नारीवाद का दूसरा चरण: सेकंड वेव ऑफ़ फेमिनिज़म का इतिहास
नारीवाद का दूसरा चरण: सेकंड वेव ऑफ़ फेमिनिज़म का इतिहास
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यह वह दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध ख़त्म हो चुका था। लोग वापस अपनी पहले की ज़िन्दगी की ओर लौट रहे थे। वे पुरुष जिन्हें युद्ध के दौरान सेना में शामिल होने के लिए अपनी नौकरी छोड़ने को मजबूर होना पड़ा था वे भी अपने काम की ओर लौट रहे थे। युद्ध के दौरान विभिन्न पदों पर काम कर रही महिलाओं को काम से निकालने और वापस घर की चारदीवारी में कैद करने का सिलसिला शुरू हो गया था। महिलाओं को काम से निकालकर पुरुषों को नौकरी दी जा रही थी। 1960 के अमेरिका की सामाजिक स्थिति कुछ इस प्रकार थी कि महिलाओं से यह अपेक्षा की जा रही थी कि वे वापस अपने घर और बच्चों को संभालने की ज़िम्मेदारी को निभाने की ओर लौट जाएं। वे महिलाएं जो थोड़ी बहुत आज़ादी थी उसके तहत उन्हें शिक्षिका, नर्स या फिर सेक्रेटरी की नौकरी तक सीमित कर दिया गया था। यही कारण है कि क़रीब 38 प्रतिशत अमेरिकी कामकाजी महिलाएं इन्हीं पदों पर कार्यरत थी। उनसे यह उम्मीद की जा रही थी कि वे हफ्ते के सातों दिन घर के काम करने में लगा दें। मगर विश्व युद्ध के दौरान महिलाओं ने घर के बाहर आकर काम करना शुरू कर दिया था इसलिए अब वे घरेलू महिला की भूमिका में वापस नहीं लौटना चाहती थी। यही द्वंद्व साल 1960 से 1980 के बीच में नारीवादी आंदोलन के दूसरी लहर यानी सेकेण्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज्म का करण बना।

नारीवादी आंदोलन की पहली लहर जहां अबोलिशन आंदोलन से प्रभावित थी। वहीं, यह नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर 1950 के दशक के मध्य में हुए अमेरिकन सिविल राइट मूवमेंट से प्रभावित थी। दूसरी लहर में महिलाओं के प्रजजन अधिकार, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर सुरक्षा जैसे मुद्दे मुख्य रूप से उठाए गए थे। दरअसल यह आंदोलन दशकों से चल रहे नस्लीय उत्पीड़न और गुलामी प्रथा के खिलाफ उपजा था। हम जानते हैं कि इसी आंदोलन के बाद हुए गृहयुद्ध के परिणामस्वरूप अमेरिका में गुलामी प्रथा को ख़त्म कर दिया गया और वहां के संविधान के चौदहवें और पन्द्रहवें संशोधन के तहत ब्लैक लोगों को बेसिक सिविल राइट दिए गए।

तस्वीर साभार: vox

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असल में यह आंदोलन पहली लहर के मुकाबले अपने परिमाण में काफी बड़ा था। यह महिलाओं से संबंधित एक या दो अधिकार (मसलन अच्छी नौकरी का सवाल) तक ही सीमित नहीं था बल्कि यह एक प्रकार से ‘विमेन लिब्रलाईजेशन’ की ओर की गई पहल थी। साल 1961 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ़ केनेडी द्वारा ‘प्रेसिडेंट कमीशन ऑन स्टेटस ऑफ़ विमेन’ बनाया गया। साल 1963 में इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए एकल परिवार और ‘मदरहुड’ का समर्थन किया। इस रिपोर्ट के ज़रिये कमीशन ने पाया कि महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर भेदभाव हो रहा है। यह भेदभाव वेतन से लेकर व्यवहार तक हर स्तर पर हो रहा था। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए साल 1963 में समान वेतन अधिनियम और साल 1964 में सिविल राइट एक्ट संशोधित रूप में आया।

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मगर ये महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए काफ़ी नहीं था। बलात्कार और घरेलू हिंसा की घटनाएं अब भी घटित हो रही थी। साल 1963 में प्रकाशित ‘द फेमिनाइन मिस्टीक’ में बेट्टी फ्रीडन कहती हैं कि बच्चों की अनियमित देखभाल और घरेलू कामकाज के ठीक से न होने के लिए अभी भी महिलाओं को ही दोषी बताया जा रहा था। साल 1971 में ग्लोरिया स्टेनम, बेट्टी फ्रीडन और बेल्ला अब्ज़ग ने मिलकर ‘नेशनल वीमन पॉलिटिकल कॉकस’ की स्थापना की। ग्लोरिया स्टेमन की ही पत्रिका मिस मैगजीन साल 1976 में नारीवाद को विषय के रूप में अपने कवर पेज पर जगह देने वाली पहली मैगज़ीन बनी। साल 1970 में रो बनाम वेड मामले में सुनवाई करते हुए अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए महिलाओं को गर्भसमापन का अधिकार दे दिया। साल 1972 में समान अधिकार संशोधन कांग्रेस द्वारा तो पारित किया गया मगर राज्यों के उपयुक्त सहमति न मिलने के कारण यह कानून नहीं बन सका।   

तस्वीर साभार: history.com

यही वह दौर था जब नेशनल ऑर्गनाईजेशन फॉर विमेन ने महिलाओं के विरुद्ध होने वाले भेदभाव के खिलाफ अपना अभियान तेज़ कर दिया। इसमें स्कूल की किताबों से स्त्रियों के विरुद्ध पूर्वाग्रहों को बनाने या मज़बूत करने वाली सामग्री को हटाया गया और उनके पुनर्लेखन पर जोर दिया गया। साथ ही लेखकों से यह अपील की गई कि वह महिलाओं के लिए Ms. जैसे जेंडर न्यूट्रल शब्दों का प्रयोग करें। कॉलेजों में पहली बार विमेन स्टडी के लिए विभाग स्थापित हुए साथ ही हेल्थ कलेक्टिव और रेप क्राइसिस सेंटर स्थापित हुए।

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नारीवादी आंदोलन की यह दूसरी लहर पहली लहर के विपरीत विमर्श की थ्योरी के स्तर पर भी काफी सशक्त थी। इस दौरान महिलाओं के शोषण के मूल कारणों पर चर्चा होनी शुरू हुई। सामाजिक संस्थानों जैसे परिवार, विवाह आदि पर चर्चा करते हुए इस बारे में लिखा और बोला जाने लगा कि किस तरह यह संस्थान महिला शोषण के लिए उत्तरदायी हैं। साल 1970 में केट मिलेट की किताब ‘सेक्शुअल पोलिटिक्स’ बेस्ट सेलर बन गई। यह किताब पावर स्ट्रक्चर पर बात करते हुए मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स के अतिरिक्त व्यक्तिगत माने जाने वाले संबंधों को भी नारीवादी तरीके से व्याख्यायित करते हुए उनमें निहित महिला शोषण को स्पष्ट करती हैं। यही दौर था जब कैरोल हैनिश ने ‘पर्सनल इज़ पॉलिटिकल’ की युक्ति दी थी।

कुल मिलाकर यह दौर नारीवादी आंदोलन के विमर्श के रूप में मज़बूत होने का दौर था। विवाह और परिवार जैसे सामाजिक संस्थान जो आंदोलन की पहली लहर में विमर्श से बाहर थे उनको भी विमर्श का हिस्सा बनाया गया। एम्मा गोल्डमैन के अनुसार “एक स्त्री तब तक आज़ाद नहीं हो सकती जब तक परिवार, निजी संपत्ति और स्टेट की शक्ति को ढहाया नहीं जाएगा।” यह आंदोलन इस स्थित में आकर संस्थानों के अस्तित्व को ऐसे ही चुनौती दे रहा था जिसे नारीवाद की तीसरी लहर यानी थर्ड वेव ऑफ़ फेमिनिज़म के रूप में और भी विस्तार लेना था।      

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तस्वीर साभार : vox

गायत्री हिंदू कॉलेज से इतिहास विषय में ऑनर्स की पढ़ाई कर रही हैं। मूलत: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र के एक छोटे से गांव से दिल्ली जाने वाली पहली महिला के रूप में उनके पास सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़े बहुत सारे अनुभव हैं, जो इंटरसेक्शनल नारीवाद की ओर उनके झुकाव के प्रमुख कारक हैं। उनकी दिलचस्पी के विषयों में नारीवाद को गांवों तक पहुंचाना और ग्रामीण मुद्दों को मुख्यधारा में ले आना शामिल हैं।

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