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कई लोगों का ये मानना है कि भारत में जातिवाद ख़त्म हो गया है। यहां अब लोगों पर जाति के आधार पर अत्याचार नहीं होता और समाज के हर क्षेत्र में बराबरी आ चुकी है। कुछ लोग तो ये भी दावा करते हैं कि आरक्षण जैसे सरकारी फ़ैसलों की वजह से तथाकथित ‘दलित’ ऊंची जाति के लोगों से आगे बढ़ गए हैं। मगर सच्चाई इसके बिलकुल विपरीत है। सामाजिक तौर पर बराबरी आने में अभी भी बहुत देर है और सवर्ण समाज आए दिन दलितों, बहुजनों, आदिवासियों पर कभी उनके संसाधन हड़पने के लिए या कभी उन पर अपना वर्चस्व सिद्ध करने के लिए ज़ुल्म करता है। एक ऐसी ही घटना है जिसके बारे में सुनकर आज भी रूह कांप जाती है- खैरलांजी हत्याकांड

सुरेखा भोतमांगे महाराष्ट्र के भंडारा ज़िले के खैरलांजी गांव में रहती थीं। उनका परिवार ‘महार’ जाति का था, जिसे तथाकथित ‘छोटी’ जाति माना जाता है। अपनी जैसी और दलित महिलाओं की तुलना में उनके हालात काफ़ी बेहतर थे। वे शिक्षित थीं और अपने पैसों से अपना घर चलाती थीं। अपनी मेहनत से अपनी छोटी सी झोपड़ी को पक्के मकान का रूप भी दिया था। 45 साल की सुरेखा के परिवार में थे उनके पति, 51 साल के भैयालाल, उनके दो बेटे, 21 साल का सुधीर और 19 साल का रोशन, और उनकी बेटी, 17 साल की प्रियंका। उनके छोटे बेटे रोशन की एक आंख नहीं थी।

खैरलांजी गांव के ‘ओबीसी’ वर्ग के कुनबी मराठाओं से ये बर्दाश्त नहीं होता था कि दलित होने के बावजूद सुरेखा काफ़ी संभ्रांत थी। उनके पास उनकी अपनी खेती थी और उनके बच्चे भी पढ़ाई-लिखाई कर रहे थे। यहां तक कि उनकी बेटी प्रियंका 12वीं की टॉपर भी थी। वे पूरी कोशिश करते थे उन्हें दबाए रखने की। उन्हें अपने घर में बिजली का कनेक्शन लगवाने से और कुएं से पानी लाने से रोकने की कोशिश करते। सुरेखा निडर थीं और उनकी लाख कोशिशों के बावजूद अपने परिवार पर उनका असर नहीं होने दिया। मुसीबत तब हुई जब कुनबियों ने सुरेखा के खेतों पर सड़क बनाने का फ़ैसला किया।

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सुरेखा ने इसका विरोध किया तो उन्होंने खेतों पर बैलगाड़ियां चलवा दीं। बैल उनकी आधी से ज़्यादा फसल खा गए और खेतों को तहस नहस कर दिया। उसी दिन सुरेखा ने थाने में शिकायत दर्ज कर दी। इसके कुछ दिनों बाद, 3 सितंबर 2006 को गांव में सिद्धार्थ गजभिये पर शारीरिक हमला हुआ। सिद्धार्थ गजभिये स्थानीय पुलिस हवलदार थे और भोतमांगे परिवार के रिश्तेदार भी। कई बार कुनबियों से सुरेखा की लड़ाई में वे सुरेखा के साथ खड़े हुए थे और ‘एससी/एसटी’ कानून के तहत कुनबियों को गिरफ़्तार करवाने की धमकी भी दी थी। सुरेखा और उनके परिवार को डराने के लिए दिनदहाड़े उन्हें बेरहमी से पीटा गया और सही वक़्त पर मदद न मिलने पर वे मर भी गए होते। एक बार फिर थाने में शिकायत दर्ज हुई और इस बार कुछ लोग गिरफ़्तार हुए। पर गिरफ़्तारी के कुछ ही समय बाद उनकी ज़मानत भी हो गई।

इस जातिवादी हिंसा ने एक पूरे परिवार को खत्म कर दिया और चंद अपराधियों की सज़ा होने के अलावा घटना में शामिल ज़्यादातर लोग और राजनेता आज़ाद है।

29 सितंबर 2006 को शाम के 6 बजे, ट्रैक्टर में आए लगभग 70 कुनबियों ने सुरेखा के घर को घेर लिया। इनमें कई सारी महिलाएं भी शामिल थीं। उस वक़्त घर पर सिर्फ़ सुरेखा और उनके बच्चे थे। पति भैयालाल खेतों में काम कर रहे थे। सुरेखा और प्रियंका को सरेआम नंगा करके एक बैलगाड़ी से बांधा गया और पूरे गांव में घुमाया गया। सुधीर और रोशन को भी नंगा करके पीटने के बाद उन्हें अपनी मां और बहन का बलात्कार करने को कहा गया। जब वो नहीं माने, उनके यौनांग काट दिए गए और पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी गई। सुरेखा और प्रियंका का सामूहिक बलात्कार करने के बाद उन्हें मार दिया गया और उन सबकी लाशें पास की सूखी नदी में फेंक दी गईं।

भैयालाल सिर्फ़ इसलिए बच पाए क्योंकि उस वक़्त वे घर पर नहीं थे। चीखें सुनते ही वे भागते हुए आए और एक झाड़ी के पीछे छुपकर उन्होंने सब कुछ देखा। उनका कहना है कि लाशों का हाल इतना बुरा था कि उन्हें पहचानना ही मुश्किल हो रहा था। सुरेखा की एक आंख चली गई थी और खोपड़ी इतनी टूट गई थी कि उनका दिमाग़ बाहर निकल आया था। भैयालाल ये भी कहते हैं कि उन्हें मारते वक़्त हत्यारे जातिवादी गालियां दे रहे थे और कह रहे थे कि वे ‘सिर पे चढ़ गए हैं’ और उन्हें सबक सिखाने की ज़रूरत है।

मीडिया ने जब खैरलांजी की इस घटना को कवर किया तो उसने जाति का कोई ज़िक्र ही नहीं किया। मीडिया के मुताबिक ये हत्या जाति की वजह से नहीं बल्कि ‘नैतिक कारणों’ से हुई थी। अखबारों का कहना था कि सुरेखा का सिद्धार्थ गजभिये के साथ अफेयर चल रहा था, जो गांववासियों को मंज़ूर नहीं था और जिसकी वजह से वे उन दोनों को मार देना चाहते थे। मुद्दा जातिवादी हिंसा से पीड़ित महिला के चरित्र पर आ गया। अदालत ने भी एससी एसटी कानून लागू नहीं किया इस धारणा के आधार पर कि खैरलांजी गांव में हुई ये हत्याएं जातिगत हिंसा नहीं, व्यक्तिगत समस्याओं का था।

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पूरे महाराष्ट्र से दलित समाज के लोग सड़कों पर उतर आए और अपराधियों की कड़ी से कड़ी सज़ा की मांग की। इसी विरोध प्रर्दशन के चलते ज़िला न्यायालय में केस हो पाया था। जितने लोग शामिल थे उनमें से सिर्फ़ आठ लोग गिरफ़्तार हुए, जिनमें से अदालत ने छह लोगों को मौत और दो को उम्रकैद की सज़ा वसुनाई। केस जब बंबई उच्च न्यायालय के नागपुर विभाग के सामने पेश किया गया तो उन्होंने सज़ा कम कर दी। मौत की सज़ा की जगह 25 साल के कारावास की सज़ा सुना दी। केस अभी सुप्रीम कोर्ट में है और इसकी सुनवाई 2015 में होनी थी, पर नहीं हुई। 2017 के जनवरी में भैयालाल भोतमांगे 62 की उम्र में हार्ट अटैक से चल बसे। वे अपनी मृत पत्नी और बच्चों को इंसाफ़ नहीं दिला पाए।

कहा जाता है कि ‘इंसाफ़ देर से मिलना और न मिलना एक ही बात है’ और इस क्षेत्र में भी वही हुआ। जातिवादी हिंसा ने एक पूरे परिवार को खत्म कर दिया और चंद अपराधियों की सज़ा होने के अलावा घटना में शामिल ज़्यादातर लोग अभी भी खुले घूम रहे हैं, जिनमें राजनेता भी शामिल हैं। जातिवाद सुरेखा भोतमांगे के परिवार की तरह न जाने कितने हंसते-खेलते परिवारों को खा गया होगा। इन सबका हिसाब इस समाज को एक दिन चुकाना पड़ेगा।


तस्वीर साभार : facebook

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1 COMMENT

  1. जातिवाद भारत में हजारों सालों से चला आ रहा है आजादी के बाद होना तो यह चाहिए था इसकी पूर्ण रूप से समाप्त कर देनी चाहिए देश समाज महिलाएं तभी सुरक्षित रहेंगे जब सब कोई बराबरी का होगा स्तरीकरण तो नहीं रोका जा सकता है लेकिन विभेदीकरण को जो मानव के हाथ में उसको समाप्त किया जा सकता है लेकिन पता नहीं क्यों ना सरकार ने कभी ऐसा किया ना समाज में ऐसा स्वीकार किया बहुत ही दुखद घटना थी जिसमें मानवता को छिन्न-भिन्न कर दिया

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