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पर्यावरण के संरक्षण में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। हमारे आसपास कई ऐसे उदाहरण मौजूद है जिससे पता चलता है कि भारत में पर्यावरण संरक्षण को महिलाओं ने ही पीढ़ी दर पीढ़ी बखूबी आगे बढ़ाया हैं और इस मुद्दे को आंदोलन का रुप दिया है। हमारे आसपास ही अनेकों उदाहरण हैं, जहां हम यह देख सकते हैं कि महिलाएं प्रकृति के संरक्षण में महती भूमिका अदा करती हैं। जैसे- वंदना शिवा, सुनीता नारायण और तुलसी गोडा आदि। इन सभी महिलाओं ने पर्यावरण के संरक्षण में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है और समाज को भी प्रेरणा प्रदान किया है कि वह भी पर्यावरण के संरक्षण में आगे आएं। प्राचीन समय से महिलाएं पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम कर रही हैं।

आज भी महिलाएं अपने घरों में अगर छोटी सी खेती करती हैं, वह भी उनके पर्यावरण संरक्षण का ही तरीका है। इसमें वे एक छोटे से प्रयास से प्रकृति को सजाती है और पर्यावरण का संरक्षण करती है। आप अपने घरों का ही उदाहरण ले लीजिए जहां महिलाएं शौक के लिए ही अपने गार्डन को सजाती हैं। वहीं कुछ महिलाएं इसे मुहिम बना लेती हैं और पर्यावरण के संरक्षण में अपना जीवन लगा देती हैं। कार्ल माक्स का कथन भी है ‘कोई भी बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के बिना नहीं हो सकता है।‘ पर्यावरण प्रबंधन और सतत् विकास में महिलाओं का योगदान बेहद ज़रूरी है।

हमेशा से महिलाएं पर्यावरण की पक्षधर रही हैं। हर घर में तुलसी, केले का पौधा होना और पीपल के पेड़ का होना ये सभी महिलाओं के पर्यावरण से जुड़ाव को ही दर्शाता है। पर्यावरण संरक्षण में महिलाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही हैं, जहां भी पर्यावरण को हानि पहुंचाने का काम हुआ है, महिलाओं ने उसका पुरज़ोर विरोध किया है। भारतीय इतिहास में ऐसे कई पर्यावरण संरक्षण आंदोलन हुए हैं, जिनमें महिलाओं का पूरा योगदान रहा है। जैसे- राजस्थान का खेजड़ली आंदोलन पर्यावरण चेतना का अतुलनीय उदाहरण माना जाता है।

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साल 1730 में जोधपुर के महाराजा को अपना महल बनाने के लिए जब लकड़ी की ज़रूरत हुई तो उस वक्त राजा के सिपाही कुल्हाड़ी लेकर खेजड़ली गांव में पहुंच गए, जहां खेजड़ी के पेड़ों से पूरा गांव पटा हुआ था, मगर गांव की महिला अमृता देवी ने सिपाहियों का विरोध करना शुरु किया ताकि वे पेड़ों को ना काटें। इसके साथ ही अमृता पेड़ों को काटने से बचाने के लिए अपनी तीन बेटियों सहित पेड़ से लिपट गईं और उन्होंने पेड़ को बचाने के लिए अपनी जान को कुर्बान कर दिया। अमृता के इस कदम से प्रेरणा पाकर अन्य लोगों ने भी वृक्ष संरक्षण के लिए अपने प्राणों को त्याग दिया।

इसके साथ ही आप चिपको आंदोलन से भी भली-भांति परिचित होंगे। उत्तराखंड का यह आंदोलन भी खेजड़ली आंदोलन जैसा ही था। इसमें महिलाओं के नेतृत्व में पेड़ों के संरक्षण को लेकर स्थानीय लोगों ने अपनी आवाज़ उठाई थी। इसमें चमोली गांव की महिलाओं ने गौरा देवी के नेतृत्व में पेड़ काटने आए लोगों को यह कहकर भगा दिया था कि ‘जंगल हमारा मायका है।’
वंदना शिवा अपनी किताब ‘स्टेइंग अलाइव: वीमेन इकोलॉजी एंड सर्वाइवल इन इंडिया’ में चिपको आंदोलन के इस पहलू पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने अपनी किताब में उन तमाम महिलाओं का जिक्र किया है, जिन्होंने इसे आंदोलन बनाया था।

भारत में पर्यावरण संरक्षण को महिलाओं ने ही पीढ़ी दर पीढ़ी बखूबी आगे बढ़ाया हैं और इस मुद्दे को आंदोलन का रुप दिया है।

महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करते हुए वंदना लिखती हैं, ‘जिन महिलाओं ने चिपको को एक बड़े आंदोलन में बदलने के लिए उत्प्रेरक की भूमिका निभाई उनका नाम मीरा बेन, सरला बेन, बिमला बेन, हिमा देवी, गौरा देवी, गंगा देवी, बचना देवी, इतवारी देवी, छमुन देवी और कई अन्य महिलाओं के नाम शामिल हैं।’ वंदना बताती हैं कि ‘सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, घनश्याम ‘शैलानी’ और धूम सिंह नेगी और अन्य आंदोलन से जुड़े पुरुष इन्हीं महिलाओं के छात्र और अनुयायी रहे हैं।’

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महिलाओं के वन संरक्षण की यह अनूठी पहल ने देशभर में जागरुकता की लहर को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। इसके साथ ही अंतराष्ट्रीय स्तर पर ‘इको फ़ेमिनिज्म’ या ‘नारिवादी पर्यावरणवाद’ को पहचान दिलाया है। महिलाओं ने जल संरक्षण को लेकर भी मिसाल कायम किया है। आमतौर पर ग्रामीण महिलाओं को ही घर के सदस्यों के लिए पानी लाने की ज़रुरत पड़ती है और उन्हें घंटों मीलों का सफर तय करना पड़ता है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवा मेधा पाटकर रही हैं। इसमें भी महिलाओं ने अपना योगदान दिया है ताकि पर्यावरण को बचाया जा सके। उनका कहना है, नर्मदा हमारी जीवन रेखा..नहीं होगी मरण रेखा। इस तरह हमारे पास अनेकों उदाहरण हैं, जहां महिलाओं ने पर्यावरण को बचाने में अपनी भूमिका निभाई है। महिलाएं हमेशा से पर्यावरण संरक्षण में आगे रहती हैं मगर केवल उसका तरीका भिन्न होता है। आज भी महिलाएं अपने-अपने स्तर से पर्यावरण के हित में काम कर रही हैं क्योंकि महिलाओं का प्रकृति से जुड़ाव अनमोल होता है।


तस्वीर साभार : thebetterindia

सौम्या ज्योत्स्ना बिहार से हैं तथा मीडिया और लेखन में कई सालों से सक्रिय हैं। नारीवादी मुद्दों पर अपनी आवाज़ बुलंद करना ये अपनी जिम्मेदारी समझती हैं क्योंकि स्याही की ताकत सबसे बुलंद होती है।

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