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इस समय जब मैं यह लेख लिख रहा हूं। सारी दुनिया एक ‘कोरोना वायरस’ की महामारी से लड़ रही है। सारे स्कूल, कॉलेज, मॉल, सिनेमाघर सब के सब बंद हो चुके है। केवल अस्पताल, सब्जी मंडिया और किराना दुकानें खुले है। वर्क फ्रॉम हॉम यानी कि घर से काम करने की हिदायत दी गई है। करोड़ों की आबादी वाला देश इटली लॉकडाउन हो चुका है। सभी अपने-अपने घरों में बंद हैं। भारत में भी लोगों से कहा गया है कि सभी घर में रहे। ये सब देखकर ऐसा लग रहा है जैसे होली के बाद गर्मी की छुट्टियां आ गई हो।

लेकिन, यह कोई छुट्टी नहीं है। हम सभी जानते है, बल्कि ये एक विकट घड़ी है और ये लॉकडाउन हमारी सुरक्षा के लिए उठाया गया कदम है। पर लोगों ने इसे छुट्टी समझ लिया है। सोशल मीडिया पर कॉलेजों के स्टूडेंट्स के वायरल वीडियो चल रहे हैं। जिसमें ‘जय कोरोना’ के नारे लग रहे हैं। कोरोना के कारण मिली छुट्टी से काफी खुश दिखते हैं, बच्चे। हर तरफ यही हाल है। मेरे कॉलेज में भी छुट्टी का नोटिस लगा और बच्चे खुशी से नाच उठे। मुझे समझ नहीं आ रहा यह खुशी किस बात को लेकर है? देश संकट में है। पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और विकास रुक गया है। लोग मर रहे हैं और इनकी सुरक्षा के लिए इन्हें छुट्टी दी गई है। ताकि आज चलो बर्बाद हो रहा है। कम से कम भविष्य को बचाया जा सके। ये विडंबना है की भारत दुनिया का सबसे ज़्यादा युवा नागरिकों वालों देश है जहां के युवा ही इस संकट खुशी मना रहे हैं। उन्हें पता ही नहीं उनके कारण कितने दिहाड़ी लोगों का घर चलता है। ठेलों वालों की जिंदगी जो उनके कॉलेजों के बाहर रहती है। उनका इन्हें ख्याल ही नहीं है।

एक वाकया कल मैंने और देखा ‘जब दिल्ली की एक औरत ने नॉर्थ-ईस्ट की के छात्रा को कोरोना वायरस से ग्रसित बताकर हो हल्ला मचा दिया। इस कोरोना वायरस ने हमारे दिमाग के नस्लभेदी वायरस को भी दिखा दिया है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे चाइना वायरस कहा। इस तरह नस्लभेद का विचार भी काफी उभर आया है।

पूंजीवाद के कारण इस महामारी के समय अर्थव्यवस्था गिरने के हाल पर आ गई है। तब हमें यह महामारी साम्यवाद की विचारधारा की ओर वापस ले जाती है। जहां किसी सरकार या किसी व्यक्ति विशेष के पास आर्थिक ताकत न हो।

सभी को अपने जान की चिंता है। लेकिन, दूसरों पर क्या बीती यह कोई नहीं समझता। कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को अछूत की गंदी निगाह से देखा जा रहा है। मुझे लगता है हमारे भारत की शिक्षा व्यवस्था बच्चों में ‘करुणा’ और ‘संवेदनशीलता’ नहीं सीखाती। और यही एक करुणाविहिन और असंवेदनशील समाज की ओर बढ़ता हमारा पहला कदम है, जो आगे चलकर समाज की संवेदना को खत्म कर ही दम लेगा।

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पहले भी इसी असंवेदनशील समाज ने पूंजीवाद की नींव रखी। अपना-अपना व्यापार करने का भाव लाया और पूजीं का केंद्रीकरण हो गया। आज इसी पूंजीवाद के कारण इस महामारी के समय अर्थव्यवस्था गिरने के हाल पर आ गई है। तब हमें यह महामारी साम्यवाद की विचारधारा की ओर वापस ले जाती है। जहां किसी सरकार या किसी व्यक्ति विशेष के पास आर्थिक ताकत न हो। समाज के हर एक व्यक्ति के पास उसकी योग्यता और आवश्यकता के अनुसार संसाधनों का विभाजन करती है। इस समय स्थिति यह है कि पूरा विश्व पूंजीवादी व्यवस्था पर टिकी है। और जब इस महामारी के कारण अर्थव्यवस्था गिर रही है तो सबसे बड़ा झटका उस आम मजदूर और किसान का हो रहा है, जिसका शोषण करके उनका हक मारकर पूंजीवादियों ने धन इकट्ठा किया था। अगर, उस समय मजदूरों और किसानों को बराबरी के हिसाब से धन मिलता। पूंजी का केंद्रीकरण नहीं होता तो शायद हमें आज ऐसी स्थिति न देखनी पड़ी। जहां इंडिगो एयरलाइंस खुद को बचाने के लिए अपने ईम्पलॉईज की 10 फ़ीसद तनख्वाह काट दी जाती है। रिलायंस, विपरो, बिरला के पैसों का नुक़सान एक गरीब आदमी चुकाता है।

साम्यवाद मार्क्स, लेनिन आदि साम्यवादी विचारकों से बना है, जिसने समाज की ऐसी कल्पना दी, जिसमें राज्य के पास धन न होकर समाज के लोगों के पास धन हो। उनकी योग्यता और उनकी आवश्यकता के अनुसार संसाधनों का बंटवारा करें। सरल शब्दों में कहे तो अगर, धन एक जगह हो तो उसे लुटा जाना आसान है। वहीं अगर, धन अलग-अलग जगह हो तो कठिनाई होगी।

इस महामारी ने हमें सीखाया हैं कि हमें एक साम्यवादी यानी समाजवादी समाज के हित वाली अर्थव्यवस्था चाहिए। ताकि, जब भी अगर ऐसी कोई समस्या आए तो कम से कम नुकसान हो और समाज के सबसे नीचे तबके के व्यक्ति का कोई नुकसान न हो। अगर, हम संवेदनशील है। अगर, हम दूसरों के लिए करुणा है। तो शायद हमें अब साम्यवाद की ओर पहला कदम बढ़ाना होगा।

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तस्वीर साभार : naidunia

एक करुणा से भरा लेखक,जो इस समाज के लिए लिखता है।
पढ़ना जुनून हैं,केवल किताबें ही नहीं, लोगों को भी।

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