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बहुत कम ऐसी फ़िल्में हैं जिन्होंने हमारे समाज में फैले जातिगत भेदभाव और व्यवस्था का सटीक चित्रण किया है। जाति और जातिगत भेदभाव हमारे समाज की एक बहुत क्रूर सच्चाई है, जिसका सामना करने से हम आज भी करते आ रहे हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री, जहां बाकी के समाज की तरह ही तथाकथित ऊंची जातियों का वर्चस्व है, इस मुद्दे पर आमतौर पर आलोचना नहीं करता और मुख्यधारा की फ़िल्मों में अक्सर निर्माता की जातिवादी मानसिकता नज़र आ जाती है। इसके बावजूद भारतीय सिनेमा में कुछ बेहतरीन फ़िल्में बनी हैं जिन्होंने जातिगत भेदभाव की घिनौनी सच्चाई हमारी आंखों के सामने उजागर की है और हमें इस पर सोचने के लिए मजबूर किया है। यहां हम बात करेंगे वर्तमान समय में हिंदी, तमिल और मराठी जैसी भारतीय भाषाओं में बनी कुछ चुनिंदा फ़िल्मों की जो इस सामाजिक सत्य का सामना करने में हमारी मदद करती हैं।

1. मसान (2015)

फ़िल्मकार नीरज घेवाण की फ़िल्म ‘मसान’ की कहानी वाराणसी की पृष्ठभूमि पर बनी है। फ़िल्म में दीपक (विकी कौशल) और शालू (श्वेता त्रिपाठी) की आपस में दोस्ती हो जाती है जो बाद में प्रेम संबंध में बदल जाता है। शालू तथाकथित ऊंची जाति की है जहां दीपक एक ‘डोम’ परिवार से आता है। ‘डोम’ एक अनुसूचित जाति है जिसके लोग श्मशान घाट में रहते हैं और लाशों का अंतिम संस्कार करके अपना गुज़ारा करते हैं। क्या दीपक और शालू जाति और छुआछूत की पाबंदियों को लांघकर अंत तक साथ रहे पाते हैं? इसका जवाब फ़िल्म ही दे सकती है।

‘मसान’ जातिगत भेदभाव का एक सटीक चित्रण होने के साथ एक बेहद यादगार प्रेम कहानी भी है। खूबसूरत निर्देशन, शानदार अभिनय, और बेहतरीन संगीत के साथ यह फ़िल्म दर्शक को अंदर तक झकझोर कर रख देती है और देर तक याद रहती है।

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2. मुक्काबाज़ (2018) 

अनुराग कश्यप की यह फ़िल्म खेलकूद की दुनिया में जातिगत भेदभाव पर रोशनी डालती है। कहानी है एक दलित बॉक्सर, श्रवण कुमार (विनीत कुमार सिंह) की, जो हर रोज़ अपने कोच और स्थानीय बॉक्सिंग फेडरेशन संचालक, भगवान दास मिश्र (जिमी शेरगिल) के हाथों अपमानित होता है और उनकी वजह से अपने करियर में आगे बढ़ने के अवसरों से वंचित रह जाता है। किस तरह श्रवण कुमार हर तरह की सामाजिक बाधाओं के रहते एक बॉक्सर के तौर पर ख्याति कमाता है और भगवान दास मिश्र को मुंहतोड़ जवाब देता है, यह फ़िल्म उसी की कहानी है।

‘मुक्काबाज़’ फ़िल्म जातिवाद के साथ सांप्रदायिकता, हिंसक राष्ट्रवाद, बीफ़ पर राजनीति और मॉब लिंचिंग जैसे समसामयिक मुद्दों पर भी चर्चा करने से बिल्कुल नहीं कतराती। यह फ़िल्म आज के भारत पर एक कठोर टिप्पणी है। 

3. सैराट (2016)

नागराज मंजुले की मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ कहानी है अर्चना उर्फ़ अर्ची (रिंकू राजगुरु) और प्रशांत उर्फ़ पर्श्या (आकाश ठोसर) की। महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में रहनेवाले यह दो कॉलेज के सहपाठी एक दूसरे से प्यार कर बैठते हैं और शादी करने का फ़ैसला करते हैं। यह प्यार उनके गांववाले हज़म नहीं कर पाते, खासकर आर्ची के प्रभावशाली और ताकतवर पिता और भाई, जो उसे तथाकथित नीची जात के लड़के के साथ देखना बर्दाश्त नहीं कर सकते। आगे आगे क्या होता है यह फ़िल्म बताती है। 

‘सैराट’ को पिछले दशक की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक फ़िल्मों में से एक माना जाता है। इसे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से नवाज़ा गया है और इसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रशंसा हुई है। यह फ़िल्म ‘धड़क’ नाम से हिंदी में भी बनाई गई है। शशांक खैतन द्वारा निर्मित ‘धड़क’ में मुख्य किरदार ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर ने निभाए हैं। 

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4. कोर्ट (2015)

‘कोर्ट’ फ़िल्मकार चैतन्य ताम्हणे की पहली और इकलौती फ़िल्म है। मराठी में बनी यह फ़िल्म एक ‘कोर्टरूम ड्रामा’ है, यानी एक ऐसी फ़िल्म जिसकी कहानी एक अदालत के  मामले पर केंद्रित हो। यह फ़िल्म कहानी बताती है एक दलित लोकगीत गायक और शिक्षक, नारायण कांबले (वीरा साथीदार) की, जिन्हें उनके गाने के बोलों के लिए कटघरे में खड़ा किया जाता है। उन पर इल्ज़ाम यह लगाया जाता है कि उनके गानों ने एक दिहाड़ी मज़दूर को आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित किया है। वरिष्ठ गायक यह स्वीकार ज़रूर करते हैं कि उन्होंने आत्महत्या के बारे में गाने गाए हैं, पर अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वे यही साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं कि उन्होंने जान-बूझकर कभी भी आत्महत्या को बढ़ावा नहीं दिया। 

फ़िल्म के अंत में जब मृत व्यक्ति की विधवा उसकी मौत का असली कारण बताती है, हमारे समाज का एक क्रूर सत्य हमारी आंखों के सामने प्रकट होता है। कोर्ट जातिवाद पर ही नहीं, हमारे देश की कानून व्यवस्था पर भी एक टिप्पणी है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसकी खूब प्रशंसा हुई है। 

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5. असुरन (2019)

फ़िल्मकार वेट्रीमारन की तमिल फ़िल्म ‘असुरन’ एक साधारण किसान शिवस्वामी (धनुष) और उसके परिवार के जीवन की कहानी है। गांव के बाहुबली नरसिंहन की नज़र शिवस्वामी की ज़मीन पर है, जिस पर वह अपनी खेती करना चाहता है। क्या शिवस्वामी अपनी ज़मीन और अपने परिवार को नरसिंहन के ख़तरे से बचा पाता है? ‘असुरन’ कमज़ोर दिल वालों के लिए नहीं है। जातिवादी हिंसा और जातिगत भेदभाव का वीभत्स रूप इसके एक एक दृश्य में प्रकट होता है। यह फ़िल्म आत्मा को विचलित करके रख देती है।

6.  परियेरुम पेरुमल (2018)

मारी सेल्वराज की तमिल फ़िल्म ‘परियेरुम पेरुमल’ शैक्षणिक संस्थाओं में जातिवाद पर रोशनी डालती है। मुख्य किरदार परियेरुम पेरुमल उर्फ़ परियन (कातिर) लॉ की पढ़ाई करने एक बड़े कॉलेज में भर्ती होता है, जहां शिक्षकों और सहपाठियों के हाथों उसका अपमान और तिरस्कार हमें दिखाता है किस तरह जातिवाद उसके छोटे से गांव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हमारे बड़े-बड़े संस्थानों में भी कूट-कूटकर भरा हुआ है।

यह फ़िल्म हर उस व्यक्ति को देखनी चाहिए जिसे लगता है शैक्षणिक संस्थाओं में जातिवाद का अस्तित्व नहीं है और वहां सब बराबर हैं। यह फ़िल्म उन तथाकथित प्रगतिशील लोगों को एक करारा जवाब है, जिन्हें जाति ‘नज़र नहीं आती’।

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तस्वीर साभार : गूगल

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