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हमारे समाज में हिंसा शब्द तो महिलाओं के साथ इस तरह जोड़ दिया गया है कि इसके बिना किसी महिला के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती क्योंकि औरतों ने अपने पूरे जीवन में कभी न कभी किसी मोड़ पर हिंसा का सामना किया है, ये वह सच है जिसे बदला नहीं जा सकता। घरेलू हिंसा के मामले तो पहले भी सामने आते रहे हैं लेकिन कोरोना वायरस के कारण पूरे देश में लॉकडाउन लागू हो जाने के बाद से घरेलू हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। देश में लॉकडाउन लागू होने के कारण घरेलू हिंसा की घटनाएं काफी बढ़ गई क्योंकि महिलाओं को घरों में उन लोगों के साथ ज्यादा समय तक रहना पड़ रहा है जिनके द्वारा वे प्रताड़ित की जाती हैं।

लॉकडाउन के दौरान कहीं लड़की को शादी के लिए परिवार वालों के मजबूर किए जाने की शिकायत सामने आई हैं तो कहीं पति और ससुराल वालों के किए जा रहे घरेलू उत्पीड़न की आपबीती सुनने में आई। ये सिर्फ वे शिकायतें हैं जो महिला आयोग तक पहुंची हैं बाकी के मामलों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साल 2015-16 के बीच हुए 6 लाख परिवारों की करीब 7 लाख महिलाओं के बीच कराए गए एक सर्वे के अनुसार लगभग 31 फीसद महिलाएं घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी। 4 फीसद महिलाओं को तो गर्भावस्था के दौरान भी हिंसा का सामना करना पड़ा। सरकारी आंकड़ों से एक बात तो उजागर होती है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ बड़े पैमाने पर घरेलू हिंसा एक वास्तविकता है लेकिन सबसे दुखद यह है कि ज्यादातर मामलों में डर और परिवार वालों की इज्जत के कारण इसकी शिकायत भी दर्ज नहीं होती है।

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लॉकडाउन के दौरान बढ़ते घरेलू हिंसा को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने हिंसा से पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए एक वॉट्सऐप नंबर भी जारी किया था। वर्क फ्रॉम होम की नई संस्कृति के कारण इस लॉकडाउन में कामकाजी महिलाओं पर दोहरा दबाव पड़ा है। एक तो उन पर घरेलू कामों का बोझ बढ़ा और दूसरा उन्हें घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ा। राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार लॉकडाउन के पहले ही सप्ताह में करीब 250 शिकायतें दर्ज की गई जिनमें सबसे अधिक शिकायतें उत्तर प्रदेश से आई थी। इसी के साथ 25 दिनों के भीतर में इन आंकड़ों में 95 फीसद का इज़ाफा हुआ।

आंकड़े इस बात का सबूत हैं कि घर पर मौजूद हिंसक पुरुष अपनी सारी भड़ास महिलाओं पर निकालने के आदी हैं जिसका इस्तेमाल वे उस समय करते है जब उनके पास काम न हो या फिर किसी कारण वे घर पर मौजूद हो। इन घरेलू हिंसा के मामलों को देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग ने यह कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की समीक्षा की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले ही साल घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की दोबारा व्याख्या की जिसके तहत घरेलू हिंसा के किसी भी मामले में समानता और जीवन के अधिकार की रक्षा को शामिल किया गया।

महिलाओं के प्रति हो रहे इन घरेलू हिंसा के कारणों की तरफ गौर करें तो इनमें सबसे प्रमुख कारण है समाज में यह मानसिकता होना कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में शारीरिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं। दहेज का लालच इसका दूसरा प्रमुख कारण हैं क्योंकि आज भी लड़कियां समाज पर एक बोझ हैं। प्रथाओं के अनुसार लड़की की शादी में दहेज देना मामूली बात है लेकिन कई बार ससुराल की तरफ से दहेज के प्रति संतुष्टि न होना और बार-बार ज्यादा दहेज के लिए प्रताड़ित करना भी घरेलू हिंसा का बड़ा कारण बन जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में पत्नी द्वारा पति के साथ बहस करना भी पति का अपमान माना जाता है। इसी के साथ ही यौन संबंध बनाने से इनकार करना, बिना बताए घर से बाहर जाना घरेलू हिंसा के अन्य कारणों में से एक है। कुछ मामलों में महिलाओं में बांझपन भी परिवार के सदस्यों का उनपर हमले का कारण बनता है क्योंकि बिना मां बने एक स्त्री को अधूरा माना जाता है।

महिलाओं के प्रति हो रहे इन घरेलू हिंसा के कारणों की तरफ गौर करें तो इनमें सबसे प्रमुख कारण है समाज में यह मानसिकता होना कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में शारीरिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होती हैं।

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घरेलू हिंसा से डर से महिलाओं का बाहर आ पाना बहुत मुश्किल होता है। मनोवैज्ञानिक तौर पर इस प्रकार की हिंसा से दिमाग में नकारात्मकता अधिक पैदा होती है। साथ ही अपनी पुरानी जीवनशैली में दोबारा लौटने में कई साल भी लग जाते हैं। लगातार इस तरह की हिंसा से महिलाएं अपना संतुलन खो बैठती हैं या फिर अवसाद का शिकार हो जाती हैं। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा में सबसे ज्यादा दुख की बात यह है कि जिसके साथ उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताने का फैसला किया होता है, जिन पर वे सबसे अधिक भरोसा करती है उनसे ही प्रताड़ित होती हैं। यह तो उस भरोसे को धोखे में बदलने के समान है जिस पर रिश्ते की नींव टिकी होती है क्योंकि एक घर ही था जहां लड़कियों, महिलाओं को सबसे सुरक्षित माना जाता था।

घरेलू हिंसा का समाधान सिर्फ कानून बनाने से नहीं बल्कि मर्दानगी की मानसिकता में बदलाव से होगा। स्त्री वर्ग को हीन भावना से देखना, उन्हें किसी काबिल न समझना जैसी सोच में परिवर्तन की जरूरत है। इन हिंसाओं में कई बार तो एक महिला ही महिला पर हिंसा के लिए उतारू हो जाती है इसका कारण वो रूढ़िवादी विचारधारा है जिसके दम पर एक महिला दूसरी महिला पर हिंसा का साहस जुटा पाती है। इसलिए जरूरत है इस विचारधारा को भी जड़ से खत्म कर देने की। आखिर इस आधुनिक दौर में नकारात्मक मानसिकता का क्या काम? महिला कोई खूंटे से बंधी गाय तो नहीं जिस पर जब मन किया प्यार बरसा दिया और जब मन किया दुत्कार दिया। स्त्री को देवी की तरह पूजने वाले इस समाज में ये देवियां ही है जो सबसे अधिक शोषित है और इन्हें शोषित करने वाले लोग भी वही है जो कई विशेष मौकों पर इन्हें पूजते है।

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तस्वीर साभार : Feminism In India

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