पांच दशकों में धरती पर रहने वाले 68% जीवों की आबादी हुई खत्म: लिविंग प्‍लैनेट रिपोर्ट 2020
पांच दशकों में धरती पर रहने वाले 68% जीवों की आबादी हुई खत्म: लिविंग प्‍लैनेट रिपोर्ट 2020
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सभी देश विकास की होड़ में इस कदर मसरूफ़ है कि उन्हें पर्यावरण और जैव विवधता के सरंक्षण में कोई दिलचस्पी नहीं रही है। भारत में विवादित पर्यावरण प्रभाव आंकलन 2020 का मसौदा भी इन्हीं उदाहरणों में से एक है जिससे पर्यावरण के प्रति हमारी चिंता साफ़ ज़ाहिर होती है। अपने आप को विकसित देशों की कतार में लाने के लिए जैव विविधता को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया गया है। इसकी वजह से पशु पक्षियों की कई प्रजातियां या तो विलुप्‍त हो चुकी हैं या विलुप्‍त होने की कगार पर आ गई हैं। वर्ल्‍ड वाइल्डलाइफ फंड की लिविंग प्‍लैनेट रिपोर्ट 2020 में ये चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।

दरअसल, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के द्विवार्षिक प्रकाशन के तेरहवें संस्करण में लिविंग प्लैनेट इंडेक्स (एलपीआई) के माध्यम से प्राकृतिक स्थिति का आंकलन किया गया है। लीविंग प्‍लैनेट इंडेक्‍स के मुताबिक 1970-2016 के बीच धरती पर रहने वाले जीव जंतुओं की आबादी में करीब 68 फीसद की गिरावट देखी गई है। इनमें हवा, पानी और ज़मीन पर रहने वाले सभी छोटे और बड़े जीव शामिल हैं। इन आंकड़ों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंसान प्रकृति पर किस तरह के ज़ुल्म ढा रहा है। इस रिपोर्ट के मुताबिक बीते पांच दशकों की विकास की लड़ाई में करीब 10 में से 7 जैव विविधता की प्रजातियां खत्‍म हो चुकी हैं। वहीं, ताज़े पानी में रहने वाली करीब 84 फीसद प्रजातियों में कमी आई है। वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के मुताबिक जंगली जानवरों की संख्या तेज़ी से घट रही है क्योंकि प्रकृति के प्रति इंसानों की कठोरता समय के साथ बढ़ती जा रही है। 

बात अगर हम भारत में इन हालातों की बात करें तो डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूएफ की प्रोग्राम डायरेक्‍टर सेजल वोराह के मुताबिक इस बारे में भारत की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। लिविंग प्‍लैनेट रिपोर्ट 2020 के मुताबिक भारत में 12 फीसद स्‍तनधारी जीव और 3 फीसद पक्षियों की प्रजातियां विलुप्‍त होने की कगार पर हैं। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस बड़े बदलाव की वजह से ही कोविड-19 जैसे जानलेवा वायरस पैदा हो रहे हैं।

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वन्यजीवों की आबादी में गिरावट का सीधा मतलब यह है कि हमारी धरती हमें चेतावनी दे रही है कि हमारा तंत्र पूरी तरह से फेल हो रहा है।

लिविंग प्‍लैनेट रिपोर्ट 2020 के मुताबिक दक्षिण अमेरिका और केरेबियन क्षेत्र में करीब 94 फीसद तक जैव विविधता में कमी आई है। वहीं एशिया प्रशांत क्षेत्र में करीब 45 फीसद तक इसमें गिरावट दर्ज की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार ताज़े पानी में रहने वाली तीन प्रजातियों में से एक प्रजाति विलुप्‍त होने की कगार पर है। भारत के संदर्भ में भी यह स्थिति भयंकर है। सेजल वोराह के मुताबिक देश में वर्ष 2030 तक पानी की मांग उसकी पूर्ति के हिसाब से दोगुनी हो जाएगी। 20 में से 14 नदियों के तट सिकुड़ रहे हैं। उनके मुताबिक भारत के एक तिहाई नम भूमि वाले क्षेत्र बीते चार दशकों के दौरान खत्‍म हो चुके हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि साल 2018 में आए चक्रवाती तूफानों की वजह से दक्षिणी अरब प्रायद्वीप में जबरदस्‍त बारिश देखने को मिली थी और यही बाद में टिड्डी दलों के प्रजनन स्‍थल बने। उसी साल गर्मियों में जबरदस्‍त लू चली और भारत, पाकिस्‍तान के कुछ इलाकों को सूखे की मार भी झेलनी पड़ी थी। अभी हाल में ही भारत के कई राज्यों में टिड्डी दलों के आक्रमण की खबर भी बेहद चर्चा में रही थी जिससे किसानों की फसल को खासा नुकसान पहुंचा है।

डब्‍ल्‍यूडब्‍ल्‍यूएफ के महानिदेशक मैक्रो लैम्बरतिनी के मुताबिक यह रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि इंसान ने प्रकृति से खिलवाड़ कर खुद पर और इस धरती पर रहने वाले असख्‍ंय जीव-जंतुओं के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। उन्‍होंने कहा कि हम सामने आए दिन इन सबूतों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। वन्यजीवों की आबादी में गिरावट का सीधा मतलब यह है कि हमारी धरती हमें चेतावनी दे रही है कि हमारा तंत्र पूरी तरह से फेल हो रहा है। समुद्रों और नदियों की मछलियों से लेकर, मधुमक्खियों तक जो हमारी फसलों के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं, वे अब नष्ट हो रही हैं। वन्यजीवों में कमी होना सीधे तौर पर मानव के पोषण, खाद्यान्‍न सुरक्षा और करोड़ों लोगों की आजीविका पर घातक प्रभाव डालता है।

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जैव विविधता और पानी के संकट को जलपुरुष डॉक्‍टर राजेंद्र सिंह इससे कहीं अधिक बड़ी समस्या मानते हैं। उनके मुताबिक भारत के लगभग 365 जिलों में पेयजल उपलब्‍ध नहीं है। 190 जिले बाढ़ की समस्‍या से जूझ रहे है। उनका कहना है कि यदि यही हालात रहे तो आने वाले सालों में यूरोप, अफ्रीका और सेंट्रल एशिया में पानी को लेकर चिंता बढ़ती जाएगी। उनके मुताबिक यूरोप की तरफ रुख करने वाली अफ्रीकी या एशियाई लोगों को वहां के लोग ‘क्‍लाइमेटिक रिफ्यूजी’ कहने लगे हैं। जिसका मतलब है कि जहां से ये लोग आए हैं वहां पर कई तरह का प्राकृतिक संकट है। इस पलायन की वजह से यूरोप का परिदृश्‍य बदल रहा है। वहीं, पहले अमेज़न और अब कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में लगी आग, अम्फान, निसर्ग, क्रिस्टबॉल चक्रवात, आए दिन भूकंप की घटनाएं कई जगहों पर भारी तबाही मचा चुकी हैं लेकिन ये सारी तबाही इंसानों की विकास की होड़ के कारण ही है जिसका खामियाज़ा आज पूरी दुनिया भुगत रही है।

हालांकि, इस बुरे दौर में कुछ अच्छी ख़बरें भी सुनने को मिली क्योंकि कोरोना वायरस के कारण लगे लॉकडाउन से हमारी प्रकृति इंसानों के घरों में कैद होने के बाद अपनी मरम्मत में जुट गई। पंजाब के जालंधर से ऐसी तस्वीरें साझा की जिनमें वहां से लोगों को हिमाचल प्रदेश में स्थित धौलाधार पर्वत श्रृंखला की चोटियां दिख रही हैं। प्रदूषण कम होने की वजह से लगभग पूरा देश इस तरह का नीला आसमान देख पा रहा था। दिल्ली से होकर बहने वाली यमुना नदी को इतना साफ देख कर लोग काफी हैरान थे। इस नदी को साफ करने की कोशिश में सालों से सरकारों ने कितनी ही योजनाएं और समितियां बनाईं और कितना ही धन खर्च किया लेकिन ऐसे नतीजे कभी नहीं दिखे जो लॉकडाउन के दौरान सामने आए हैं। इसी के साथ कई जानवर भी बिना डर के सड़कों पर भ्रमण करते नज़र आए। लेकिन अब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की यह नयी रिपोर्ट इशारा करती है कि हम इंसानों के कारण प्रकृति का कितना दोहन हो रहा है। इस रिपोर्ट में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया है कि अगर इस संबंध में तुरंत कदम उठाए जाए तो जंगल का इलाका बढ़ सकता है। साथ ही अगर प्रकृति का संरक्षण करना है तो हमें उर्जा पैदा करने के तरीकों को भी बदलना होगा और समुद्र को प्रदूषण से बचाना होगा।

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तस्वीर साभार : huffingtonpost

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

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