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पितृसत्ता का इतिहास लगभग 4000 साल पुराना है। ऐतिहासिक रूप से, पितृसत्ता सामाजिक ढांचे का एक प्रकार है, जिसमें एक पुरुष मुखिया होता है। समस्त संसाधनों और क्रियाकलापों में उसका हस्तक्षेप और नियंत्रण होता है। इससे पितृसत्ता की संस्थागत अवधारणा विकसित हुई जिसने समाज में पुरुष प्रभुत्व को स्थापित किया। पितृसत्ता के कारण ही पुरुष समाज में फ़ायदे की स्थिति में होता है यानी उसके पास ऐसा विशेषाधिकार है, जो नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही यह समझना महत्वपूर्ण है कि श्रेणीबद्ध शासन और ढांचे का समूचा तंत्र मूल रूप से लिंग से जुड़ा हुआ है। यानी शोषण के सभी रूपों की शुरुआत महिलाओं पर नियंत्रण से हुई है। शुरुआती दौर में जैविक कारकों के फलस्वरूप लैंगिक श्रम विभाजन हुआ, जो सामाजिक हस्तक्षेप के कारण शोषणात्मक हो गया।

कबीले के अस्तित्व के लिए औरतें बच्चों की देखभाल में संलग्न हुई। बाद में कबीलाई विस्तार के लिए वैवाहिक संबंधों के तहत एक कबीले से दूसरे कबीले में उनका आदान-प्रदान हुआ। इस तरह, उनकी इच्छा के बग़ैर उन्हें संपत्ति माना गया और संपूर्ण अधिकार पुरुषों को मिले। बाद में युद्ध उन्मुख कबीलों ने समतावादी समाजों पर आक्रमण कर उनके अस्तित्व के खात्मे हेतु औरतों और बच्चों पर कब्ज़ा कर उनका यौनिक और शारीरिक शोषण कर उन्हें दास बनाया। इस तरह, पितृसत्ता का सामान्यीकरण हुआ। साथ ही दास प्रथा और वर्ग विभाजन की पहली भोक्ता भी स्त्रियां हुईं।

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बाद के समय में, सामाजिक विकास व आर्थिक विकास के दौरान भी स्त्रियों की स्थिति लगभग पहले की ही तरह रही। विश्व प्रारम्भिक दौर से मध्यकालीन व्यवस्था और उसके बाद आधुनिक दौर की ओर बढ़ा। कला और विज्ञान में प्रगति हुई। औद्योगिक विकास ने दुनियाभर में आर्थिक क्रांति ला दी। लेकिन इन सब से स्त्रियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। हालांकि मध्यकालीन दौर से ही स्त्रियों ने समाज में व्याप्त ‘सामान्य व्यवहार’ में निहित शोषण को पहचानते हुए उसका विरोध भी करना शुरू कर दी थी। इनमें क्रिस्टीन दी पिज़ान (1434) से लेकर मैरी वॉल्सटॉनक्राफ्ट (1797) और जेन ऑस्टेन (1817)  आधुनिक नारीवादी आंदोलन की ‘फोरमदर्स’ (Fore mothers) कही जाती हैं। इन सभी लोगों ने महिलाओं को बुद्धिमत्ता और बुनियादी मानवीय क्षमताओं से युक्त मानते हुए उन्हें भी पुरुषों के समान प्रतिष्ठा और गरिमा का अधिकारी माना। धीरे-धीरे महिलाएं सांस्थानिक और ढांचागत शोषण के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई और उनकी आवाज़ आंदोलन के रूप में एकजुट होकर मुखर हुई। 19वीं सदी में अमेरिका में यह एक लहर की तरह आई, जिसे नारीवाद की पहली लहर कहा गया। चरण दर चरण महिलाओं ने शोषण समाज के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हुए अपनी मांगें रखी और स्वायत्तता हासिल की।

नारीवाद का प्रथम चरण : शुरुआत

19वीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के प्रारंभ में आधुनिक नारीवादी आंदोलन के प्रथम चरण की शुरुआत अमेरिका से शहरी औद्योगिक उदारवादी और समाजवादी राजनीति के माहौल में हुई। इसका मुख्य लक्ष्य महिलाओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना था जिसका केंद्र कानूनी मुद्दों सहित वोट का अधिकार था। औपचारिक रूप से इसकी शुरुआत सेनेका फॉल्स कन्वेंशन से हुई जहां महिला समानता के लिए लगभग 300 स्त्रियों और पुरुषों ने रैली की। उसी दौरान सेनेका फॉल्स डिक्लेयरेशन का प्रारूप तय किया गया जिसमें नए आंदोलन की वैचारिकी और राजनीतिक रणनीति तय की गई। नारीवाद के पहले चरण में उन तरीकों को बदलने का व्यापक प्रयत्न किया गया, जिनसे नारीवादी डिस्कोर्स संचालित था। नारीवादी आंदोलन के प्रथम चरण अथवा ‘फर्स्ट वेव’ शब्द पहली बार 1968 में (यानी दूसरे चरण के दौरान) न्यू यॉर्क टाइम्स की एक पत्रकार मार्था लेयर द्वारा उनके एक लेख ‘ द सेकंड फेमिनिस्ट वेव: व्हाट डू वीमेन वॉन्ट’ में गढ़ा गया।

नेशनल अमेरिकन वीमेन सफ़रेज़ असोसिएशन (NAWSA). तस्वीर साभार- Votes for women

इस दौरान अमेरिका में तमाम संगठन बने जिन्होंने भेदभाव और शोषण के ख़िलाफ़ समानता के लिए जन भागीदारी और जागरूकता फैलाने के लिए प्रयास किया। साल 1866 में बने अमेरिकन इक्वल राइट्स असोसिएशन में ‘मताधिकार-सबके लिए’ एक लक्ष्य बनाया गया। इस संगठन के टूटने पर साल 1869 के शुरुआत में नेशनल वीमेन सफ़रेज़ असोसिएशन (NWSA) बनाया गया,जो महिला नियंत्रित संगठन था तथा इसका मूल उद्देश्य महिलाओं का संपूर्ण उत्थान था। इसी साल के आख़िर में अमेरिकन वीमेन सफ़रेज़ असोसिएशन (AWSA) भी बना,जो महिलाओं के लिए मताधिकार को राज्य संशोधन से पारित कराना चाहता था। बाद में, दोनों संगठनों की मांगों में समानता बढ़ी जिससे दोनों का विलय नेशनल अमेरिकन वीमेन सफ़रेज़ असोसिएशन (NAWSA) के रूप में हुआ। बाद में साल 1916 में एक युवा नारीवादी ऐलिस पॉल द्वारा एक महिला पार्टी नेशनल वीमेंस पार्टी (NWP) का गठन हुआ जिसने राज्य संशोधन की बजाय संवैधानिक संशोधन हेतु विश्व युद्ध के दौरान ही वाइट हाउस के बाहर प्रदर्शन किया।

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‘फर्स्ट वेव’ और दास-प्रथा विरोध ( उन्मूलनवाद) में संबंध

जिस दौरान नारीवादी आंदोलन की शुरुआत हो रही थी, उसी समय अमेरिका और यूरोप में दास प्रथा के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन किए जा रहे थे। असल में, नारीवादी की नींव ही दास-प्रथा विरोधी सम्मेलन की एक घटना के फलस्वरूप पड़ी जब साल 1840 के लंदन में ‘वर्ल्ड एन्टी-स्लेवरी कन्वेंशन’ में एलिज़ाबेथ कैडी स्टैंशन और लुक्रेशिया मॉट को बैठने से मना कर दिया गया। बहुत सारी नारीवादी महिलाएं उन्मूलनवादी भी थी, जिसके कारण दास-प्रथा के ख़िलाफ़ प्रदर्शन ने नारीवादी आंदोलन को और तीव्र कर दिया। साल 1840 में हुई घटना के एलिज़ाबेथ केडी व मॉट ने सेनेका फॉल्स कन्वेंशन का प्रारूप तैयार कर रैली का आयोजन किया। उन्मूलनवाद और नारीवादी आंदोलन दोनों में लक्ष्यों की प्रकृति में समानताएं थी, इन दोनों ही आंदोलनों ने एक दूसरे से सहयोग और शक्ति लेकर शोषण के ख़िलाफ़ अपना विरोध प्रभावी बनाया। जहां नारीवादी पुरुष प्रभुत्व के ख़िलाफ़ आज़ादी और स्वायत्तता के लिए लड़ रही थी। वहीं काले लोगों ने नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई। इस आंदोलन में महिलाओं ने उन तमाम रूढ़ियों को तोड़ दिया जिनके आधार पर स्त्री होने के पैमाने गढ़े गए थे। अफ्रीकी-अमेरिकी सॉजॉर्नर ट्रुथ (1883) ने नारीवाद और उन्मूलनवाद में अंतरसंबंध स्थापित करते हुए  सार्वजनिक रूप से सभाओं में बोलते, प्रदर्शन करते व जेल में बंद होने के दौरान ‘कल्ट ऑफ डोमेस्टिसिटी’ को चुनौती देते हुए पूछा- ‘ऐंट आई अ वुमन’।

पहले चरण की मांगें व सफ़लता

नारीवादी आंदोलन का प्रथम चरण महिलाओं के मौलिक अधिकार और पुरुषों के समान स्त्री को रखने की दिशा में मताधिकार की मांग मूल रूप से कर रहा था। इसके साथ ही जैसे जैसे आंदोलन आगे बढ़ा इसकी मांगे भी बढ़ती गई। यह आंदोलन अमेरिका से यूरोप और विश्व के अलग-अलग भागों तक पहुंचा जहां महिलाएं अपने साथ हो रहे भेदभाव और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही थी। इस आंदोलन के तहत मताधिकार के साथ-साथ महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा का अधिकार, प्रजनन नियंत्रण , रोजगार का अधिकार , विवाहित महिला की संपत्ति का अधिकार और समान वैवाहिक क़ानून की मांग की गई। इस कानून के पारित होने से पहले अमेरिका और ब्रिटेन में विवाहित स्त्रियों का अपनी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं था। विवाह असल में स्त्री की ‘सामाजिक मृत्यु’ (Civil Death) होते थे, जिसमें उसे उसकी संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता था। ब्रिटेन में विवाह के बाद महिला की संपति पर पुरूष का स्वामित्व हो जाता था। इसके कारण ही ब्रिटेन में महिला अधिकार को लेकर बहस तेज़ हुई। साल 1872 में इस संबंध में कानून पारित हुआ जिसके अनुसार पत्नी को पति से अलग संपति रखने का अधिकार प्रदान किया गया।


प्रथम चरण की सबसे बड़ी सफ़लता अमेरिकी संविधान के 19 वें संशोधन से प्राप्त मताधिकार था। इसके तहत अमेरिकी संविधान ने साल 1920 में महिलाओं हेतु मताधिकार पारित करते हुए कहा – ‘राइट टू वोट कुड नॉट बी डिनाइड ऑन द बेसिस ऑफ़ सेक्स।’

तस्वीर साभार: ms5102blog.

प्रथम चरण की प्रमुख नारीवादी

नारीवाद का प्रथम चरण वैश्विक स्तर पर महिलाओं के लिए एक उपलब्धि के रूप में आज भी दर्ज है, जिसने अमानवीय भेदभाव, शोषण इत्यादि के ख़िलाफ़ न केवल आवाज़ उठाई बल्कि यह भी बताया कि पितृसत्ता मानव मिर्मित है और जो कुछ भी सामान्य दिख रहा है, वह ही सच्चाई नहीं है, शोषण सहना स्त्री की नियति नहीं है और पित्तसत्ता प्राकृतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक अवधारणा है। यह आंदोलन बताता है कि दुनिया भर में कहीं भी औरतें एक साथ मिलकर ऐसी ताकत बन सकती हैं, जो अपने ख़िलाफ़ हो रहे शोषण को जड़ से खत्म कर समाज में सांस्कृतिक पितृसत्ता का उन्मूलन कर समतावादी समाज की रचना कर सकती हैं। स्थापित पितृसत्ता के खिलाफ़ आधुनिक समय में महत्वपूर्ण आवाज़ें उठाने वाली महिलाओं में सूज़न बी. एंथनी (1820- 1906), एलिज़ाबेथ केडी स्टैंटन (1815- 1902), लूसी स्टोन (1818-1893), ओलम्पिया ब्राउन (अमेरिकी सार्वभौमिकतावादी और महिला मताधिकार समर्थक), फ्रांसिस विलार्ड (1839- 1898) और वर्जिनिया वुल्फ़ ( चेतना की धारा ‘स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस’ को वैचारिक माध्यम बनाकर चलनर वाली अग्रदूत) इत्यादि महत्वपूर्ण नाम हैं।

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प्रसिद्ध इतिहासकार जेर्डा लर्नर के अनुसार पितृसत्ता संस्थागत हो चुकी है। 4000 साल पुरानी व्यवस्था आज भी समाज की वैचारिकी में घुली हुई है। महिलाओं को लगातार हतोत्साहित किया गया और उनका कार्यक्षेत्र सीमित कर पुरुष पर आश्रित कर दिया गया। उनका इतिहास मिटा दिया गया। अपनी किताब ‘द क्रिएशन ऑफ हिस्ट्री’ में वह कहती हैं कि शोध और लेखन जैसे क्षेत्रों में पुरुष थे, उन्होंने सब कुछ अपने हिसाब से लिखा, प्रत्येक वर्णन उनकी अभिव्यक्ति है, महिलाओं की अभिव्यक्ति के लिए इतिहास में कोई स्थान नहीं है। असल में, सदियों से चलती आ रही पितृसत्ता पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है, इसको तोड़ने के लिए ज़ोरदार प्रहार करना होगा और समाज के सभी क्षेत्रों में, शोध में व संस्थाओं में महिलाओं को अपने स्पेसेज ‘रिक्लेम’ करने होंगे, तभी वे समतावादी समाज बना पाएंगी। नारीवादी आंदोलन का प्रथम चरण इसी बात की गवाही देता है। हालांकि इसमें भी बहुत सारी कमियां और गलतियां हुई जिनको लेकर समाज में महिलाओं के अन्य समूहों से टकराव हुए, नए मूल्य व लक्ष्य तय कर नए चरण की शुरुआत हुई।

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तस्वीर साभार : womensmuseum

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