अच्छी ख़बर आज पहली बार मनाया जा रहा है अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस 2020

आज पहली बार मनाया जा रहा है अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस 2020

अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस वैश्विक स्तर पर समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन की दिशा में लंबे समय के प्रयासों का प्रतिनिधित्व करता है।

अंतरराष्ट्रीय समान वेतन दिवस इस साल पहली बार 18 सितम्बर को मनाया जा रहा है। यह दिवस वैश्विक स्तर पर बिना लैंगिक भेदभाव के समान मूल्य के काम के लिए समान वेतन की दिशा में लंबे समय के प्रयासों का प्रतिनिधित्व करता है। समान काम के लिए बराबर वेतन न दिया जाना संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता और सभी प्रकार के भेदभावों के खिलाफ है। जिसमें खासतौर पर महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव शामिल है। विश्व के हर क्षेत्र में महिलाओं को समान काम के लिए कम वेतन दिया जाना एक सामान्य बात मानी जाती है।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में महिलाओं को आज भी पुरुषों की तुलना में 23 फीसद कम वेतन मिलता है। बात अगर डॉलर में करें तो महिलाएं पुरुषों द्वारा अर्जित प्रत्येक डॉलर के अनुपात में केवल 77 सेंट ही कमा पाती हैं। संयुक्त राष्ट्र कहता है कि इस रफ्तार से लैंगिक आधार पर वेतन में असमानता की इस खाई को भरने में महिलाओं को करीब 257 साल लग सकते हैं। नतीजतन, पुरुषों और महिलाओं के बीच यह असमानता को और गहरा करता है और इसके कारण अधिक महिलाएं गरीबी में ही सेवानिवृत्त हो रही हैं। लैंगिक आधार पर असमान वेतन दिए जाने के के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन द्वारा #stoptherobbery अभियान चलाया गया था।

शुरुआत से ही महिला और पुरुष को लैंगिक आधार पर अलग-अलग समझा जाता है। यह कहा जाता है कि शारीरिक रूप से महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कमज़ोर होती हैं। इसी मानसिकता के चलते एक जैसे काम के लिए महिलाओं को कम वेतन देने की धारणा प्रचलन में आई। लेकिन सदियों से मौजूद इस रूढ़िवादि विचार की जड़ें आज के आधुनिक युग में भी मौजूद हैं। तभी तो महिलाओं को यह बात ज़ाहिर करनी पड़ रही है कि #equalpayforequalwork यानी समान काम के लिए समान वेतन।

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पुरुषों और महिलाओं के लिए समान वेतन का व्यापक रूप से समर्थन तो किया गया है, लेकिन जब व्यवहार में इसे लागू करने की बात आती है तो ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग नज़र आती है। हालांकि इस अंतर को कम करने की अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रगति काफी धीमी रही पर छोटे स्तर पर ही सही लैंगिक आधार पर वेतन की इस असामनता को कम करने की दिशा में सफलता ज़रूर हासिल हुई। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक समान वेतन मानवाधिकार और लैंगिक समानता के लिए बेहद आवश्यक है।

बात अगर डॉलर में करें तो महिलाएं पुरुषों द्वारा अर्जित प्रत्येक डॉलर के अनुपात में केवल 77 सेंट ही कमा पाती हैं। संयुक्त राष्ट्र कहता है कि इस रफ्तार से लैंगिक आधार पर वेतन में असमानता की इस खाई को भरने में महिलाओं को करीब 257 साल लग सकते हैं।

समान वेतन अंतरराष्ट्रीय गठबंधन (EPIC) का नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, UN महिला द्वारा किया जा रहा है। इस गठबंधन का लक्ष्य हर जगह महिलाओं और पुरुषों के लिए समान वेतन प्राप्त करना है। ईपीआईसी सरकारों, नियोक्ताओं, श्रमिकों और उनके संगठनों को इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग करता है। ईपीआईसी वर्तमान में वैश्विक, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर लैंगिक वेतन अंतर को कम करने के लिए एकमात्र स्टेकहोल्डर्स पार्टनरशिप है। दुनिया में समान वेतन की गंभीरता को एक उदाहरण से समझा जा सकता है जब ब्राज़ील में वीमेन फुटबाल चैंपियनशिप मैच के दौरान टीम के पहले गोल पर स्कोरबोर्ड पर स्कोर 1 के बजाय 0.8 दिखाया गया और यह बताने का प्रयास किया कि महिलाओं को पुरुषों की तुलना में उनके समान काम के बदले 20 फीसद कम वेतन दिया जाता है।

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भारत के संदर्भ में बात की जाए तो साल 2018 में वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम के जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 108वें स्थान पर था। अब साल 2020 में भारत 4 पायदान नीचे 112 पर आ चुका है। लैंगिक आधार पर वेतन अंतर के अलावा, भारत संगठित और असंगठित क्षेत्रों के बीच भी भारी वेतन असमानता है। इस तरह से देखा जाए तो भारत ने बीते 2 सालों में आय के मामले में लैंगिक असमानता को बढ़ावा मिला है क्योंकि 4 पायदान नीचे आना इसकी गंभीरता को दर्शाता है। वहीं, दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की ही एक रिपोर्ट में कहा गया है कि कोरोना वायरस के कारण 4 करोड़ से अधिक महिलाओं और लड़कियां अत्यधिक गरीबी में जा सकती हैं। कोरोना महामारी ने तो वैसे ही अर्थव्यवस्था को धराशयी कर दिया है इसलिए हो सकता है आने वाले सालों में भारत की रैंकिंग वैश्विक स्तर पर और भी नीचे की ओर आ जाए। जबकि किसी भी देश को विकसित देशों की श्रेणी में आने के लिए इस अंतर को कम करना जरूरी है।

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तस्वीर साभार : thetimes

About the author(s)

पंजाब केसरी दिल्ली समूह के साथ कार्यरत श्वेता गार्गी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस ऑनर्स में ग्रेजुएट है तथा जर्नलिज्म में पोस्ट ग्रेजुएशन कर चुकी हैं। घर और समाज में मौजूद विभेद के चलते उनका समावेशी नारीवाद की ओर झुकाव अधिक है। साथ ही उन्हें सामाजिक - आर्थिक - राजनैतिक और लैंगिक समानता से जुड़े विषयों पर लिखना बेहद पसंद है।

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