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हाल ही में मानवाधिकार कार्यकर्ता और जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने गिरफ़्तार किया है। रविवार 13 सितंबर की रात को उन्हें फ़रवरी में हुई दिल्ली हिंसा में दंगे भड़काने के आरोप में अनलॉफुल ऐक्टिविटीज़ (प्रिवेंशन) ऐक्ट यूएपीए कानून के तहत गिरफ़्तार किया गया। उमर उन तमाम प्रदर्शनकारियों में से हैं जिन्होंने नागरिकता संशोधन कानून या सीएए और एनआरसी के खिलाफ़ अपनी आवाज़ उठाई थी और शांतिपूर्ण विरोध किया था। दंगे भड़काने के अलावा उन पर देशद्रोह, हत्या और हत्या के षड्यंत्र जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। 

गिरफ़्तार होने से पहले उमर ने एक वीडियो मेसेज रिकॉर्ड किया था, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें उन्होंने कहा है कि पुलिस असली दंगाइयों को गिरफ़्तार करने के बजाय मौजूदा केंद्र सरकार के आलोचकों और उसकी नीतियों का विरोध करनेवालों को झूठे आरोपों में फंसाकर उन्हें क़ैद कर रही है। उमर ने यह भी कहा कि उनके भाषणों का गलत मतलब निकालकर उन्हें अपराधी घोषित किया गया है। जबकि जिन लोगों ने खुलेआम अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हिंसा को ईंधन दिया है उन्हें गिरफ़्तार करना तो दूर की बात, पूछताछ के लिए भी नहीं बुलाया गया है। अंत में अपने वीडियो में उमर खालिद ने कहा है कि सरकार अपने खिलाफ़ आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रही है और ऐसे में हमें डरने के बजाय इंसाफ़ के साथ खड़े रहना चाहिए।

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उमर अकेले नहीं हैं जिन्हें दिल्ली दंगों के बाद गिरफ़्तार किया गया है। वर्तमान सरकार द्वारा ख़ासकर सीएए और एनआरसी जैसी नीतियों का विरोध करनेवाले कई छात्रों, कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, नेताओं पर यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के तहत कार्रवाई हुई है। इनमें से ज़्यादातर लोग अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उदाहरण के तौर पर शरजील इमाम, शरजील उस्मानी, सफ़ूरा ज़रगर, मीरान हैदर, गुलफ़िशां फ़ातिमा जैसे नाम याद आते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के नारीवादी आंदोलन ‘पिंजरा तोड़’ की कार्यकर्ताओं, नताशा नरवाल और देवांगना कालिता को भी यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से किसी के बारे में हिंसात्मक गतिविधियों में भाग लेने का कोई ठोस सबूत नहीं है। सरकार और उसके निर्णयों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन और नारेबाज़ी करने के लिए ही उन्हें आतंकी गतिविधियों को रोकने वाले कानून के तहत गिरफ़्तार किया गया है।

उमर खालिद ने कहा है कि सरकार अपने खिलाफ़ आवाज़ों को दबाने की कोशिश कर रही है और ऐसे में हमें डरने के बजाय इंसाफ़ के साथ खड़े रहना चाहिए।

अपने वीडियो मेसेज में उमर खालिद खुद कहते भी हैं कि उन्हें हिंसात्मक गतिविधियों के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है जबकि उन्होंने अपने किसी भी भाषण में हिंसा को प्रोत्साहन नहीं दिया और हमेशा से अहिंसात्मक आंदोलन की बात करते आए हैं। खुद को गांधीवादी बताते हुए वे कहते हैं कि सरकार की आलोचना करनेवाले अगर गांधी के आदर्शों की भी बात करें तो उन पर कार्रवाई हो जाती है। वहीं, सरेआम लोगों को हिंसा के लिए उकसाने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती अगर वे बहुसंख्यक और सरकार के समर्थक हो।

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दिल्ली हिंसा के दौरान शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ द्वेष और हिंसा को बढ़ावा देते हुए कई लोगों के वीडियो सामने आए हैं। दिल्ली चुनाव के दौरान खुद केंद्रीय मंत्रियों द्वारा खुलेआम “गोली मारो सालों को” जैसे भड़काऊ नारे लगाए गए हैं। इस तरह की बयानबाज़ी करनेवाले ज़्यादातर लोग शासक दल के नेता, कार्यकर्त्ता या समर्थक रहे हैं और इनके ख़िलाफ़ किसी तरह की कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। दिल्ली पुलिस पर इस दौरान एकतरफा कार्रवाई के आरोप भी लग रहे हैं। अगर वाकई सरकार का मकसद हिंसा और दंगों के लिए ज़िम्मेदार व्यक्तियों को गिरफ़्तार करना है तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ इस तरह का अन्याय क्यों? क्यों सरकारी समर्थकों पर इन आरोपों में कार्रवाई नहीं की जाती? क्या यह किसी तरह से न्यायसंगत है? 

दिल्ली के प्रेस क्लब में उमर व अन्य प्रदर्शनकारियों की रिहाई के लिए आयोजित प्रदर्शन। तस्वीर साभार- Hindustan Times

संविधान के अनुच्छेद 19 के अनुसार सरकार की आलोचना और उसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन करना एक नागरिक का मौलिक अधिकार है। अगर यह कोई अपराध ही नहीं है, ऐसे में प्रदर्शनकारियों को अपराधी बताकर उन्हें क़ैद करना सरासर असंवैधानिक है। 15 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाया जाता है। विरोध और आलोचना लोकतंत्र का ही अंग है। ऐसे लोकतंत्र की कल्पना करना ही नामुमकिन है जहां जनता को सरकार से सवाल पूछने, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का अधिकार न हो, और जहां सिर्फ़ सरकार का विरोध करने के लिए जनता को एक क्रूर कानून के तहत आतंकी करार देकर उस पर कार्रवाई की जाए, वह और कुछ भी हो, लोकतंत्र नहीं है।

बात सिर्फ़ उमर खालिद की गिरफ़्तारी की नहीं है। बात है बोलने के अधिकार और प्रशासन द्वारा इस संवैधानिक अधिकार के हनन की। बात है उन बेगुनाहों के साथ हो रही गंभीर नाइंसाफ़ी की जिन्हें बिना सबूत के आतंकी, देशद्रोही, दंगाई बता दिया गया है। बात है एक ऐसे ज़हरीले राजनीतिक माहौल की जहां अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे नागरिक को किसी दहशतगर्द के बराबर समझा जाता है। ऐसी स्थिति में ज़रूरी है कि हम सब इस नाइंसाफ़ी, इस क्रूरता के विरोध में मुखर हों। हम सब उमर खालिद बनें और प्रशासन से सवाल पूछने की हिम्मत रखें। हम सब संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने के लिए एकजुट हों और संघर्ष करते रहें। लोकतंत्र को बचाए रखने की यही आखिरी उम्मीद है। 

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फीचर तस्वीर साभार : फेसबुक

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