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8 मई की सुबह महाराष्ट्र से औरंगाबाद के बीच रेल की पटरियों पर सूखी रोटियां पड़ी थी, कपड़े बिखरे थे, मास्क भी बिखरे पड़े थे और इसके साथ ही बिखरी हुई थी 17 मजदूरों की लाशें जो अपने घर जा रहे थे। इन्हें मध्य प्रदेश जाना था, रास्ते में थककर ये मजदूर रेलवे ट्रैक के पास सुस्ताने लगे और 17 मजदूर मालगाड़ी के नीचे आ गए। ये मजदूर घर जाना चाहते थे लेकिन घर जाने के बदले इन्हें मौत मिली। मर चुके इन मजदूरों से देश के एक संवेदनहीन वर्ग ने पूछा, इतने क्या थक गए थे जो रेलवे ट्रैक पर ही सो गए? ठीक एक हफ्ते बाद उत्तर प्रदेश के औरैया में ट्रकों में बोरियों की तरह भरकर जा रहे 24 मजदूर सड़क दुर्घटना की चपेट में आकर मारे गए। ये तो महज़ कुछ घटनाएं हैं जहां प्रवासी मजदूर बेमौत मारे गए। अपने-अपने घरों को निकले कितने प्रवासी मजदूरों अब तक मारे जा चुके हैं इसका कोई आंकड़ा हमारे सामने नहीं है।

अपने माता-पिता के साथ जन्म से ही दिहाड़ी मजदूर का जीवन जी रही आठ साल की बच्ची अपने लहुलुहान पैरों से लड़खड़ाती चली जा रही है। 16 साल का लड़का साइकिल से दिल्ली से बिहार जाने के लिए निकला है। रिपोर्टर के पूछने पर कि क्या हुआ फूट-फूटकर रो पड़ता है। टिकट मिलने की आस में, अलग-अलग राज्यों की सीमाओं पर पुलिस की लाठी खाते मजदूर। ऐसी लाखों कहानियां इस वक्त भारत की सड़कों पर हैं चलते-फिरते इंसानों के रूप में। 

लॉकडाउन के दौरान भारत सरकार का मजदूरों के प्रति अब तक का सबसे अमानवीय चेहरा सामने आया है। इस महामारी ने भारत के सिस्टम की परतें उधेड़कर रख दी हैं। लाखों प्रवासी मजदूर अभी भी सड़कों पर हैं। पैदल निकले कुछ मजदूर घर पहुंच चुके हैं तो कुछ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। लॉकडाउन के 40 दिनों बाद केंद्र सरकार ने मजदूरों के लिए श्रमिक ट्रेन चलवाई। कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि अपना रोज़गार खो चुके मजदूरों से ट्रेन और बसों का किराया लिया गया। बतौर देश हमने अपनी आबादी के एक बड़े हिस्से को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया। लॉकडाउन के करीब दो महीने बाद भी अपने घरों के लिए पैदल निकले मजदूरों का जत्था यही बताता है कि उन्हें सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है। सरकार कह रही है कि वह मजदूरों के लिए चिंतित है, उन्हें राहत पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि ये कोशिश मजदूरों की पीड़ा के सामने एक घटिया मज़ाक जैसी प्रतीत हो रही है। 

इस अमानवीय व्यवहार के बाद अब मजदूरों से उनके बुनियादी हक भी छीन लिए गए हैं। बतौर इंसान उनकी न्यूनतम गरिमा का भी ख्याल नहीं रखा जा रहा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें उद्योग जगत को राहत पहुंचाने के नामपर श्रम कानूनों में बदलाव कर रही हैं।

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मध्य प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा में श्रम कानूनों को बदल दिया। इन राज्यों में श्रम कानूनों के बदलाव में कुछ बातें तो बिल्कुल सामान्य हैं। जैसे- न राज्यों में अब काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिए गए हैं, न्यूनतम मजदूरी से जुड़े नियम हटा दिए गए हैं, श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देने के लिए अब कंपनियां बाध्य नहीं हैं, कंपनियां अपनी मर्जी से कर्मचारियों को काम पर रख और निकाल सकती हैं। हायर एंड फायर का नियम अब और क्रूरता के साथ लागू किया जाएगा। श्रमिक संगठनों की भूमिका नगण्य कर दी गई है। कुल मिलाकर ये कि अब उद्योग जगत को मजदूरों के शोषण की खुली छूट दे दी गई है। केंद्र सरकार ने आदेश जारी किया था कि लॉकडाउन के दौरान सभी कर्मचारियों को पूरा वेतन देना अनिवार्य होगा। अब केंद्र सरकार ने वह आदेश भी वापस ले लिया है।

योगी सरकार के फैसले के मुताबिक उत्तर प्रदेश में अब श्रमिकों से जुड़े सिर्फ़ तीन क़ानून ही लागू होंगे।  भवन और निर्माण श्रमिक क़ानून, बंधुआ मज़दूरी विरोधी क़ानून और श्रमिक भुगतान क़ानून की पांचवीं अनुसूची। हालांकि योगी सरकार ने बाद में काम के घंटे बढ़ाकर 8 से 12 करने के अपने फैसले को वापस ले लिया है।

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मध्य प्रदेश में श्रम कानून में हुए बदलाव के मुताबिक अब श्रमिकों को बुनियादी जरूरतें मुहैया करवाना मालिक की जिम्मेदारी नहीं रह जाएगी। काम करने की जगह गंदी होने, शौचालय न होने, हवादार न होने पर मालिकों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। ऐसी स्थिति में काम करने को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। कंपनी की ईकाइयों का सरकारी सर्वेक्षण नहीं होगा। महिलाओं और बच्चों के लिए अलग से इंतजाम नहीं करने होंगे। ये महज कुछ उदाहरण हैं जिसके तहत मध्य प्रदेश में श्रमिकों को बंधुआ मजदूरी की ओर ढकेला जा रहा है। इसी तरह पंजाब सरकार ने भी अपने न्यूनतम मजदूरों को बढ़ाने के फैसले को वापस ले लिया है। इसके पीछे पंजाब सरकार ने कोरोना वायरस को जिम्मेदार ठहराया है।

22 मई को देश के कई बड़े श्रमिक संगठनों ने श्रम कानून में हुए बदलाव के खिलाफ प्रदर्शन भी किया। इसके साथ ही उम्मीद जताई जा रही है कि श्रमिक संगठन इसके खिलाफ अदालत का रुख़ भी कर सकते हैं लेकिन न्याय की हम बस उम्मीद ही लगा सकते हैं।

अब मजदूरों से उनके बुनियादी हक भी छीन लिए गए हैं। बतौर इंसान उनकी न्यूनतम गरिमा का भी ख्याल नहीं रखा जा रहा। केंद्र सरकार और राज्य सरकारें उद्योग जगत को राहत पहुंचाने के नामपर श्रम कानूनों में बदलाव कर रही हैं।

महामारी की आड़ में और विकास के नामपर मजदूरों को एक लोकतंत्र में गुलाम बना दिया गया है। श्रम कानूनों को स्थगित करना, उनमें बदलाव करना श्रमिकों के जीवन के अधिकार को छीनने के बराबर है। कोरोना के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि अगर हमने लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं किया तो देश कई साल पीछे चला जाएगा। लेकिन श्रम कानूनों में बदलाव करके देश को फिर से सरकार गुलामी की ओर ले जा रही है। काम के आठ घंटे के लिए सालों साल संघर्ष हुआ उसे खत्म करने में सरकारों को कुछ घंटे भी नहीं लगे। वह भी तब जब आमतौर पर भारत में पहले से ही श्रमिक आठ घंटे से ज्यादा ही काम कर रहे थे। अब बारह घंटे आधिकारिक हुए हैं तो कंपनियां उसे बढ़ाकर चौबीस  घंटे भी कर दें शायद। इस पूंजीवादी व्यवस्था में पहले से ही शोषित मजदूरों को आधिकारिक रूप से बंधुआ मजदूर बनाने की ओर ये पहला कदम है। खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले देश अपने देश के 90 फीसद कामगारों को बंधुआ मजदूर बनाने पर तुला हुआ है। उस उद्योग जगत के लिए ये अधिकार खत्म किए गए हैं जो लॉकडाउन के दौरान मजदूरों को एक महीने तक की तनख्वाह भी नहीं दे पाया। इस पूंजीवादी व्यवस्था के लिए मजदूर शुरू से ही हाड़-मांस के वो लोथड़े रहे हैं जिनकी बुनियाद पर वे मुनाफा लूटते आए हैं। 

मार्क्स के सिद्धांत का एक अहम पहलू है- अतिरिक्त मूल्य मतलब वह मूल्य जो मज़दूर अपनी मज़दूरी के अलावा पैदा करता है। अतिरिक्त मूल्य को हम आसान शब्दों में पूंजीवादी व्यवस्था का मुनाफा कह सकते हैं और इसी मुनाफे के लिए सर्वहारा वर्ग का लगातार शोषण किया जाता रहा है। लॉकडाउन के चौथे चरण में अब धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियां शुरू हो रही हैं। अब दलील दी जा रही है कि मजदूरों को अब रुक जाना चाहिए क्योंकि कारखानों में अब उनकी जरूरत है। यहां श्रमिकों से उनके घर जाने का अधिकार भी छीन लिया गया है। पूंजीवाद ने मजदूरों को पहले ही न्यूनतम अधिकारों और बुनियादी जरूरतों के साथ रहना सिखाया गया। अब उनसे उनके इंसान बने रहने का भी हक छीना जा रहा है। 

ईरानी कवि सबीर हका जो खुद एक मजदूर हैं उनकी एक कविता है –

क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहाँ गिरता है, उतनी ज़मीन पर
उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है।
गिरने से ज़्यादा
पीड़ादायी कुछ नहीं।
मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए

भारत की सरकारें श्रम कानून में बदलाव कर देश के हर श्रमिक को शहतूत बनते देखना चाहती हैं।

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तस्वीर साभार : रामकिंकर कुमार

Ritika is a reporter at the core. She knows what it means to be a woman reporter, within the organization and outside. This young enthusiast has been awarded the prestigious Laadli Media Awards and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing. Ritika is biased.

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