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कोरोना वायरस की चपेट से बचने के लिए आज देशभर में लॉकडाउन लागू किया गया है। क्योंकि ये एक संक्रामक बीमारी है, इससे बचने का एक ही तरीका है। ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ यानी एकांत में रहना और दूसरों के संपर्क न आना। ये लॉकडाउन इसीलिए लागू हुआ है ताकि लोग अपने घरों में रहें और बाहर जाकर बीमार न पड़ें। 24 मार्च की रात को तीन हफ़्ते का ये लॉकडाउन घोषित हुआ था। प्रधानमंत्री के शब्दों में ये एक ‘लक्ष्मण रेखा’ है जो हमारे बचाव के लिए खींची गई है। पर अफ़सोस, इस लक्ष्मण रेखा की सुरक्षा उन्हीं के लिए उपलब्ध नहीं है जिन्हें इसकी ख़ास ज़रूरत है। लॉकडाउन चालू हुआ था रात के बारह बजे और उसकी घोषणा हुई थी आठ बजे। जनता के पास इसकी तैयारी के लिए सिर्फ़ चार घंटे थे। इसका ये नतीजा हुआ कि इतने कम समय में बहुत लोग राशन का इंतज़ाम नहीं कर पाए। या बाहर से अपने घर नहीं लौट पाए। आम मध्यमवर्गीय जनता के लिए ये एक बहुत बड़ा धक्का तो था पर इसका सबसे ज़्यादा असर हुआ भारत के महानगरों में बसे ग़रीब दिहाड़ी मज़दूरों पर।

इस तबके के मज़दूरों के लिए कोरोना वायरस से बीमार पड़ना इतनी फ़िक्र की बात नहीं है जितना सही सलामत वापस अपने घरों में पहुंचना है। क्योंकि लॉकडाउन की वजह से तमाम छोटे-बड़े उद्योग ठप्प हो गए हैं, ये सभी लोग जो कर्मचारी के तौर पर इनसे जुड़े हैं अब बेरोज़गार हैं। शहरों से ये सभी अपने अपने गांव वापस जाने की कोशिश में हैं, जो लॉकडाउन की वजह से संभव नहीं हो पा रहा है और यही उन पर बहुत भारी पड़ रहा है। महज़ चार घंटे एक शहर छोड़ने के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाने के लिए काफ़ी नहीं हैं, जिसकी वजह से इन मज़दूरों को लॉकडाउन लागू होने के बाद तक भी यात्रा करनी पड़ रही है और लॉकडाउन का उल्लंघन करने की सज़ा भुगतनी पड़ रही है।

आंकड़ों के हिसाब से लॉकडाउन शुरू होने से अब तक क़रीब 22 ऐसे लोगों की मौत हो चुकी है, हालांकि असली संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है। ये सभी अपने घर जाने की कोशिश कर रहे थे पर या तो इन्हें सोशल डिस्टेंसिंग के नियम तोड़ने की वजह से पुलिस के हाथों मरना पड़ा या यात्रा करते दौरान थकान या दुर्घटना की वजह से इनकी मौत हो गई। ऐसी कई मौतें होने के बाद जब दिल्ली और यूपी की सरकारों पर दबाव डाला गया तो उन्होंने इन सबको सही सलामत घर पहुंचाने के लिए बसों का इंतज़ाम किया। दिल्ली का आनंद विहार अंतरराज्यीय बस अड्डा हज़ारों लाखों की भीड़ों से ठसाठस भर गया है। जितनी बसें हैं, उससे ज़्यादा यात्री हैं। ऊपर से ये बस सेवाएं भी मुफ़्त नहीं हैं। इनका किराया 200 से 1000 रुपए के बीच हैं जो यात्रियों को खुद भरना पड़ रहा है। इतनी भीड़ में संक्रमित होने का ख़तरा बढ़ रहा है सो अलग।

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जो बस की सेवा नहीं ले पाए, उन्हें अपनी जान हाथ में लेकर एक राज्य से दूसरे राज्य पैदल जाना पड़ा। यही हुआ 39 साल के रणवीर सिंह के साथ। रणवीर दिल्ली में फ़ूड डिलीवरी का काम करते थे और लॉकडाउन के बाद दिल्ली से अपने घर मध्य प्रदेश तक पैदल जाने लगे। 200 किलोमीटर पैदल चलने के बाद उनकी छाती में दर्द होने लगा। वे गिर पड़े और वहीं उनकी मौत हो गई। कई सालों से उन्हें हार्ट की बीमारी थी जो थकान की वजह से बढ़ गई और उन्हें हार्ट अटैक आ गया। ऐसा ही हुआ एक 8 महीने प्रेगनेंट औरत के साथ। नोएडा से अपने घर जालौन तक जाने के लिए पेट में बच्चा लिए उसे पैदल चलना पड़ा। दो दिनों तक 400 में से 200 कि.मी. चलने के बाद उसकी मौत हो गई।

सोशल डिस्टेंस पालन करवाने के नामपर समाज के वंचित वर्ग पर अत्याचार किए जा रहे हैं, जहां अभिजात वर्ग के लोगों को खुली छूट है। इस वक़्त सोशल डिस्टेंसिंग की आवश्यकता है ज़रूर, पर क्या इसका ठेका सिर्फ़ एक ख़ास वर्ग ने ले रखा है?

62 साल के गंगाराम येलंगे गुजरात के सूरत में रहनेवाले थे। अपने बेटे नरेश के साथ अस्पताल से घर लौट रहे थे, जो आठ किलोमीटर दूर था। उनके पास अपना निजी वाहन नहीं था और लॉकडाउन की वजह से बस या रिक्शा, कुछ भी नहीं मिल रहा था। अपने बेटे के साथ वे पूरे आठ किलोमीटर पैदल चले और घर के ठीक सामने आकर गिर पड़े और चल बसे। नरेश को यही अफ़सोस रह गया कि, “अगर किसी ने हमारी मदद की होती, हमें लिफ़्ट दे दिया होता तो पापा बच जाते।”

मुसीबत और भी बढ़ जाती है जब प्रशासन इन्हें ज़रूरतमंद के बजाय गुनेहगार के तौर पर देखती है। जहां इन लोगों को सहायता की ज़रूरत है, वहां उन्हें लॉकडाउन अमान्य करने के लिए दोषी ठहराया जा रहा है और ज़ुल्म किए जा रहे हैं। गुजरात की पुलिस ने दिहाड़ी मज़दूरों पर आंसू गैस से हमला किया सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे घर जाने के लिए परिवहन की सुविधाएं मांग रहे थे। वहीं मुंबई-पुणे हाईवे पर एम्बुलेंस ड्राइवर नरेश शिंदे पर लाठियां बरसाई गईं क्योंकि उन पर गैरक़ानूनी तरीके से लोगों को महाराष्ट्र-गुजरात सीमा पार करवाने का आरोप था। हक़ीक़त ये थी कि नरेश एक घायल मरीज़ को अस्पताल ले जा रहे थे। 3000 रुपए का जुर्माना देने के बाद ही पुलिस ने उन्हें जाने दिया और अस्पताल पहुँचने से पहले ही मरीज़ की मौत हो गई।

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सबसे दर्दनाक हादसा हुआ 26 साल के रोशन लाल के साथ। गुरुग्राम में मज़दूरी का काम करते रोशन यूपी के लखीमपुर में अपने गांव आए हुए थे। क्योंकि वे बाहर से आए थे, स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें क्वारंटाइन में रखना ठीक समझा। गांव के स्कूल में उन्हें रहने दिया गया। कुछ दिन बाद उन्हें अनाज खरीदने के लिए बाहर निकलना पड़ा, जहां एक पुलिसवाले ने उन्हें देख लिया और उन्हें बेरहमी से मारा। ज़ुल्म की सारी हदें पार हो गईं और रोशन ने आत्महत्या करने का फ़ैसला किया। आत्महत्या करने से पहले उन्होंने व्हाट्सऐप पर अपने परिवार और दोस्तों को कुछ वॉइस नोट भेजे जिनमें उन्होंने बताया कि उन्हें इतना मारा गया कि उनका दाहिना हाथ टूट गया और अगर उनकी पैंट उतारकर देखा जाए तो वहां खून जमा हुआ मिलेगा। उन्होंने पुलिसवाले, जिनका नाम उन्होंने अनूप कुमार सिंह बताया, के लिए सज़ा की मांग की और ये भी कहा कि कोरोनावायरस की जांच में उनका नतीजा ‘नेगेटिव’ आया है।

सोशल डिस्टेंस पालन करवाने के नामपर समाज के वंचित वर्ग पर अत्याचार किए जा रहे हैं, जहां अभिजात वर्ग के लोगों को खुली छूट है। इस वक़्त सोशल डिस्टेंसिंग की आवश्यकता है ज़रूर, पर क्या इसका ठेका सिर्फ़ एक ख़ास वर्ग ने ले रखा है? क्या उन सेलेब्रिटीज़ पर ऐसी ज़्यादतियां हो रही हैं, जो विदेश से संक्रमित होकर आते हैं और अपनी जांच तक नहीं करवाते? जो पार्टियों में जाकर दूसरों को भी संक्रमित करते हैं? इस तरह की नाइंसाफ़ी क्यों उन पर हो रही जो मजबूरी में बाहर निकल रहे हैं, जब इन हालातों में भी पार्टियां और इवेंट रखनेवाले अमीरों को छूट मिल जाती है?

वर्ग वैषम्य हमारे समाज का एक क्रूर सच है। अफ़सोस की बात है कि ऐसी आपातकालीन स्थिति में जब हमें ज़रूरत है एकता और सौहार्द की, ये वैषम्य और भी बढ़ता जा रहा है। जातिवाद और वर्ग वैषम्य जैसी सामाजिक बीमारियां किसी वायरस से कम नहीं हैं, जिन्हें जड़ से उखाड़े बिना और हर पीड़ित व्यक्ति को उसके अधिकार और एक सम्मान की ज़िंदगी दिलवाए बिना हम तरक्की नहीं कर पाएंगे।

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तस्वीर साभार : economictimes

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