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अक्सर जब हम अपने आसपास घरेलू हिंसा या शोषण होते हुए देखते हैं या उसके बारे में सुनते हैं, हमारे मन में सबसे पहले यह सवाल आता है कि पीड़िता इतने समय से यह उत्पीड़न बर्दाश्त क्यों कर रही है? वह भाग क्यों नहीं जाती या मदद क्यों नहीं मांगती? आखिर क्या ऐसी मजबूरी होगी जो वह इतना ज़ुल्म सह रही है? हमारा सवाल पूरी तरह जायज़ है। हम नहीं समझ पाते कि कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति से खुद को निकालने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा, लेकिन हम नहीं जानते कि शोषण का मानसिक प्रभाव कितना गहरा होता है। अक्सर घरेलू शोषण और हिंसा पीड़ित व्यक्ति का नज़रिया ही बदल देते हैं। पीड़ित व्यक्ति यह सोचने लगता है कि उसे उसी की किसी ग़लती की सज़ा दी जा रही है। वह जो उत्पीड़न सह रहा है वह उसी की भलाई के लिए है। उसकी नज़रों में उसका शोषण करनेवाला इंसान कभी ग़लत हो ही नहीं सकता। वह उसके लिए एक देवता बन जाता है जिसे खुश रखने के लिए शोषित व्यक्ति अपनी ज़िंदगी और अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति की बलि चढ़ा देता है। इस मानसिक प्रवृत्ति का एक नाम है: स्टॉकहोम सिंड्रोम।

‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ शब्द का निर्माण स्वीडिश मनोचिकित्सक डॉ निल्स बेयरोट ने किया था। साल 1973 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में एक बैंक डकैत ने चार बैंक कर्मचारियों को एक हफ्ते तक बंदी बनाकर रखा था। डकैत की गिरफ्तारी और कर्मचारियों को छुड़ाने के बाद देखा गया कि कर्मचारियों में से कोई भी दोषी को सज़ा दिलाने के पक्ष में नहीं था। बल्कि वे उसकी ज़मानत के लिए पैसे भी इकट्ठे करने की कोशिश कर रहे थे। अपने ही उत्पीड़क से उन्हें इस तरह का लगाव हो गया था कि वे नहीं चाहते थे कि उसके साथ कुछ बुरा हो। 

इसी तरह का ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ देखा गया है घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं में। वे उन मर्दों का बचाव करती पाई जाती हैं जो उनसे मारपीट करते हैं, उन्हें घर में बंदी बनाकर रखते हैं, उनका यौन शोषण करते हैं। अपने उत्पीड़क के बारे में वे कहती है कि वह ‘दिल का अच्छा’ है, बस कभी कभी ‘मेरी वजह से उसे गुस्सा आ जाता है’। अपनी स्थिति के लिए वे खुद को ही दोषी मानती हैं और सोचती हैं कि वे खुद को बदलने की कोशिश करें तो शोषण बंद हो जाएगा पर ऐसा कभी होता नहीं है। 

‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ होने का एक कारण यह है कि हमारे समाज में घरेलू हिंसा की पीड़िताओं के लिए विकल्प बहुत कम हैं।

मनोवैज्ञानिक डी. एल. ग्रैहम के मुताबिक एक पीड़ित महिला को ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ ग्रसित तब माना जा सकता है जब उसमें यह चार लक्षण नज़र आए :

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  • पीड़िता हर वक़्त इस डर में जीती है कि उसका पार्टनर उसे शारीरिक या मानसिक खतरा पहुंचाएगा। चाहे वह यह डर ज़ाहिर करे या न करे। 
  • पीड़िता मानती है कि उसका उत्पीड़क एक बहुत अच्छा इंसान है जो उससे बहुत प्यार करता है क्योंकि वह कभी-कभी उस पर रहम दिखाता है। जैसे कि अगर एक औरत का पति हर रोज़ उसे पीटता है मगर एक दिन पीटने के बाद उसे बाहर डिनर के लिए ले जाता है, तो वह बहुत खुश हो जाती है और खुद को भाग्यवान समझने लगती है, यह भूलकर कि उसे रोज़ शोषित होना पड़ता है। 
  • उत्पीड़क पीड़िता को बाहर की दुनिया के साथ किसी तरह के संपर्क की इजाज़त नहीं देता। उसे परिवार और दोस्तों से मिलने से मना करता है, उसके फोन और सोशल मीडिया पर नज़र रखता है और उसे अकेले घर से बाहर निकालने तक नहीं देता। ऐसे में उत्पीड़क ही पीड़िता की पूरी दुनिया बन जाता है और वह मानने लगती है कि वह जो भी कहता या करता है, वह सब सही है। इस तरह पीड़िता अपना नज़रिया, विवेक और अस्तित्व खो बैठती है। 
  • पीड़िता यह स्वीकार करती है कि उसे अपनी पूरी ज़िंदगी उत्पीड़क के साथ ही गुज़ारनी है और वह चाहकर भी उससे दूर भाग नहीं सकती, इसलिए उसे खुश रखने में ही भलाई है। 

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स्टॉकहोम सिंड्रोम पर आधारित रिश्ता कभी भी मज़बूत नहीं होता। इसमें वह खुशी, या वह सुरक्षा नहीं मिलते जो एक स्वस्थ प्रेम संबंध में मिलते हैं। इस तरह के रिश्ते की बुनियाद प्यार नहीं, डर, आतंक, और गुलामी हैं। एक ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ ग्रसित महिला का व्यवहार कुछ इस तरह का हो सकता है:

1. वह हमेशा अपने पार्टनर से डर-डरके जीती है – वह उससे अपनी भावनाएं खुलकर साझा नहीं कर सकती या उससे कोई मांग नहीं कर सकती इस डर से कि वह गुस्सा हो जाए और उस पर हिंसा करे। जैसे एक साधारण रिश्ते में हम अपने पार्टनर से खुलकर बात कर सकते हैं, ऐसे रिश्ते में पीड़िता अपने शब्द बहुत सावधानी से चुनती है ताकि उसका पार्टनर नाराज़ न हो। 

2.  वह स्वीकार नहीं करना चाहती कि उसके साथ शोषण हो रहा है – अपने पार्टनर के व्यवहार के लिए वह कई तरह के बहाने बनाती हैं। जैसे, “वो गुस्सा बहुत जल्दी हो जाते हैं”, “गलती मेरी ही थी”, या “शायद काम की वजह से उनका मूड ठीक नहीं है।” वह मानने को तैयार नहीं होती कि गलती उसके पार्टनर के स्वभाव में हो सकती है। 

3. पार्टनर को खुश रखने के लिए वह अपने शारीरिक या मानसिक हालत को अनदेखा कर देती है – अपने पार्टनर की हर ज़रूरत पूरी करने में वह इतनी व्यस्त हो जाती है कि अपने आप पर ध्यान नहीं दे पाती है। इस तरह वह एक तरह से अपने पार्टनर की गुलाम बन जाती है और खुद की ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ करके उसे खुश करने में लगी रहती है। 

4. वह अपने शुभचिंतकों को अपना दुश्मन समझती है – वह हर चीज़ अपने उत्पीड़क पार्टनर के नज़रिये से ही देखती है, वह उन्हीं लोगों को खुद से दूर कर देती है जो उसका भला चाहते हैं। अगर कोई दोस्त या परिजन उसे समझाने की कोशिश करे कि उसका शोषण हो रहा है, वह उन पर उसका घर तोड़ने का आरोप लगाती है। यहां तक की अगर कोई उसके पार्टनर के बारे में पुलिस में शिकायत भी करे तो वह अपने पार्टनर का ही बचाव करती है। 

5. डिप्रेशन या तनाव जैसे मानसिक लक्षण नज़र आते हैं। शोषण सहना एक इंसान को मानसिक तौर पर पूरी तरह खत्म कर देता है। मानसिक स्वास्थ्य पर इसका बहुत बड़ा असर होता है। पीड़िता में डिप्रेशन, ऐंगज़ाइटी, पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर (पीटीएसडी) इत्यादि के लक्षण नज़र आ सकते हैं। 

‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ होने का एक कारण यह है कि हमारे समाज में घरेलू हिंसा की पीड़िताओं के लिए विकल्प बहुत कम हैं। खासकर भारत में शादी के बाद एक औरत का वापस मायके में आने को अच्छा नहीं माना जाता। यहां औरतों को सिखाया जाता है कि पति चाहे कैसा भी हो, उसका हर व्यवहार सह लेना ज़रूरी है। तलाक को अभी भी एक बुरा शब्द समझा जाता है और इसकी प्रक्रिया भी बहुत लंबी और जटिल है। ऊपर से पुलिस भी विश्वसनीय नहीं है और कई बार पुलिस और अदालत पीड़िता को ही दोषी ठहरा देते हैं। इसी वजह से औरतें शोषण के साथ जीना सीख लेती हैं, उसे जीवन का एक आम हिस्सा समझ लेती हैं और स्टॉकहोम सिंड्रोम का शिकार हो जाती हैं। 

स्टॉकहोम सिंड्रोम से उभरना बहुत मुश्किल है पर काउंसलिंग और चिकित्सा के ज़रिए यह संभव है। उम्मीद है भविष्य में हिंसा से पीड़ित महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ज़्यादा से ज़्यादा संसाधन उपलब्ध होंगे ताकि उन्हें मदद मिल सके और स्टॉकहोम सिंड्रोम का सामना न करना पड़े।

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तस्वीर साभार : thenational

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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