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‘रक्षाबंधन’, वो त्योहार जिसे हर बहन बड़े चाव से मनाती है या यों कहें कि हमारे हिंदू समाज में यह उम्मीद की जाती है कि हर महिला इस त्योहार को चाव से मनाए। वो पूरे विश्वास के साथ अपने भाई की कलाई पर राखी बांधे और ये उम्मीद करें कि वो ज़िंदगीभर अपनी बहन की रक्षा करेगा। इस त्योहार के पीछे का विचार जितना अच्छा देखने में लगता है मौजूदा समय में यह सरोकार से उतना ही दूर होता दिखाई देता है। आज जब हम आए दिन अपने देश में महिलाओं के साथ बढ़ती हिंसा के स्तर को देखते है तो ऐसे पर्व-त्योहार दिखावटी मालूम होते है।

कहते है किसी भी संस्कृति का विकास विचार और व्यवहार से होता है। इसी तर्ज़ पर आज जब हम रक्षाबंधन के विचार, व्यवहार और सरोकार को देखते है तो लैंगिक भेदभाव की संस्कृति को बढ़ावा देने में इसका अहम भूमिका देख पाते है। क्योंकि जब घर में एक बेटी के बाद दूसरी बेटी का जन्म होता है तो आज भी दुःख की दोहरी लहर दौड़ जाती है और समाज इस पर्व का हवाला देकर कहता है ‘अरे! एक बेटा हो जाए तब तो ये बहनें राखी का त्योहार मनाएँगीं।’ मतलब इस पर्व ने बेहद संजीदगी से इस पर्व को मनाने की अहर्ताओं को रचा है, तो आइए चर्चा करते है आज के रक्षाबंधन के इस त्योहार में उन महिलाओं की जिनकी ज़िंदगी इस पर्व से उपजी हिंसा की शिकार हो रही है।

‘वंचित’ महसूस करती बिन भाई की बहनें  

नेहा के लिए रक्षाबंधन का त्योहार बेहद गर्व का त्योहार होता है, क्योंकि उसके पास रवि भईया है। लेकिन आज नेहा की चाची की तीन बेटियाँ बेहद निराश और उपेक्षित महसूस करती है क्योंकि उनके पास अपना सगा भाई नहीं है और घरेलू लड़ाई के चलते है नेहा उन्हें अपने भाई को राखी बांधने नहीं देती है। ये त्योहार ही तो है जिसने अपनी पितृसत्तात्मक संरचना के तहत पुरुष को श्रेष्ठ बनाकर महिला द्वेष को बढ़ावा दिया है, जो अपने आप में विशेषाधिकार और वंचित वर्ग की अवधारणा को बढ़ाता है। क्योंकि ये त्योहार ही तो है जो महिलाओं को ये एहसास दिलाता है कि उनके पास भाई नहीं है और अगर उनके पास भाई होता तो वो भी इस त्योहार को धूमधाम से मनाती।

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राखी बांधने को मजबूर ‘घरेलू हिंसा की शिकार बहनें’

माधवी ने जब आगे पढ़ने की बात कही तो उस दिन उसके भाई ने उसके साथ मारपीट करके लहुलुहान कर दिया। जब हम घरेलू हिंसा की बात करते है तो उसका मतलब सिर्फ़ पति-पत्नी के बीच या शादी के बाद होने वाली हिंसा से नहीं है। बल्कि शादी से पहले मायके में होने वाली हिंसा भी घरेलू हिंसा के दायरे में आती है। ऐसे कई ऐसे केस भी होते है जिसमें घर में भाई अपनी बहनों के साथ घरेलू हिंसा करते है और इज़्ज़त के नामपर उनपर पाबंदी लगाते है। चूँकि ये हमारे तथाकथित घर का मामला होता है इसलिए इज़्ज़त के नामपर सब सामान्य करना होता है और बहनों के न चाहते हुए भी खुद पर हिंसा करने वाले भाई को राखी बांधनी होती है। ये सब वैसा ही होता है जो अपने भक्षक को रक्षक समझकर उनसे ख़ुद की सुरक्षा का वादा लेते हैं।  

आज जब हम रक्षाबंधन के विचार, व्यवहार और सरोकार को देखते है तो लैंगिक भेदभाव की संस्कृति को बढ़ावा देने में इसका अहम भूमिका देख पाते है।

लैंगिक भेदभाव में पलती ‘अभावग्रस्त बड़ी बहन की राखी’

पाँच साल की मुन्नी के छोटे भाई ने जब जन्म लिया तो छोटू को संभालने की ज़िम्मेदारी मुन्नी पर आ गयी। माँ जब मज़दूरी करने घर से निकलती तो छोटू का ज़िम्मा मुन्नी का होता। दो-तीन सालों में मुन्नी ने कब अपने बचपन को खोकर माँ की भूमिका ले ली पता ही नहीं चला और उसके अवसरों की जगह कब छोटू भाई ने लिया पता ही नहीं चला। इन सबने मुन्नी को उम्र से पहले बड़ा बना दिया, बच्चे संभालने से लेकर चूल्हा-चौका का काम उसने सीख लिया। छोटू जब स्कूल जाने को हुआ तो मुन्नी बोझ लगने लगी और तेरह साल की उम्र में उसकी शादी कर दी गयी। अपने बचपन और अवसरों की आहुति देने के बाद मुन्नी हर साल अपने छोटे भाई को राखी बांधती है, जिसकी बहती नाक भी मुन्नी पोंछती है।

‘मुँहबोले वो भाई’ जो बहन का जिस्म मौत तक नोचते रहे

बबिता के दो भाई को उसकी सहेली निशा भी भाई बोलती और हर साल राखी बांधती। लेकिन पिछले साल दोनों नाबालिग भाइयों ने निशा का बलात्कार किया और उसके मरने तक वे निशा का शरीर नोचते रहे। ऐसे कई केस हम आए दिन देखते-सुनते है, जब रिश्तेदार और नाबालिग लड़के बलात्कार जैसी यौन हिंसा को अंजाम देते हैं। ऐसी घटनाएँ हमेशा से ‘रिश्ते’ की परिभाषा और भरोसे पर सवाल खड़े करती है, जिसने रक्षाबंधन जैसे पर्व भी शामिल है।

ये तो समाज के चंद पहलू है जिन्हें हम कभी देखते नहीं है या देखना चाहते ही नहीं है। ये वो महिलाएँ जिनके लिए रक्षाबंधन पर्व से ज़्यादा थोपी हुई ज़िम्मेदारी से कम नहीं है। मैं किसी उत्सव या पर्व के ख़िलाफ़ नहीं हूँ लेकिन हाँ ख़िलाफ़ हूँ लैंगिक भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा देने वाली संस्कृति से। वो संस्कृति जो उत्सव के नामपर हिंसा को पोसने वाले पर्व को बढ़ावा देते है और आँख बंद कर लेती है समाज में होने वाली हिंसा के साथ। इसलिए पर्व मनाइए लेकिन उसकी भेदभावपूर्ण वैचारिक के प्रभाव का विश्लेषण करके अपनी संजीदगी बढ़ाइये।

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 तस्वीर साभार : wunrn

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