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कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया की व्यवस्था को चरमरा दिया। आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक से लेकर व्यक्तिगत स्तर पर भी इस महामारी का कुप्रभाव देखने को मिला और ये सिलसिला लगातार जारी है। भारत में स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस महामारी के कुप्रभाव को कम करने में कई स्तरों पर युद्धस्तर पर काम किया। कभी सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर तो कई बार सरकार से भी ज़्यादा अहम भूमिका अदा की। फिर बात चाहे लॉकडाउन के दौरान ज़रूरतमंद परिवारों तक राहत सामग्री पहुंचाने की हो या फिर मानसिक स्वास्थ्य के लिए हेल्पलाइन नम्बर और फ़्री काउन्सलिंग की सुविधा देने की हो, स्वयंसेवी संस्थाओं के सफ़ल प्रयासों की जितनी सराहना की जाए कम है।

लेकिन जब हम कोरोना राहत कार्य में किए गये प्रयासों का नारीवादी नज़रिए से विश्लेषण करते है तो इनमें अक्सर पितृसत्तात्मक विचारधारा को हावी पाते हैं, जिसकी राहत सामग्री और राहत कार्य योजना दोनों को ही पितृसत्तात्मक सोच के अनुसार तैयार किया गया। यानी वो राहत कार्य जिसमें महिलाओं और एलजीबीटीआइक्यू+ के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए कोई जगह नहीं थी। मैं ख़ुद भी लॉकडाउन के दौरान राहत कार्य का हिस्सा रही और महामारी के इस दौर में राहतकार्य की रूपरेखा और इसके क्रियान्वयन में मैंने पितृसत्तात्मक वैचारिक को बेहद क़रीब से देखा और आज का मेरा यह लेख मेरे इन्हीं अनुभवों पर आधारित है।

राहत सामग्री से नदारद ‘महिला स्वास्थ्य’

कोरोना महामारी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में हम लोगों ने कुछ स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर राहतकार्य की शुरुआत की। ये संस्थाएं बीते कई सालों से महिलाओं और किशोरियों के साथ समूह में काम कर रहे है। पर जब राहत कार्य के दौरान गांव में समूह से जुड़ी गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के माहवारी प्रबंधन को राहत सामग्री में शामिल करने की बात आयी तो सभी को ये कम ज़रूरी या यूं कहें कि फ़ालतू जैसा लगने लगा। महिलाओं और किशोरियों के साथ काम करने वाले महिला-पुरुष फ़ील्ड वर्कर ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए। उल्लेखनीय है कि ऐसी ढेरों संस्थाएं हैं जो आम दिनों में माहवारी और गर्भवती महिलाओं को पौष्टिक आहार व सेनेटरी पैड उपलब्ध करवाने के लिए करोड़ों के प्रोजेक्ट और अख़बार की सुर्ख़ियां बटोरते आ रहे हैं, लेकिन आपदा के समय इन्हें यही विषय कम ज़रूरी लगने लगे और उन्हीं समुदायों के लिए इनके हाथ खड़े होने लगे। नतीजतन राहत सामग्री में माहवारी प्रबंधन और गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य शामिल नहीं किया गया।

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दारू के ठेके खुलते ही ‘अनलॉक हिंसा’ पर ‘बंद आँखें’

भारत में क़रीब दो महीने के अधिक के लॉकडाउन में सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के हवाले से अनलॉक की प्रक्रिया में सबसे पहला द्वार शराब के ठेकों का खोला गया। गांव में शराब के चलते महिला हिंसा का स्तर और इसका स्वरूप बेहद हिंसात्मक देखने को मिलता है। ऐसे में लॉकडाउन के दौरान हमने यह पाया कि शराब की वजह से कई परिवारों में घरेलू हिंसा हुआ करती थी वहां काफ़ी सुधार होने लगे थे। जिदंगी धीरे-धीरे रास्ते पर आ रही थी लेकिन शराब के ठेके खुलते ही हिंसा का वही वीभत्स अध्याय दोबारा खुल गया और घरेलू हिंसा का दौर फिर से शुरू हुआ।

जब हम कोरोना राहतकार्य में किए गये प्रयासों का नारीवादी नज़रिए से विश्लेषण करते है तो इनमें अक्सर पितृसत्तात्मक विचारधारा को हावी पाते हैं।

लेकिन तब तक सरकार के लिए लॉकडाउन का पालन और संस्थाओं के लिए राहतसामग्री मानो उनके काम के पर्याय बन चुके थे, ऐसे में बहुत सी लड़कियां और महिलाओं ने घरेलू हिंसा के चलते अपनी जान गंवाई और ढेरों मानसिक और शारीरिक यातनाएं सही, पर ये सब सरकार और संस्था के लिए ज़रूरी मुद्दा नहीं था। कई बार जब पुलिस स्टेशन में शिकायत की कोशिश की जाती तो कोरोना ड्यूटी के नाम पर पुलिस की अनुपस्थिति तो कभी ‘ये तो रोज़ की कहानी है’ कहकर टाल दिया जाता। वहीं संस्थाओं के लिए राहतकार्य में व्यस्तता वरीयता रही। अपने ही ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती हुई घरेलू हिंसा से मानो इनका कोई लेना-देना नहीं था। ऐसा नहीं है कि देश की सभी संस्थाओं का यही हाल था, लेकिन हां, गांव में काम करने वाली संस्थाओं के साथ मेरा अनुभव यही था।

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मौजूदा समय में सीधेतौर पर भले ही अपनी पितृसत्तात्मक सोच और कार्यप्रणाली को ढकने के लिए संस्थाएं जेंडर, यौनिकता, पीरियड और लैंगिक समानता जैसे शब्दों का इस्तेमाल पर्दे की तरह अपनी सोच ढकने में करें, लेकिन आपदा के अवसर पर पितृसत्ता का ये चेहरा बखूबी उजागर हुआ है। आख़िर ये पितृसत्तात्मक सोच ही तो है जिसने राहत सामग्री में महिला स्वास्थ्य को सीधेतौर पर दरकिनार कर दिया और यही हमारे समाज की सच्चाई भी है। जैसे कोई सरकार या संस्था किसी विषय को तब तक अपने काम में रखती है जब तक उस मुद्दे से उसे आर्थिक लाभ मिलता है लेकिन जैसे ही काम के दायरे बढ़ते है तो हमारी मूल पितृसत्तात्मक वैचारिकी हमपर हावी हो जाती है।

हमें समझना होगा कि ये कोई आयी बात और गई बात वाली बात नहीं है, क्योंकि महामारी के दौरान पौष्टिक आहार के अभाव में कितनी महिलाओं और नवजात शिशु ने प्रसव के दौरान दम तोड़ा,  कितनी किशोरियां सेनेटरी पैड के अभाव में इंफ़ेक्शन का शिकार हुई और कितने एलजीबीटीआइक्यू+ समुदाय से जुड़े लोगों ने मानसिक और शारीरिक समस्याओं के चलते जानलेवा बीमारियों के शिकार हुए, इसका कोई लेखा-जोखा तैयार नहीं किया गया। पर हां, अगर इसे तैयार किया जाएगा तो पितृसत्तात्मक वैचारिकी के तहत तैयार की गई राहत कार्य की योजना के पितृसत्तात्मक पहलू सामने होंगे क्योंकि वास्तव में पितृसत्तात्मक सोच से तैयार किए गए इस राहत कार्य ने अन्य जेंडर की बजाय पुरुष और भूख को राहत पहुंचाने वाला अधूरा राहत कार्य किया। इसलिए ज़रूरी है कि सिर्फ़ बात, सोशल मीडिया स्टेट्स, प्रोजेक्ट का शीर्षक और भाषणों में नारीवाद नहीं बल्कि इसे अपने वैचारिकी और व्यवहार में लागू किया जाए। बाक़ी बाज़ार के उत्पाद से पितृसत्तात्मक सोच को चंद समय तक छुपाया जा सकता है, लेकिन इसके कुप्रभावों को कम नहीं किया जा सकता है। इसलिए वैचारिकी के साथ-साथ नारीवादी वैचारिकी से काम करने वाली महिला व एलजीबीटीआइक्यू+ समुदाय के नेतृत्व वाली संस्थाओं और उनके प्रयासों को भी प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार : sendika63

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