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दुनियाभर में कोरोना वायरस की वजह से लोग एक बहुत बुरे हालातों से गुजर रहे हैं। हर देश अपनी क्षमता और रणनीतियों के तहत अलग-अलग तरीके से अपने देश को इस वायरस से बचाने की कोशिश कर रहे है । भारत में इस वायरस को देखते हुए पूरे देश में लॉकडाउन अब तीन मई तक के लिए बढ़ा दिया गया। समय और हालात को देखते हुए लॉकडाउन का फैसला लेने के अलावा ओर कोई चारा भी नहीं था । कोरोना वायरस ने विकसित कहे जाने वाले देशों की जड़ो को भी हिला कर रख दिया ।

ऐसे समय में एक पुराने वायरस ने भी अपनी गति को और तेज कर लिया। कोरोना वायरस को रोकने के लिये तो लॉकडाउन जैसे कदम उठाए गए है । लेकिन इस पुराने वायरस को रोकने के लिए लॉकडाउन की कोई व्यवस्था नहीं की गई । जैसे-जैसे कोरोना की वजह से लॉकडाउन के नियम मजबूत होते गए, ये पुराना वायरस भी उतना ही सक्रिय रूप से विकराल रूप लेता गया । इस पुराने वायरस का नाम है हिंसा । हिंसा जिसको हथियार बनाकर सदियों से दूसरों के अधिकारों का हनन होता आ रहा है। लॉकडाउन की स्थिति में हिंसा रूपक वायरस इतना सक्रिय हो गया कि इसकी आग में महिलाएँ, बच्चे, प्रवासी मजदूर और मुस्लिम समुदाय झुलस रहे हैं। कोरोना वायरस के इलाज खोजने के लिए पूरे विश्व के डॉक्टर और वैज्ञानिक लगातार कोशिश कर रहे है । लेकिन विडंबना की बात तो यह है कि हिंसा रूपक वायरस को खत्म करने के लिए  कोई जरूरी कदम नही उठाए गए।

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चाइल्ड लाइन के अनुसार 20 मार्च से 31 मार्च के दौरान हेल्पलाइन 1098 पर  3.7 लाख कॉल्स आए, जिनमें से 90 हज़ार कॉल्स बच्चों के उत्पीड़न और हिंसा से जुड़े है। एक समाज के लिए यह एक चिन्ता का विषय है कि भारी संख्या में बच्चें असुरक्षित माहौल में उत्पीड़न करने वाले के साथ रह रहे है। यही वजह है कि इंडिया चाइल्ड लाइन की उपनिदेशक हरलीन वालिया ने जिले स्तर के अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इस चिंतनीय विषय पर ध्यान देने का आग्रह किया। लेकिन यह सिर्फ चाइल्ड लाइन की ही जिम्मेदारी नहीं है बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करें।

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लॉकडाउन में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतनीय विषय सामने आया है, इसी तरह महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा में भी इजाफा इस दौरान नजर आया है।

जिस तरह लॉकडाउन में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतनीय विषय सामने आया है, इसी तरह महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा में भी इजाफा इस दौरान नजर आया है। राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार महिलाओं के प्रति हिंसा में इस दौरान 40 फ़ीसद से 50 फ़ीसद तक कि वृद्धि हुई है। पुरुषों ने पितृसत्ता से सीखी गई मर्दानगी की नुमाइश खुलेतौर पर लॉकडाउन में की जा रही है। ऐसा नहीं है कि पहले ये नुमाइश नहीं होती थी लेकिन लॉकडाउन के दौरान महिलाओं को बाहर से सहयोग ना मिलने की वजह से स्थिति और ज्यादा गम्भीर हो गई है ।

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इसी संदर्भ में प्रवासी भारतीयों और मुस्लिम समुदाय के लोगो के साथ भी हिंसा लगातार बढ़ रही है । प्रवासी मजदूर काम ना होने की वजह से अपने घर लौटना चाहते है। लेकिन ज्यादातर लोगो को ऐसा लगता हैं मानो ये लोग घर नहीं जा रहे बल्कि वायरस फैलाने जा रहे है, जिसके चलते उनके साथ हिंसा खुलेतौर पर हो रही है। एक तरफ वो लोग भूख से मर रहे है दूसरी तरफ उनको अन्य लोगो को प्रताड़ित भी किया जा रहा हैं।  ऐसे ही आजकल मुस्लिम समुदाय को लेकर अलग-अलग तरीके से नफरत फैलाई जा रही है ।

ऐसे में हमें सोचना होगा कि क्यों मुश्किल की घड़ी में पुरुष सिर्फ हिंसा को ही हथियार बना लेता है। बातचीत और समझदारी का इस्तेमाल करके मुश्किल समय का हल निकालने की कोशिश क्यों नही करता । कोरोना वायरस से भी बड़ा वायरस हिंसा है। इस हिंसा और नफ़रतों के दौर को रोकने की सख्त जरूरत है। इसमें प्रत्येक नागरिक की अहम भूमिका है । बाक़ी ये दुनिया तभी सुंदर बन सकती है जब इसमें हिंसा और नफरतों का सम्पूर्ण लॉकडाउन हो।


तस्वीर साभार : vox

Roki is a feminist, trainer and blogger. His focus areas have been gender equality, masculinity, POSH Act and caste.

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