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हमारे दिल में यह ख्याल कई बार आया होगा कि अरे, मैं कितनी बदसूरत हूं। काश मैं थोड़ी पतली होती, मेरे बाल थोड़े घने होते, या मेरी आंखें उस फ़िल्म कलाकार की तरह सुंदर होतीं। एक ऐसे समाज में जहां शारीरिक सौंदर्य को एक ऊंचा दर्जा दिया गया है और उसे नापने के लिए कठोर पैमाने तय किए गए हैं, ऐसे विचार आना असामान्य नहीं है। पर क्या होता है जब इंसान अपने शरीर को नफ़रत की निगाह से देखने लगता है? जब खुद को सुंदर महसूस न कर पाने की वजह से वह एक आम ज़िंदगी नहीं जी पाता? जब उसे अपना शरीर इतना बदसूरत और घिनौना लगने लगता है कि उसका आत्मसम्मान पूरी तरह से ध्वस्त हो जाता है और वह खुदकुशी के बारे में भी सोचने लगता है?

बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर। यह एक मानसिक बीमारी है जिससे ग्रस्त व्यक्ति को अपने चेहरे और शरीर से इस प्रकार नफ़रत हो जाती है कि वह इन्हें बदलने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। उसे अपने चेहरे या शरीर पर ऐसी खामियां नज़र आने लगतीं हैं जिनका हकीकत में अस्तित्व ही नहीं है। शरीर की बनावट साधारण होने के बावजूद उन्हें लगता है कि वे बहुत पतले या मोटे हैं, उनके शारीरिक अंग बहुत छोटे या बड़े हैं। अपने शरीर को ‘सुधारने’ के लिए वे अक्सर कई बार कई तरह की प्लास्टिक सर्जरियां करवाते हैं जिनका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है, जिससे उनकी जान भी खतरे में आ जाती है। खुद के बारे में ऐसे नकारात्मक विचारों का असर उनके व्यक्तिगत, सामाजिक, व पेशेवर ज़िंदगी में भी पड़ता है जिसके कारण उनका मानसिक तनाव और भी बढ़ जाता है। बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर के हर पांच मरीजों में से एक आत्महत्या का शिकार हो जाता है। 

दिव्या मुंबई में रहनेवाली एक 19 साल की लड़की है। बी.कॉम द्वितीय वर्ष की छात्रा है। पिछले एक साल से वह अपने शरीर में बेहद असहज महसूस कर रही है। उसे लगता है कि उसकी नाक बहुत टेढ़ी है और एक गाल दूसरे गाल से बहुत ज़्यादा बड़ा है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। वह दिन भर खुद को आईने में देखकर रोती रहती है। उसने घर से बाहर भी निकलना बंद कर दिया है इस डर से कि लोग उसकी शक्ल देखकर उस पर हंसेंगे। इसकी वजह से उसका कॉलेज जाना बंद हो गया है जिसके कारण उसकी पढ़ाई को नुकसान पहुंचा है। अगर वह कभी बाहर जाती भी है, तो खुद को सर से पांव तक ढककर रखती है। उसके परिवारवाले बहुत चिंतित है और उन्होंने कई बार उससे बात करने की कोशिश की है, पर कोई असर नहीं हुआ। दिव्या उनसे यही कहती है कि उसे प्लास्टिक सर्जरी की सख्त ज़रूरत है, नहीं तो उसका चेहरा कभी सही नहीं होगा। फ़िलहाल उसकी काउंसेलिंग चल रही है और उसके मनोचिकित्सक को यकीन है कि उसमें बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर के सारे लक्षण हैं। 

बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर एक मानसिक बीमारी है जिससे ग्रस्त व्यक्ति को अपने चेहरे और शरीर से इस प्रकार नफ़रत हो जाती है।

‘डायगनोस्टिक ऐंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ़ मेंटल डिसॉर्डर्स’ (डीएसएम) के मुताबिक यह बीमारी 2.4 फ़ीसद जनता में देखी जाती है। इसकी शुरुआत किशोरावस्था में होती है और आमतौर पर यह अंतर्मुखी (इंट्रोवर्ट) स्वभाव के व्यक्तियों में ज़्यादा पाई जाती है। इससे ग्रसित कई लोग बचपन में शोषण का शिकार रहे होते हैं, और उनमें आत्मसम्मान की कमी भी होती है। अपने चेहरे को लेकर उनमें अतिरिक्त असहजता रहती है और वे हर दो मिनट आईने में देखते हैं, अपनी तुलना दूसरों से करते हैं, अपने आपको शारीरिक नुकसान या पीड़ा पहुंचाते हैं, और अक्सर अपने शरीर से तंग आकार आत्महत्या की ओर बढ़ते हैं। 

मनोचिकित्सक डॉ राजीव शर्मा कहते हैं, ‘बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर ग्रसित 90 फ़ीसद लोगों को डिप्रेशन होता है और 70 फ़ीसदी को ऐंगज़ाइइटी। वे ऐसा शरीर पाने की कामना करते हैं जैसा हकीकत में किसी इंसान का शरीर नहीं हो सकता। वैसे तो हम सबको सुंदर दिखना व खुद को संवारना पसंद है।  पर बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर के मरीजों को सिर्फ़ खूबसूरत दिखने की इच्छा नहीं, अपने प्राकृतिक शरीर से अत्याधिक घृणा भी होती है। मैंने एक ऐसे व्यक्ति को देखा है जिसने प्लास्टिक सर्जरी का खर्चा उठाने के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन बेच डाली है। वह मानता था उसकी नाक टेढ़ी है और सिर्फ़ सर्जरी से ठीक हो सकती है। कई लोग अपने घर से निकालना भी बंद कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है लोग उन्हें देखकर हंस रहे हैं। अगर कोई उन्हें समझाने की कोशिश करे कि उनमें कोई बुराई नहीं है, तो वे इसे झूठ मानते हैं।’

जहां आमतौर पर हम मेकअप और शृंगार अपने शौक के लिए करते हैं, इस बीमारी से पीड़ित कई लोगों के लिए मेकअप के बिना ज़िंदगी अकल्पनीय है क्योंकि वे इसका इस्तेमाल अपना चेहरा छिपाने के लिए करते हैं। एक महिला जिन्हें किशोरावस्था में यह बीमारी थी कहती हैं, ‘मैं जब भी घर से बाहर निकलती थी, अपने चेहरे पे खूब सारा मेकअप थोपकर जाती थी। मेकअप मेरे लिए एक नक़ाब की तरह था जिसके रहते कोई मेरा असली चेहरा नहीं देख पाता। लोग खुद को आकर्षक बनाने के लिए मेकअप करते हैं पर मैं खुद को छिपाने के लिए करती थी।’

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अमेरिका में रहनेवाली पत्रकार क्लोई कैचपोल ने हाल ही में बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर के खिलाफ़ अपने जंग के बारे में अपनी किताब प्रकाशित की है। वे कहती हैं कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों के मन में यह बात अटकी रहती है कि उनके शरीर में कोई समस्या है, हालांकि उनके पास इसके विपरीत होने का सबूत क्यों न हो। क्लोई जब 15 साल की थीं, उन्हें यह यकीन हो गया था कि उनके गले का आकार विकृत है जिसकी वजह से लोग उन पर हंसते है, और वे दो साल अपने घर से बाहर नहीं निकलीं। उनके पास ऐसा महसूस करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि उनकी एक जुड़वी बहन है और आमतौर पर लोग उन दोनों में फ़र्क ही नहीं कर पाते। अगर उनमें सचमुच कोई ऐसी विकृति होती जो उनकी बहन में नहीं है, तो ऐसा नहीं होता। फिर भी वे लंबे समय तक अपने बारे में इस तरह के नकारात्मक विचारों से पीड़ित रहीं और कुछ साल पहले ही वे इन ख्यालों से पूरी तरह मुक्त हो पाई। 

बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर का असर बेहद गंभीर होता है। यह एक इंसान का आत्मबल पूरी तरह से गिरा देता है, उसे अपने शारीरिक स्वास्थ्य को जोखिम में डालने के लिए मजबूर करता है और उसकी पूरी ज़िंदगी तहस नहस कर देता है। क्या इससे बचने का कोई उपाय है? जवाब है, हां। मनोचिकित्सक डॉ अनुजा केलकर के मुताबिक, ‘बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर का इलाज ऐंटी-डिप्रेसन्ट और ऐंटी-साइकॉटिक दवाओं से होता है। साथ ही पेशंट की काउन्सेलिंग भी की जाती है और नींद सुधारने व ऐंगज़ाइइटी कम करने की दवाएं दी जाती है। नियमित रूप में दवाओं और थेरपी से इस बीमारी को हराया जा सकता है।’

एक ऐसी संस्कृति में जहां सुंदरता को इतनी अहमियत दी जाती है, बॉडी डिसमोर्फिक डिसॉर्डर से लड़ना बेहद मुश्किल हो सकता है। ऐसे में ज़रूरत है संवेदनशीलता, प्रेम, और सौहार्द की ताकि इससे पीड़ित व्यक्तियों को वक़्त पर मदद मिल सके और उन्हें यह जंग अकेले न लड़नी पड़े।  

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तस्वीर साभार : additudemag

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