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भारत में कोरोना वायरस फैल चुका है। अब तक कम से कम 492 लोग इसका शिकार हो चुके हैं और नौ की मृत्यु हो चुकी है। क्योंकि ये वायरस संक्रामक है और तेज़ी से फैल रहा है, हर जगह ‘सोशल डिस्टन्सिंग’ करने यानी घर से बिलकुल न निकलने की सलाह दी जा रही है। 22 मार्च को देशभर में चौदह घंटे का कर्फ्यू रखा गया और 24 मार्च को पूरे देश में तीन हफ़्तों का ‘लॉकडाउन’ लागू किया गया। ‘लॉकडाउन’ मतलब किसी को किसी भी हालत में घर से निकलने की इजाज़त नहीं है, सिवाय अगर वे खाना या दवाओं जैसा ज़रूरी सामान खरीदने या हॉस्पिटल वगैरह जाने के लिए निकले हों।

लॉकडाउन मतलब स्कूल और ऑफिस सब बंद हैं। इसका असर पड़ रहा है छोटे उद्योगों और दिहाड़ी मज़दूरों पर, जिन्हें अपनी सैलरी नकद के रूप में हर दिन के हिसाब से मिलती है। इसके अलावा एक और वर्ग है जिसपर ये लॉकडाउन बहुत भारी पड़ रहा है वो है ‘औरतें।’ आमतौर पर एक औरत को जितना काम करना पड़ता है, ऐसे हालातों में उसे दुगना करना पड़ रहा है।

ये बात ज़ाहिर है कि घर का काम हमेशा औरतें ही देखती आई हैं। बच्चों का ध्यान, रसोई का काम, बुज़ुर्गों की देखभाल और राशन का इंतज़ाम उन्हीं की ज़िम्मेदारी रही हैं। आज हालातों में थोड़ा बदलाव आया है। आज के ज़माने में औरतें, अगर वे प्रिविलेज्ड हों, पैसे देकर इन कामों में हाथ बंटाने या पूरी तरह इनकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए किसी डोमेस्टिक हेल्प या नर्स को रख सकती हैं। पर इस वक़्त स्थिति ऐसी है कि कोई भी इंसान अपने घर से निकलकर काम पर नहीं जा पा रहा, चाहे वो कोई उद्योगपति हो या उसके घर पर झाड़ू-पोंछा करने वाली औरत। जब डोमेस्टिक हेल्प उपलब्ध ही न हो तब एक कपल को घर की सारी ज़िम्मेदारी आपस में बाँट लेने की ज़रूरत पड़ती है। और यहीं सवाल उठता है कि ये ज़िम्मेदारी बराबर हिस्सों में बांटी जा रही है या इसका सारा भार औरत को ही उठाना पड़ रहा है?

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मुसीबत की इस घड़ी में ज़रूरत है एकजुट होकर हालात सुधारने की क्योंकि लिंग आधारित सामाजिक भेदभाव हमें और अँधेरे की तरफ ही ले जाएगा।

साल 2014 में जब अफ्रीका में एबोला वायरस फैला था, इसका असर समाज में बढ़ते लिंग वैषम्य में देखा गया था। साइमन फ्रेसर यूनिवर्सिटी में रिसर्चर जूलिया स्मिथ कहती हैं, “महामारी की वजह से सभी के रोज़गार में नुकसान हुआ था लेकिन उसके ख़त्म होने के बाद, सबके वापस काम पर जाने के बाद देखा गया कि औरतों को मर्दों से कहीं ज़्यादा आर्थिक नुकसान हुआ था।” यानी मर्द भले ही इस मुश्किल दौर में अपने करियर पर ध्यान दे पाए हों लेकिन औरतों के लिए ये संभव नहीं था। घर और बच्चों की देखभाल के चक्कर में वे अपनी प्रोफेशनल ज़िन्दगी पर ठीक तरह से ध्यान नहीं दे पाईं।

औरतों से आमतौर पर यही उम्मीद रखी जाती है कि ज़रूरत पड़ने पर वे करियर दांव पर लगाकर घर की सारी ज़िम्मेदारियां उठा लेंगी। घर के छोटे और बुज़ुर्ग सदस्यों की सारी ज़रूरतें संभाल लेंगी। ये उम्मीद इसलिए की जाती है क्योंकि औरतों के करियर को गंभीरता से नहीं लिया जाता। उसे महज़ एक ‘शौक़’ की तरह देखा जाता है और औरत की असली ज़िम्मेदारी घर के काम को ही माना जाता है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि औरतों को मर्दों से कम सैलरी दी जाती है। उनके कार्यालयों में उनका वर्चस्व मर्दों जितना नहीं है। प्रोफेशनल दुनिया भी समाज से अलग नहीं है और वहां भी यही माना जाता है कि आख़िर औरत की ज़िम्मेदारी तो परिवार की तरफ़ ही रहेगी।

ठीक ही कहा गया है कि कोरोना वायरस का असर सबसे ज़्यादा वंचित वर्गों पर पड़ता है। और महिलाएं भी एक तरह से वंचित ही हैं क्योंकि हमें अभी भी अपने प्रोफेशंस में, बाहर की दुनिया में कहीं ज़्यादा तरक्की करना बाकी है और ऐसा तब तक मुमकिन नहीं होगा जब तक लिंग के आधार पर ज़िम्मेदारियां थोपना बंद नहीं होगा। मुसीबत की ऐसी घड़ी में हमें ज़रूरत है एकजुट होकर हालात सुधारने की कोशिश करने की, क्योंकि लिंग के तौर पर ऐसा सामाजिक भेदभाव हमें और अँधेरे की तरफ ही ले जाएगा।

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तस्वीर साभार : independent

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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