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आज पूरी दुनिया कोरोनावायरस से लड़ने को उठ खड़ा हुआ है। डॉक्टर तो अपना काम कर ही रहे हैं, लेकिन कई चीज़ें हैं जो हम भी अपनी तरफ़ से कर रहे हैं। जैसे सोशल डिस्टेंसिंग, ख़ुद को साफ़-सुथरा रखना और घर से निकलते समय मास्क पहनना। अब इसी मास्क की वजह से चीन के नज़दीक ताईवान में एक छोटे लड़के को बेहद बुरा व्यवहार सहना पड़ा। ये लड़का एक गुलाबी रंग का मास्क पहनकर स्कूल गया था, जो बात उसके सहपाठियों को हास्यास्पद लगी। उन्होंने उसे ‘लड़की’ कहकर उसका मज़ाक उड़ाया क्योंकि उनके मुताबिक़ गुलाबी रंग सिर्फ़ लड़कियों के लिए है और किसी लड़के को अगर ये रंग पसंद हो या वो इस रंग के कपड़े पहने, तो वो भी किसी लड़की से कम नहीं।

ये ख़बर जल्द ही सोशल मीडिया पर फैल गई और ताईवान के स्वास्थ्य मंत्री चेन शी चुंग तक पहुंच गई। उन्होंने स्वास्थ्य मंत्रालय के ऑफिशियल फ़ेसबुक पेज पर एक पोस्ट डाला। पोस्ट में उन्होंने कहा कि गुलाबी मास्क सिर्फ़ लड़कियां पहन सकती हैं, ऐसा नहीं है। हर कोई किसी भी रंग का मास्क पहन सकता है क्योंकि वे हमारी सुरक्षा के लिए बने हैं। पोस्ट में संलग्न एक फ़ोटो भी है जिसमें स्वास्थ्य मंत्री और चार स्वास्थ्य कर्मी गुलाबी मास्क पहनकर खड़े हैं। तस्वीर एक प्रेस कॉनफेरेन्स से है।

तस्वीर साभार – फ़ेसबुक

एक सरकारी प्रतिनिधि की तरफ़ से लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ इस तरह की कड़ी चेतावनी एक बहुत प्रशंसनीय कदम है। पितृसत्ता और लिंगवाद इस हद तक हमारी नस-नस में भरे हुए हैं कि हम रंगों को भी लिंग के आधार पर बांट देते हैं। गुलाबी ‘लड़कियों का’ रंग है और नीला ‘लड़कों का।’ ठीक वैसे ही जैसे कपड़ों, खिलौनों, यहां तक कि भावनाओं को भी बांट दिया जाता है ये सिद्ध करने के लिए कि लड़के और लड़कियां बराबर नहीं हैं और किसी एक के लिए निर्धारित चीज़ें दूसरे को पसंद नहीं आ सकतीं, या दूसरा करने में अक्षम है। ‘लड़के रोते नहीं हैं’, ‘खाना बनाना लड़कियों का काम है’, ‘लड़कियां गणित और साइंस में लड़कों जितना अच्छा नहीं कर सकतीं’ ऐसे कुछ उदाहरण हैं।

ये भेद बचपन से ही थोड़ा थोड़ा करके हमारे मस्तिष्क में भर दिया जाता है। मुझे याद है जब मैं बहुत छोटी थी, हमारे स्कूल का यूनिफ़ॉर्म लड़कों और लड़कियों के लिए अलग हुआ करता था। लड़कों के लिए शर्ट थी जिस पर मोटरसाइकल की तस्वीर बनी होती थी और हम लड़कियों के लिए चिड़िया की तस्वीर वाली फ़्रॉक। छोटी उम्र में ही ये बाक़ायदा समझा दिया गया था कि मोटरसाइकल लड़कियों की दिलचस्पी वाली चीज़ नहीं है।

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बड़ी होते होते ये फ़र्क़ गहराता ही गया। एक बार किसी सुपरहीरो की तस्वीर वाले जूते खरीदने गई तो बताया गया कि वे लड़कों के लिए हैं। मेरे लिए जो जूते थे वे ज़्यादातर गुलाबी, सफ़ेद, या लाल रंग में, फूलों-तितलियों वाली डिज़ाइन वाले थे। एक बार एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में गई तो देखा कि लड़के केक खाने से सिर्फ़ इसलिए मना कर रहे हैं क्योंकि वो गुलाबी था और परी की तस्वीर वाला था। यानी ‘लड़कियों का’ केक था।

ताईवान के स्वास्थ्य मंत्री की ये चेतावनी हर उस बच्चे के लिए एक आश्वासन है, जो अपने लिंग के लिए निर्धारित पैमानों पर नहीं बैठता।

धीरे-धीरे मन में ये बात अच्छे से बैठ गई कि लड़कों और लड़कियों की हर बात अलग होनी चाहिए। वे क्या पहनते हों, टीवी पर क्या देखते हों, और उन्हें कौनसा रंग पसंद हों, सब कुछ। और लड़कियां भले ही ‘लड़कों वाली’ चीज़ें करें, चाहे लड़कों जैसे कपड़े पहनें या स्पोर्ट्स में हिस्सा लें, अगर कोई लड़का लड़कियों के लिए निर्धारित चीज़ों में रुचि ले तो वो मज़ाक का पात्र बन जाता है। गुलाबी रंग पसंद करने वाले, गुड़ियों और मेकअप से खेलनेवाले हर लड़के को ‘अबे, लड़की है क्या?’ कहकर चिढ़ाया जाता है। उस पर हंसा जाता है। जैसे ‘लड़की’ कोई गाली हो। जैसे लड़कियों से संबंधित हर चीज़ बुरी हो और लड़के लड़कियों से ऊंचे वर्ग के हों।

ये सिर्फ़ मेरी ही आपबीती नहीं है। दुनियाभर में बच्चे के लिंग से तय किया जाता है कि उसे गुलाबी रंग के कपड़े पहनाए जाएं या नीले। गुलाबी रंग पसंद करनेवाले, गहनों में दिलचस्पी रखनेवाले मर्दों की मर्दानगी पर सवाल उठाया जाता है और अक्सर उन्हें समलैंगिक या ‘हिजड़ा’ भी करार दिया जाता है। पहनावे, रुचि या व्यवहार में ज़रा सा भी ‘महिलाओं की तरह’ होने से एक मर्द क्रूर सामाजिक लांछन और तिरस्कार का पात्र बन जाता है, जैसे ताईवान के उस छोटे बच्चे को बनना पड़ा सिर्फ़ इसलिए कि उसने एक ख़ास रंग का मास्क पहना था।

समाज के तौर पर हमें अग्रसर होना है तो सबसे पहले ये स्वीकार करने की ज़रूरत है कि सभी इंसान बराबर हैं। कोई किसी से अलग नहीं है और ज़बरदस्ती एक वर्ग को किसी भी आधार पर बाकियों से अलग मानना, और उनके लिए अलग पोशाक, अलग काम, अलग रुचियां निर्धारित कर देना सामाजिक भेदभाव से कम नहीं है, किसी सभ्य समाज में जिसके लिए जगह नहीं हो सकती। ये बात भी समझना ज़रूरी है कि लड़कों और लड़कियों की चीज़ें अलग सिर्फ़ इसलिए हैं क्योंकि हम उन्हें ऐसा बनाते हैं। नहीं तो एक ज़माना ऐसा भी था जब गुलाबी को एक मर्दाना रंग माना जाता था और नीले को लड़कियों का रंग। इसका विपरीत होना तो बीती सदी के आखिरी भाग में ही शुरू हुआ है। एक ज़माना ऐसा था जब मर्द ऊंची हील वाली चप्पलें पहना करते थे, इससे पहले कि इस तरह का फैशन ‘औरतों के लिए’ बन गया। कई संस्कृतियों में मर्द स्कर्ट भी पहनते हैं, जो हमारे लिए महिलाओं की पोशाक है। तो अगर आपके बेटे को गुलाबी रंग पसंद है, अगर वो मेकअप, गुड़ियों, और लड़कियों के कपड़ों में रुचि रखता है तो इसमें कोई शर्म की बात नहीं है। न ही ये ज़रूरी है कि इससे उसके जेंडर या उसकी यौनिकता का कोई संबंध है।

ताईवान के स्वास्थ्य मंत्री का ये कदम हर उस बच्चे के लिए एक आश्वासन है, जो अपने लिंग के लिए निर्धारित पैमानों पर नहीं बैठता। जिसे लगता है विपरीत लिंग वाली चीज़ों को पसंद करने की वजह से उसके अंदर कोई कमी है। हमें इस तरह के सरकारी कर्मियों की बेहद ज़रूरत है जो लैंगिक भेदभाव के ख़िलाफ़ एक कठोर पक्ष अपनाएं और समाज में बराबरी लाने के लिए अपनी तरफ़ से कोशिश करें।


तस्वीर साभार : ट्विटर 

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