी के दर्शन को हर साल लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है।  

हमारे भारतीय समाज में जहाँ एक तरफ़, पीरियड्स को अशुद्ध और गन्दा मानता है। वहीँ भारत में एक ऐसी देवी का मंदिर भी है, जिनके पीरियड को पूजनीय माना जाता है।

ग़ौरतलब है कि माहवारी के दौरान कामख्या देवी की माहवारी पूजनीय है। वहीं दूसरी ओर, जीती जागती महिला की माहवारी को अशुद्द मानकर ढेरों भेदभाव और हिंसा का शिकार होना पड़ता है। उल्लेखनीय है कि, भारत के राज्यों में जब एक लड़की की माहवारी शुरू होती है तो उसकी पूजा तक करवाई जाती है। उत्सव मनाया जाता है। यों तो ये देखने-सुनने में काफ़ी प्रगतिशील लगता है लेकिन जब हम इस उत्सव की विचारधारा-उद्देश्य को देखते है तो उसके अनुसार, वास्तव में यह उत्सव इस ख़ुशी में मनाया जाता है कि लड़की का शरीर अब माँ बनने के लिए तैयार हो गया है, जो की फिर से लड़की को समाज की पितृसत्तात्मक सोच के घेरे में लाकर खड़ा कर देता है।

और पढ़ें : देवी की माहवारी ‘पवित्र’ और हमारी ‘अपवित्र?’

पीरियड्स का खून गंदा या हमारी सोच?

ये सबसे बड़ी ग़लतफहमी है कि पीरियड के दौरान निकलने वाला खून गन्दा होता है, जबकि वो गन्दा नहीं बल्कि सामान्य खून होता है। ये वही खून होता है, जिससे गर्भावस्था के दौरान कोख में पलने वाले बच्चे का शरीर तैयार होता है। लेकिन पीरियड से संबंधित कुरितियों की जड़ता को देखने के बाद यह लगता है कि पीरियड के खून से जुड़े इस तथ्य को उजागर करना, समझना और स्वीकार करना बेहद मुश्किल है।  

कबतक नाक सिकोड़ेंगे पीरियड्स से

पढ़े-लिखे लोग तक पीरियड्स से जुड़ी इन तमाम ग़लतफ़हमियों को कई बार सही मानते हैं। क्या शहर और क्या गाँव। क्या पढ़े-लिखे और क्या अनपढ़। पीरियड से जुड़ी ये सभी बातें हर जगह एक जैसी ही है। हर तरफ़ भेदभाव किया जाता है। ऐसे में ये समझना मुश्किल है की इस प्राकृतिक प्रक्रिया को इतना घिनौना इतना गन्दा बताकर-जताकर आख़िर समाज को क्या हासिल होगा? आख़िर क्यों एक महिला के जीवन में इस कदर दख़ल देने की ज़रूरत है। हम ये क्यों नहीं समझते कि ये तमाम धारणाएं मनुवादी पितृसत्ता से होकर निकलती है और ऐसे भेदभाव से हम सभी को कुछ नहीं मिलेगा। मिलेगी तो बस पुराने रिवाज़ों से लिपटी हुई सोच और मान्यताएं।

एक महिला का जीवन वैसे भी किसी संघर्ष से कम नहीं होता। ऐसे में क्यों हम महिलाओं पर ये तमाम धारणाएं और जोड़कर उनके शरीर को भी पितृसत्ता के नियमों से चलाने पर तुले हैं। ज़रा गौर कीजियेगा अगली बार इन सभी धारणाओं पर और खुद से सवाल करियेगा की आख़िर ऐसा भेदभाव क्यों और कब तक?

और पढ़ें : शर्म का नहीं बल्कि विस्तृत चर्चा का विषय हो माहवारी


तस्वीर साभार : unfpa

Leave a Reply