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‘पिंजरा तोड़’ आंदोलन के बाद देशभर के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लड़कियों ने कैंपस में होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। पंजाब यूनिवर्सिटी से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी तक इस आंदोलन का असर दिखाई दिया। मुख्यतौर पर छात्राओं की यह मांग थी कि उनके हॉस्टल के कर्फ्यू के टाइम को हटा दिया जाए। कर्फ्यू सिस्टम के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की छात्राओं की निश्चित समय से पहले अपने हॉस्टल में वापस आ जाना होता है। इस सिस्टम को अक्सर सुरक्षा के नामपर उचित ठहराया जाता है। सुरक्षा का यह तर्क सुप्रीम कोर्ट ने भी दिया था जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थियों ने हॉस्टल के नियमों की वैद्यता को चुनौती दी थी। जब भारत की सर्वोच्च अदालत भी सुरक्षा के नाम पर लड़कियों की आज़ादी के साथ समझौता करने के लिए तैयार है, तो ऐसे में क्या हमारे कैंपस में मौजूद यह ‘पिंजरा’ कभी टूट पाएगा? 

यह हालत तो तब है जब भारतीय संविधान साफ़तौर पर लड़कों और लड़कियों के बीच बराबरी की बात करता है। क्या सुरक्षा के नामपर लड़कियों के साथ कैदियों की तरह व्यवहार करना उचित है? बजाय इसके कि कैंपस में लड़कियों के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाया जाए। इसके उलट लड़कियों से उनकी आज़ादी ही छीन लेना कहां तक ठीक है? क्या कॉलेजों और विश्वविद्यालओं में पढ़ने वाली लड़कियों के पास यह अधिकार भी नहीं होना चाहिए कि वे फैसला कर सके कि वे कहां आ-जा सकती हैं, कब आ-जा सकती हैं। 

कैंपस में लड़कियों पर जिस सख्ती के साथ कर्फ्यू सिस्टम लागू लिया जाता है, वैसा लड़कों के साथ नहीं होता। असल में, लड़कों के लिए तो कर्फ्यू सिस्टम जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है। कर्फ्यू सिस्टम के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को कुछ इस तरीके से बंद करवाया जाता है- 10 बजे के बाद लड़कियों को लाइब्रेरी में नहीं पढ़ना चाहिए क्योंकि वहां वे सिर्फ गप्पें मारने जाती हैं, कर्फ्यू टाइम के बाद लड़कियों को कैंपस में नहीं घूमना चाहिए क्योंकि फिर वे सिर्फ शराब और सिगरेट पीती हैं।

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यही नहीं, लड़कियां कैंपस और हॉस्टल में कब क्या पहनेंगी, इसका फैसला भी कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन लेता है। उदहारण के तौर पर, लड़कियों को शॉर्ट्स पहनने नहीं दिया जाता, स्लीवलेस कपड़े पहनने नहीं दिए जाते। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इन कपड़ों के कारण प्रोफेसर्स का ध्यान उनकी तरफ जाता है, जिससे उनका ध्यान भंग होता है। सुरक्षा के नामपर इस नियंत्रण को भी सही ठहराने की कोशिश की जाती है। 

इसके अलावा, लड़कियों के हॉस्टल के चारों तरफ हमें अक्सर ऊंची-ऊंची दीवारें देखने को मिलती हैं, अधिक संख्या में सुरक्षा गार्ड तैनात होते हैं। लड़कियों को हॉस्टल की छतों पर जाने नहीं दिया जाता, खिड़कियों पर परदे लगाने के आदेश दिए जाते हैं और न जाने क्या क्या। ये सारे नियम, कायदे, कानून साफ़तौर पर कैंपस में लिंग आधारित पूर्वाग्रहों को उजागर करते हैं। ये हमारे भारतीय समाज का आइना दिखाते हैं, ये हमारे समाज की दकियानूसी सोच को उजागर करते है, जो आज भी ये मानता है कि ‘बॉयज विल बी बॉयज।’ जो आज भी यह मानता है कि आज़ादी के नाम पर लड़के अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आएंगे, अगर समझौता कोई करेगा तो वो सिर्फ लड़कियां ही करेंगी, भले ही वह समझौता उनके मौलिक अधिकारों के साथ ही क्यों न हो। यह तो वही बात हुई कि सड़क पर तो अपराधी घूमेंगे ही, आपको डर लगता है तो आप घर पर ही रहें।

                  

‘आजादी के नाम पर लड़के अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आएंगे, अगर समझौता कोई करेगा तो वो सिर्फ लड़कियां ही करेंगी, भले ही वह समझौता उनके मौलिक अधिकारों के साथ ही क्यों न हो।’

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इसके अलावा, कैंपस में लड़कियां लैंगिक हिंसा और उत्पीड़न की भी शिकार होती हैं। 2013 के कानून के बाद जब यह आदेश दिया गया कि यौन उत्पीड़न के खिलाफ होने वाली शिकायतों को हर शिक्षण संस्थान को गंभीरता से लेना है तो यह पाया गया कि इस कानून का पालन गंभीरता से नहीं हो रहा। महाराष्ट्र के नागपुर विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर ने विश्वविद्यालय के अध्यक्ष के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत की थी लेकिन अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई।          

ऐसा नहीं है कि कैंपस में सिर्फ लड़कियां ही इस भेदभाव का सामना करती हैं। महिला प्रोफेसर भी अलग-अलग प्रकार से इन पूर्वाग्रहों को झेलती हैं। उदहारण के तौर पर, रामजस कॉलेज की एक महिला प्रोफेसर के पास एक पुरुष प्रोफेसर का कॉल सिर्फ यह कहने के लिए आया कि वह स्टाफ रूम में जिस तरीके से बैठकर बातें करती हैं, ज़ोर-ज़ोर से हंसती हैं, वह पुरुषों को पसंद नहीं है। यही नहीं, अक्सर फैकल्टी के लिए होने वाले जेंडर सेंसिटिव वर्कशॉप में पुरुष प्रोफेसर हिस्सा भी नहीं लेते हैं l   

शिक्षा के इन संस्थानों में लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाला यह व्यवहार इस बात को भी साबित करता है कि पढ़े-लिखे लोग रूढ़िवादी सोच न रखें, इसकी कोई गारंटी नहीं है। शिक्षा के बढ़ते हुए स्तर से हमें ये नहीं मानना चाहिए कि लैंगिक भेदभाव खत्म हो चुका है। माना कि कॉलेजों में छात्राओं की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि अब सब ठीक हो चुका है। जब तक कर्फ्यू सिस्टम जैसे दकियानूसी पूर्वाग्रहों का अनुसरण किया जाएगा, तब तक बराबरी कभी मुमकिन नहीं हो पाएगी।     

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तस्वीर साभार: newsclick

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