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24 जून को यूजीसी ने घोषणा की है कि देश भर के उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों में अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए कोई परीक्षा नहीं होगी। यूजीसी ने फैसला किया है कि जुलाई में होने वाली वार्षिक परीक्षा के बजाय अब छात्रों को उनके इंटरनल और पूर्व सेमेस्टर प्रदर्शन के आधार पर परिणाम जारी किए जाएंगे। दरअसल पिछले कई महीनों से देशभर में लोग सरकार के ऑनलाइन क्लासिस और एग्जाम कराने के आदेश का विरोध कर रहे हैं। वो सरकार पर शिक्षा का निजीकरण, भेदभाव और सामाजिक बेदखल करने का आरोप लगा रहे हैं।   

देशभर में कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए केंद्र सरकार ने प्राइमरी और उच्च शिक्षा के संस्थानों को ऑनलाइन कक्षाएं लगाने का आदेश दिया था। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री आरपी निशंक ने यह भी कहा था कि ‘जो छात्र ग्रामीण इलाकों में रहते हैं और जिनके लिए ऑनलाइन कक्षाएं लेना मुश्किल है उन्हें टीवी के ज़रिए 32 चैनलों के माध्यम से पाठ मुहैया कराए जाऐंगे। लेकिन सरकार की यह मुहिम फेल होते नजर आ रही है।

इसी साल 22 जून को असम के चिरांग ज़िले के रहने वाले 16 साल के एक छात्र ने इसलिए खुदकुशी करली क्योंकि उसके पास ऑनलाइन क्लास और एग्जाम में हिस्सा लेने के लिए स्मार्ट फ़ोन नहीं था। इससे पहले 18 जून को केरल के मलप्पुरम जिले में 10वीं क्लास की छात्रा ने इसलिए आत्महत्या करली क्योंकि ऑनलाइन क्लासेस की वजह से उसे काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। उसे जो पढ़ाया जाता था वो उसे समझ नहीं आता था। लड़की के परिजनों का कहना है कि वो टीवी के माध्यम से ऑनलाइन क्लासिस किया करती थी और उस दौरान बिजली कट जाने से वो परेशान रहती थी। वो अपने पिता से स्मार्टफोन दिलाने की मांग भी कर रही थी लेकिन लॉकडाउन में काम छिन जाने की वजह से उसके पिता उसे फोन नहीं दिला सके। वहीं, 2 जून को भी केरल में ही ऑनलाइन क्लासिस में भाग ना ले पाने की वजह से एक और 10वी कक्षा की छात्रा ने खुदकुशी करली थी। इन घटनाओं के बाद देश में ऑनलाइन एजूकेशन के स्वरूप और बुनियादी ढांचे को लेकर कई सवाल खड़े हो जाते हैं। सवाल यह भी है कि क्या सरकार के लिए देश में ई शिक्षा को लागू करना आसान  है?   

बिजली और संसाधन की अव्यवस्था में ई शिक्षा की कोरी कल्पना

घरों में बिजली प्रदान करने वाली सरकारी योजना सौभाग्य से पता चलता है कि भारत के लगभग 99.9 फ़ीसद घरों में बिजली कनेक्शन है लेकिन हम बिजली की गुणवत्ता और हर घंटे बिजली उपलब्ध होने वाले घंटों को देखें तो हालात बहुत ही खराब नजर आते हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की तरफ से साल 2017-2018 में मिशन अंत्योदय के तहत देशभर के गांवों में की गई रिसर्च से पता चलता है कि भारत के 16 फ़ीसद घरों में रोजाना एक से आठ घंटे बिजली मिलती है, 33 फ़ीसद को 9-12 घंटे बिजली मिलती है और सिर्फ 47 फ़ीसद को ही दिन में 12 घंटे से अधिक बिजली मिलती है। उधर, इसी साल मई में भारत ने केंद्र शासित प्रदेशों में सभी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का निजीकरण करने का ऐलान किया था, जिसकी जानकारी उद्योग के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के साथ डिजिटल बातचीत में बिजली मंत्री राज कुमार सिंह ने दी थी।

17 अप्रैल को बिजली वितरण प्रणाली को निजी हाथों में सौंपने के लिए बिजली संशोधन बिल- 2020 का ड्राफ्ट जारी कर दिया। इस निजीकरण के खिलाफ इलेक्ट्रिक वर्कर यूनियन ने 1 जून को देशव्यापी प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि इससे सब्सिडी और क्रॉस सब्सिडी खत्म हो जाएगी। बिजली के दाम और बढ़ेंगे और गरीब उपभोक्ता और किसानों की पहुंच से बिजली बाहर हो जाएगी। वहीं, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुश्किल हालातों से गुजर रहीं राज्यों की पावर जनरेटिंग कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए 90,000 करोड़ रुपए देने का ऐलान किया।

बिजली कंपनियां पहले से बहुत ज्यादा गहरे संकट में हैं। बिजली कंपनियों का डिस्कॉम पर 94,000 करोड़ रुपए का बकाया है। यानी इस पैकेज के बावजूद डिस्कॉम करीब चार हजार करोड़ रुपए के घाटे में रहेंगी। लेकिन कुछ अर्थशास्त्रियों मानना है कि सरकार ने जिस 90 हजार करोड़ रूपए के पैकेज की घोषणा की है वो थोड़ा ज्यादा है। उनका कहना है कि निजी और सरकारी कंपनियां विभिन्न कारणों से नुकसान कर रही हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर सरकारी कंपनियां हैं और निजी कंपनियां भी बड़ी हैं इसलिए वो थोड़े समय के लिए ये बोझ सह सकती हैं।

भारत में कहा जा रहा है कि यहां के एजूकेशन का मौजूदा ढांचा बदल कर उसकी जगह ऑनलाइन सिस्टम को लाया जा रहा है।

झारखंड के पलामू जिले की दिव्या बताती हैं कि यहां शहरी इलाको के मुकाबले ग्रामीण इलाको में बिजली की दिक्कत आसानी से देखने को मिल जाती है। शहरों में 18 से 20 घंटे बिजली आती है वहीं ग्रामीण इलाकों में 10 से 15 घंटे बिजली आती है। वो कहती हैं कि ‘लोग ग्रामीण इलाकों में अभी भी सोलर एनर्जी का इस्तेमाल करते हैं यहां तक कि अपना फोन चार्ज करने के लिए वो इस पर ही निर्भर हैं।’ दिल्ली यूनिवर्सिटी में एसिसटेंट प्रोफेसर जितेंद्र मीणा कहते हैं कि ग्रामीण इलाको में ऑनलाइन शिक्षा मुमकिन ही नहीं है क्योंकि वहां बिजली आने का समय निर्धारित नहीं है। वहां कभी सुबह, शाम या रात में बिजली आती है ऐसे में जिस हफ्ते बिजली रात में आएगी तब वहां बच्चों के लिए डिजिटल शिक्षा हासिल करने कैसे आसान होगा? भले ही सरकार इस बात के दावे करे की हर घर में बिजली पहुंच गई है लेकिन यह हकीकत नहीं है।

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नेशनल सेंपल सर्वे की साल 2017-18 में शिक्षा पर की गई रिपोर्ट के मुताबिक़ सिर्फ़ 24 फ़ीसद घरों में इंटरनेट की सहूलियत है। जबकि भारत की 66 फ़ीसद आबादी गांव में रहती है, केवल 15 फ़ीसद  से ज़्यादा ग्रामीण घरों में इंटरनेट सेवा पहुंच रही है। उधर शहरी परिवारों में यह आंकड़ा 42 फ़ीसद है। राज्यों के स्तर पर देखें तो मालूम होता है कि  जिन घरों में सिर्फ़ एक कंप्यूटर है उनका आंकड़ा बिहार में 4.6 फ़ीसद, केरल में 23.5 फ़ीसद और दिल्ली में 35 फ़ीसद है। इंटरनेट के उपयोग के मामले में फर्क साफ देखने को मिलता है। दिल्ली, केरल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में 40 फ़ीसद से अधिक घरों में इंटरनेट का इस्तेमाल होता है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 20 फ़ीसद से भी कम है।

महिला विरोधी है ये ऑनलाइन शिक्षा

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया 2019 की एक रिपोर्ट  बताती है कि 67 फ़ीसद पुरुष और महज 33 फ़ीसद महिलाएं ही इंटरनेट का इस्तेमाल कर पाते हैं। यह असमानता ग्रामीण इलाक़ों में ज़्यादा देखने को मिलती है, जहां यह आंकड़ा पुरुषों में 72 फ़ीसद  और महिलाओं में 28 फ़ीसद है। जेंडर इंडेक्स रिपोर्ट 2020 के मुताबिक़ भारत में लिंग समानता दुनिया में सबसे खराब है। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और राजनीतिक सशक्तीकरण के उपायों के साथ भारत 153 देशों में से 112 वें स्थान पर है। उधर, लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के खिलाफ होने वाले साइबर अपराधों में इज़ाफ़ा देखने को मिला। राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़ अप्रैल में महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए साइबर क्राइम की 54 शिकायतें मिली थी। वहीं, मार्च में यह आंकड़ा 37 और फरवरी में 21 का था। इस तरह की रिपोर्ट के बाद  छात्राओं का कहना है कि ऑनलाइन शिक्षा आने के बाद साइबर अपराधों में बढ़ोतरी होगी।

वहीं, दिव्या कहती हैं कि ऐसे समाज में जहां लड़कियों को फोन नहीं दिया जाता वहां ऑनलाइन शिक्षा लागू कर देना महिला विरोधी है। ऑनलाइन एजुकेश्न को बढ़ावा देकर उसमें महिलाओं को शिक्षा से बाहर किया जा रहा है। वो बताती हैं कि अगर परिवार में लड़के या लड़की में से किसी एक को फोन या साधन देने की बात आएगी तो वो सबसे पहले लड़के को दिया जाएगा। मीणा कहते हैं कि हमारी मौजूदा शिक्षा प्रणाली मौका देती है कि हम दूसरे तबकों से संबंध बना सकें और उनकी संस्कृति को जानने का मौक़ा देती है। इसका काफी फायदा लड़कियां को मिल रहा था। वो मौजूदा शिक्षा प्रणाली के जरिए घरों से बाहर निकल रही थी और आसपास की चीजों के बारे में मालूमात हासिल कर रही थी लेकिन ऑनलाइन एजूकेशन आने के बाद यह सब बदल जाएगा। इसके बाद लड़कियां फिर से अपने घरों में कैद हो जाएंगी और मिलने जुलने और जानने की जिज्ञासा खत्म हो जाएगी। इसके माध्यम से महिलाओं की आजादी पर भी हमला किया जा रहा है।

साथ ही, पढ़ाई  करने के लिए एक अनुकूल वातावरण की जरूरत होती है। लेकिन सभी छात्रों के पास घर पर पढ़ने-लिखने के लिए एक शांत स्थान नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 37 फ़ीसद घरों में एक ही कमरा है। इससे साबित होता है कि यह कई लोगों के लिए इस अव्यवस्था में ऑनलाइन एजुकेश्न लेना लक्जरी होगा।  इस वक्त जहां लाखों मजदूर अपनों बच्चों के साथ सड़कों पर निकल कर अपने घर पहुँचे हैं या पहुँचने वाले हैं उनके लिए कामकाज छिन जाने के बाद ऑनलाइन शिक्षा को अपनाना बहुत मुश्किल होगा।

मीणा बताते हैं कि दिक्कत यह है कि सरकार परीक्षा के नाम पर ऑनलाइन एजूकेशन सिस्टम ला रही है। परीक्षा कराने के लिए हमारे पास विकल्प है। जैसे महाराष्ट्र और हैदराबाद की यूनिवर्सिटीज परीक्षा को लेकर जो कदम उठा  रही है वो सरकार भी कर सकती है। इन यूनिवर्सिटीज ने छात्रों को उनके इंटर्नल नम्बर के आधार पर प्रमोट करने की बात की है।  दूसरा विकल्प है कि पिछले जो सेमेस्टर हुए हैं उनके मार्कस के आधार पर एवरेज निकाला जाए और छात्रों को प्रमोट किया जाए । तीसरा विकल्प है कि इंटर्नल और सेमेस्टर को मिलाकार छात्रों के एवरेज मार्कस के आधार पर उन्हें अगली क्लास के लिए भेजा जाए। लेकिन यह एक समय-सीमा के तहत करना होगा, जो कि मुमकिन है। भारत में कहा जा रहा है कि यहां के एजूकेशन का मौजूदा ढांचा बदल कर उसकी जगह ऑनलाइन सिस्टम को लाया जा रहा है। इसके तहत यहां सिर्फ बच्चों को भर्ती करना ही टारगेट रह जाएगा। लेकिन उसका नतीजा क्या होगा सरकार को इस बारे में सुध ही नहीं है।

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तस्वीर साभार : हिना फ़ातिमा

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