इंटरसेक्शनलजेंडर क्वारंटीन में रहने का मेरा अनुभव जब मैंने घर का कोई काम नहीं किया

क्वारंटीन में रहने का मेरा अनुभव जब मैंने घर का कोई काम नहीं किया

क्वारंटीन में मुझे घर का कोई काम नहीं करना पड़ रहा था तो मुझे एहसास हुआ कि बचपन से महिलाओं ने कितना अधिक समय घर के काम को दिया है।

कोरोना काल और क्वारंटीन सबके लिए अलग-अलग अनुभव और चुनौतियां लेकर आया है। कोरोना काल में सभी लोग अब तक अपने घरों में बंद रहने के लिए मजबूर हैं। मैंने भी कोरोना वायरस के कारण लागू हुए इस लॉकडाउन के दौरान बहुत समय के बाद एक लंबे वक्त के लिए अपने घर में रहने का फैसला किया। इस संक्रमण के कारण मुझे 14 दिनों तक अपने घर में क्वारंटीन में रहना था। सच कहूं तो मुझे क्वारंटीन में रहना अच्छा लगा। अपने क्वारंटीन के दौरान मुझे यह अनुभव भी हुआ कि अनपेड लेबर वर्क ने महिलाओं का कितना बड़ा नुकसान किया है। इस बारे में कई समाजशास्त्री, जेंडर स्टडीज़ की समझ रखने वाले और शिक्षाविद् लिख चुके हैं| मैंने अपने 14 दिनों के क्वारंटीन में महिलाओं को खुद के लिए मिलने वाले समय, घर के काम और उन्हें मिलने वाले शिक्षा के अवसर को समझने की कोशिश की।

महिलाएं घर के जितने भी काम करती हैं जैसे झाड़ू, पोछा और घर साफ़ रखना, बर्तन धोना, खाना बनाना और परोसना, कपड़े धोना. उन्हें ठीक से रखना और ईस्त्री करना आदि। क्वारंटीन में मैंने पहली बार घर का ये सब काम नहीं किया। मैंने खुद के ही काम किए जैसे सिर्फ अपने बर्तन और अपने कपड़े धोना, कमरा साफ़ करना आदि। मुझे महिला होकर घर के काम न करना अच्छा लगा। मैं परिवार नाम की संस्था के खिलाफ बिलकुल नहीं हूं न ही मैं यह कह रही हूं कि महिलाओं को परिवार से अलग रहना चाहिए या फिर घर के कोई काम नहीं करने चाहिए। मैं परिवार की संरचना में महिलाओं की जिम्मेदारी और उसके कारण महिलाओं की शिक्षा पर पड़ने वाले असर की बात कर रही हूं।

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क्वारंटीन में मुझे घर का कोई काम नहीं करना पड़ रहा था तो मुझे एहसास हुआ कि बचपन से महिलाओं ने कितना अधिक समय घर के काम को दिया है। घर का काम जो एक तरह का अनपेड लेबर वर्क है, उसकी वजह से होने वाली थकावट ने बहुत सी महिलाओं पर बचपन से कम बुद्धिमान, पढ़ाई में कमज़ोर या असफल होने का लेबल चिपका दिया है जबकि उन्हें वे अवसर ही नहीं दिए गए। नतीजन बहुत सी महिलाओं ने बचपन से ही पढ़ाई से मुंह मोड़ लिया या उनकी पढ़ाई-लिखाई और नौकरी मात्र शादी के लिए एक सर्टिफिकेट बन कर रह गई। आज के समय में पढ़ी-लिखी महिलाएं बहुत से परिवारों के लिए परिवार का ‘स्टेटस सिंबल’ मात्र बनकर रह गई हैं।    

क्वारंटीन के दौरान मैंने महसूस किया कि अगर महिलाओं को घर के सभी काम न करने पड़ते तो उनके पास कुछ सोचने ,पढ़ने ,समझने और करने के लिए समय होता मैं समझ पा रही हूं कि अगर मेरी मां अपने बचपन से घर के ये सब काम अकेली या अन्य महिलाओं के साथ नहीं करती तो वो और दूसरी सभी महिलाएं कितना कुछ कर सकती थी। खुद के लिए समय का अभाव महिलाओं के जीवन का हिस्सा बन चुका है। समय के अभाव में ही महिलाओं ने शिक्षा में खुद को पुरुष के समकक्ष सिद्ध किया है। लेकिन फिर भी गाज महिलाओं पर ही गिरी और कहा जाने लगा, ‘फलां घर के काम के साथ पढ़ाई में अवल्ल आ सकती है तो तुम क्यों नहीं।’  

क्वारंटीन में मुझे घर का कोई काम नहीं करना पड़ रहा था तो मुझे एहसास हुआ कि बचपन से महिलाओं ने कितना अधिक समय घर के काम को दिया है।

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अक्सर घर के काम को महिलाओं के भावनात्मक पक्ष, ख़ासतौर पर परिवार का ख़्याल रखने की भावना से से जोड़ दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर महिला घर वालों की फ़िक्र करती है तो किचन से लेकर बाथरूम साफ़ करने जैसे सारे काम उसे खुद ही करने होंगे। पुरुषों के लिए ख्याल रखने के पैमाने अलग हैं। अगर पुरुष परिवार के बारे में सोचता है, सदस्यों का ख्याल रखता है तो उसे ज़्यादा से ज़्यादा पैसे कमाने चाहिए। जबकि सच यह है कि ‘ख्याल रखने’ का इस प्रकार के विभाजन से कोई लेना-देना नहीं है। यह बस हमारे-आपके बनाए हुए ढांचे हैं, जिन्हें हम और आप बदल सकते हैं ।

सवाल ये है कि क्यों हम सब घर के काम में समानता का नियम नहीं ला सकते या हम लाना ही नहीं चाहते। क्यों लड़के बर्तन या सफाई करने में पीछे है और इसे भारतीय परिवारों में सेलिब्रेट किया जाता है? क्या खाना ना बनाने वाले लड़के कमज़ोर, कम बुद्धिमान या असफल होते हैं? क्या खाना बनाने में दिमाग की कोई भूमिका नहीं होती है? क्या पढ़ने के लिए अधिक समय और अवसर दिया जाना सिर्फ़ लड़कों का ही अधिकार है? क्या हमने लड़कियों को शिक्षा के उतने ही अवसर दिए हैं जितने लड़कों को मिलते हैं? मुझे लगता है इन सभी सवालों पर हमें ठीक से विचार करना चाहिए क्यूंकि शिक्षा का सवाल स्कूल या कॉलेज में लड़कियों का दाखिला करवा देने से ख़त्म नहीं होता। हमें ऐसा समाज बनाना होगा जहां लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर और उनको खुद के लिए समय मिले| एक ऐसा समाज जहां घर और बाहर के काम की ज़िम्मेदारी घर के सभी सदस्यों को बराबरी से उठानी होगी।

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(यह लेख रितिका श्रीवास्तव ने लिखा है जो टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान हैदराबाद में पीएचडी की छात्रा हैं।)


तस्वीर साभार : thestatesman

Comments:

  1. Dipika Bhasin says:

    You’ve shown another point of view to review this time and another anglebof this quarantine. I liked it.

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