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ख़ुशबू शर्मा

ऑनलाइन परीक्षा और ऑनलाइन शिक्षा को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की तरफ से जुलाई के महीने में विश्वविद्यालयों को दी गई गाइडलाइन्स में अपनी डिग्री के आखिरी सेमेस्टर या आखिरी साल में पढ़ रहे छात्रों के लिए परीक्षाओं को अनिवार्य किए जाने के बाद अकादमिक जगत में एक बड़ी बहस खड़ी हो गई है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मानना है कि शिक्षा और खासकर की डिग्री के बिना परीक्षा के पूरी नहीं हो सकती इसलिए उनके अनुसार चाहे पूरी दुनिया कोरोना महामारी से ही क्यों न जूझ रही हो छात्रों की परीक्षाओं को नहीं टाला जा सकता। ऐसे में सवाल यह उठता है की भारत में कोरोना महामारी का संक्रमण जिस तेज़ी से फ़ैल रहा है और इस हालत में ऑफलाइन परीक्षाएं करवाना क्या अनिवार्य हैं? साथ ही नए सत्र को चलाने के लिए ऑनलाइन शिक्षा ही एकमात्र ज़रिया है?

यूजीसी के इस सर्कुलर और पूरी शिक्षा व्यवस्था को महामारी के कठिन समय का फायदा उठाते हुए ऑनलाइन शिफ्ट करने की मंशा को लेकर विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच भारी रोष है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से दिए गए दिशा-निर्देशों का देशभर के कई छात्रसंघ और शिक्षक संघ खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा को सिर्फ परीक्षाओं तक सीमित करके देखना अपने आप में शिक्षा की खिल्ली उड़ाने जैसा है। शिक्षा का मकसद परीक्षाएं पास कर डिग्रियां पूरी करवाने से ज़्यादा सीखना-सिखाना, विद्यार्थियों में तार्किक क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना है, जिसके ज़रिये वे न सिर्फ अपने-अपने विषयों बल्कि देश और दुनिया की ज़रूरी बहसों और महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी एक राय कायम कर सकें। जब दुनिया भर के छात्रों को इस महामारी से उपजे अनेक संकटों से लड़ने के रास्ते खोजने का मौका दिया जाना चाहिए, उन पर परीक्षाओं का बोझ डालकर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना कहां तक उचित है? शिक्षा की संकल्पना में परीक्षा एक प्रशासनिक प्रक्रिया से ज़्यादा कुछ भी नहीं है तो महामारी के दौरान इस पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है। पूरी शिक्षा व्यवस्था के मूलभूत सिद्धांतों को सिर्फ परीक्षा की बहस तक समेट देना यह प्रदर्शित करता है कि शिक्षा को लेकर आज के नीति निर्माताओं की समझ कितनी संकीर्ण है।

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यह मामला सिर्फ परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। पूरी शिक्षा व्यवस्था मतलब कक्षाओं से लेकर मूल्यांकन तक सरकार का हर चीज़ को ऑनलाइन किए जाने पर भारी ज़ोर है| यह कदम हमारे देश की ज़मीनी हकीक़त को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय में बैठे नीति निर्माताओं की समझ पर कई सवालिया निशान खड़े करता है। ऑनलाइन शिक्षा भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में कोरी और खोखली परिकल्पना से अधिक कुछ भी नहीं है। इसे धरातल पर उतार पाना उतना ही संभव है जितना आसमान से तारे तोड़कर धरती पर ले आना। भारत ही नहीं बल्कि पूरी तीसरी दुनिया के देशों के छात्रों में शिक्षा व्यवस्था को ऑनलाइन किए जाने के निर्णय को लेकर खासी नाराज़गी है| इसका कारण है हमारे जैसे देशों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि। जिस देश ने महामारी के दौरान ही न जाने कितने लोगों को भूख से मरते हुए देखा हो, वहां ऑनलाइन परीक्षा और शिक्षा की बात करना मज़ाकिया मालूम होता है। हमारे समाज और आर्थिक तंत्र के भीतर तक ग़ैर-बराबरी डेरा जमाकर बैठी है।

जहां एक और महिलाएं हैं, जिन्हें सदियों से पितृसत्ता के किए गए जुल्मों से आज भी निजात नहीं मिली है। वहीं, दूसरी ओर हैं- दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यक जिन्हें आज भी सदियों पुराने जातीय बंधनों और हिंसा की बेड़ियों से आजादी नहीं मिली है। ऑनलाइन तो छोड़ दीजिए, अभी तक सामान्य ऑफलाइन शिक्षा भी इन शोषित, वंचित तबकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है। जहां तक बात है उच्च शिक्षा की, उसमें सामाजिक-आर्थिक पिछड़े परिवारों के बच्चों ने अभी-अभी उच्च शिक्षण संस्थानों में कदम रखने शुरू ही किए थे कि आज ऑनलाइन शिक्षा और अब इस नई शिक्षा नीति के ज़रिये इन सभी वर्गों से आने वाले विद्यार्थियों को शिक्षा व्यवस्था से बाहर करने देने की क्रूर साजिश को अंजाम देने की पूरी तैयारी कर ली गई है।

ऑनलाइन शिक्षा भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में कोरी और खोखली परिकल्पना से अधिक कुछ भी नहीं है। इसे धरातल पर उतार पाना उतना ही संभव है जितना आसमान से तारे तोड़कर धरती पर ले आना।

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में मात्र 12.5 फीसद विद्यार्थी ऐसे हैं जिनके घरों में इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है। अगर इसमें भी ग्रामीण-शहरी डिवाइड को देखा जाए तो तस्वीर और भी भयानक हो जाती है। जहां एक ओर शहरों के लिए यह आंकड़ा 27 फीसद से अधिक नहीं है, वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ 5 फीसद छात्र ऐसे हैं जिनके घरों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। इतने गहरे “डिजिटल डिवाइड” को ध्यान में रखे बिना ऑनलाइन पद्धति को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों पर दबाव बनाना कहां तक सही है? इसी बहस में यह भी जान लेना बेहद ज़रूरी है की जो बचे हुए 87.5 फीसद छात्र हैं जिनके पास किसी प्रकार की इंटरनेट सुविधा नहीं है उनमें से अधिकांश सामाजिक-आर्थिक पिछड़े तबकों से आते हैं।

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महिला साक्षरता भी अभी तक पुरुषों के बराबर पहुंचने में संघर्ष कर रही है, ऐसे में जब ऑनलाइन शिक्षा की बात आती है तो हमारा समाज किसी भी तरह एक लड़की को सामान्य परिस्थितियों में भी इतने संसाधन उपलब्ध नहीं करवाता की वह अपनी शिक्षा पूरी कर सके। इंटरनेट और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण उनके हाथों में सौंपने की बात तो छोड़ ही दीजिए। आज भी देश की आधी से भी कम महिलाओं के पास मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है। हमारा समाज आज भी इस सिद्धांत पर चलता है की महिला को दुनिया भर से जुड़े होने की छूट देना उसके चारित्रिक पतन को न्योता देना है। ऐसे में पढ़ने के लिए शायद ही कोई घर ऐसा हो जहां लड़कियों को मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप और इंटरनेट की सुविधा मुहैया करवाई जाएगी। इसकी बजाय सामान्य भारतीय परिवार अपने घर की लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाना ज़्यादा बेहतर समझेंगे।

महिलाओं पर घर के काम का बोझ एक पुरुष की तुलना में अधिक होता है। इस समय जब देश भर के लोग कोरोना के डर से अपने घरों में क़ैद हैं, ऐसे में घर की महिलाओं और लड़कियों पर घरेलू काम की ज़िम्मेदारी और बढ़ गई है। बहुत सी छात्राएं जिनके पास ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होने के संसाधन मौजूद हैं, उन्होंने अपने अध्यापकों से ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान गैरमौजूद रहने का कारण घरेलू काम का बढ़ता दबाव बताया। महिलाओं को अपने घरों में तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है ऐसे में उनके लिए कक्षाएं लेना और ऑनलाइन परीक्षाएं देना किसी भी तरह संभव नहीं होता।

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) के लोकनीति कार्यक्रम के अंतर्गत साल 2019 में की गई एक स्टडी में पता चलता है की भारत में जहां एक तरफ 15 फीसद सवर्ण किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग साईट का इस्तेमाल करते हैं, वहीं दलितों और आदिवासियों के लिए यह आंकड़ा इसका आधा ही है (8 फीसद और 7 फीसद क्रमशः) और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए यह आंकड़ा 9 फीसद है| इस सर्वे से यह साफ़ पता चलता है की इंटरनेट कनेक्टिविटी, उपलब्धता और एक्सेसिबिलिटी के आंकड़े कितने भेदभावपूर्ण और निराशाजनक हैं। इंडिया इंटरनेट रिपोर्ट 2019 के आंकड़े बताते हैं की भारत में 258 मिलियन इंटरनेट उपभोक्ता पुरुष हैं और महिला उपभोक्ताओं की संख्या इससे आधी है| इन सभी तथ्यों को अगर सामने रखा जाए तो साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि ऑनलाइन शिक्षा किन सामाजिक तबकों को शिक्षा के अधिकार से वंचित किए जाने की साज़िश की करती है।

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आज महामारी के चलते बेरोज़गारी अपने चरम पर है, लोग आर्थिक तंगी के हालातों में जी रहे हैं। कई परिवार तो आज इस स्थिति में पहुंच चुके हैं की दो वक़्त की रोटी के लिए भी उन्हें दिन-रात एक करना पड़ रहा है। ऐसे में यह उम्मीद करना की अपने बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा की ज़रूरत को पूरा करने के लिए ये परिवार नए संसाधन जुटा पाएंगे, बहुत ही बेतुकी और अमानवीय सोच है| हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आये हैं जिनमें ऑनलाइन शिक्षा के लिए ज़रूरी संसाधनों के अभाव में विद्यार्थी और उनके घर वाले भारी मानसिक तनाव से गुजरने के चलते आत्महत्या तक का विकल्प चुन रहे हैं। त्रिपुरा के एक शख्स जो अपनी बेटी को पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन नहीं दिला सके और केरल की एक छात्रा जो ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल नहीं हो पाई, इन दोनों की मौत आत्महत्या से हो गई।

जिनके पास काम नहीं है, वे अपनी थोड़ी बहुत बची हुई जमा-पूंजी पर गुज़ारा कर रहे हैं। जहां ऑनलाइन शिक्षा को बढ़ावा देने वाली नीति निर्माताओं के पास वातानुकूलित सरकारी आवास हैं तो दूसरी ओर देश का मेहनतकश, निम्न मध्यमवर्ग और मध्यमवर्ग एक-दो कमरों के घरों में सामान्य से कमतर परिस्थितियों में अपना गुज़ारा कर रहे हैं। ऐसे में उनसे संसाधनों की उपलब्धता, कंप्यूटर और डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन परीक्षा और कक्षाओं में उपस्थिति की उम्मीद करना किसी क्रूरता से कम नहीं है। जब इन सभी तथ्यों को नज़रंदाज़ करके ऑनलाइन शिक्षा की बात की जाती है तब देश के 80 फीसद लोगों से शिक्षा छीने जाने की घोषणा मालूम पड़ती है। किसी के पास फ़ोन नहीं है तो किसी के पास इंटरनेट नहीं है। किसी के पास घर नहीं तो किसी के पास खाना नहीं- इन हालातों में ऑनलाइन शिक्षा की बात करना और अपने देश के भविष्य के सपनों पर कुठाराघात करने जैसा है। यह शिक्षा को एक अभिजात्य वर्ग तक सीमित कर उसे बाज़ार में बेचने-खरीदने की वस्तु बनाने की क्रूर और अमानवीय साज़िश का पर्दाफाश करती है।

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(यह लेख ख़ुशबू शर्मा ने लिखा है, जो जेएनयू में राजनीति विज्ञान की छात्रा है।)


तस्वीर साभार: huffingtonpost

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